अपराधी प्रोफ़ाइलिंग
अपराधी प्रोफ़ाइलिंग यानी अपराध के सबूतों से अंदाज़ा लगाना कि इसे किस तरह के व्यक्ति ने किया, ताकि संदिग्धों की सूची छोटी हो।
ऊपर से नीचे तरीक़ा (प्रकार)
अमेरिका की FBI ने गंभीर अपराधियों के इंटरव्यू से इसे बनाया। प्रोफ़ाइलर अपराध को पहले से बने प्रकार में रखता है: संगठित (योजना, नियंत्रण, कम सुराग, अक्सर ज़्यादा बुद्धि और पक्की नौकरी) या असंगठित (बिना योजना, बिखरा, ज़्यादा सुराग, अक्सर अकेला और पास रहने वाला)। चरण: डेटा जुटाना → अपराध स्थल का वर्गीकरण → अपराध का पुनर्निर्माण → प्रोफ़ाइल बनाना।
नीचे से ऊपर तरीक़ा
यह प्रकारों से नहीं, डेटा से शुरू होता है। खोजी मनोविज्ञान कई अपराधों के आँकड़ों से पैटर्न ढूँढता है और पारस्परिक संगति देखता है (अपराधी पीड़ित से जैसा बर्ताव करता है, वैसा ही रोज़ की ज़िंदगी में)। भौगोलिक प्रोफ़ाइलिंग अपराध की जगहें इस्तेमाल करती है: घेरा सिद्धांत कहता है कि मॉरॉडर अपने अपराधों के इलाक़े के अंदर रहता है, जबकि कम्यूटर अपराध के लिए बाहर जाता है। बिंदुओं का गुरुत्व केंद्र घर का अच्छा अनुमान है।
मूल्यांकन: ऊपर से नीचे तरीक़ा कुछ ही चरम अमेरिकी अपराधियों पर आधारित है और दोनों प्रकार मिल-जुल जाते हैं; नीचे से ऊपर ज़्यादा वैज्ञानिक है, पर यह भी सिर्फ़ तलाश को छोटा करता है।
अपराध की जैविक व्याख्या
अटाविस्टिक रूप (ऐतिहासिक)
1870 के दशक में लोम्ब्रोसो ने दावा किया कि अपराधी आदिम मनुष्य की ओर 'पलटाव' हैं, जैसे भारी भौंह या मज़बूत जबड़ा। उनका तरीक़ा कमज़ोर था (ठीक नियंत्रण समूह नहीं) और विचार में नस्ली पक्षपात है, इसलिए आज इसे ख़ारिज किया जाता है। इसका महत्व यह है कि अपराध का अध्ययन विज्ञान की ओर बढ़ा।
आनुवंशिक और तंत्रिका व्याख्या
जुड़वाँ और गोद लेने के अध्ययन बताते हैं कि जीन का कुछ हिस्सा है। MAOA और CDH13 जैसे जीन हिंसक अपराध से जोड़े गए हैं। दिमाग़ के अध्ययन दिखाते हैं कि कुछ अपराधियों में प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स कम सक्रिय (आत्म-नियंत्रण) होता है और अमिग्डाला में अंतर होते हैं। डायथेसिस-स्ट्रेस मॉडल कहता है कि जीन का जोखिम तभी अपराध बनता है जब शोषण या ग़रीबी जैसा तनाव भी हो।
अपराध की मनोवैज्ञानिक व्याख्या
आइज़ेंक का अपराधी व्यक्तित्व सिद्धांत
व्यक्तित्व का जैविक आधार है। अपराधी अक्सर बहिर्मुखता (रोमांच चाहना, सीखना कठिन), विक्षिप्तता (चिंतित, अस्थिर) और मनोविक्षिप्तता (रूखा, आक्रामक) में ऊँचे होते हैं। वे सज़ा से कम सीखते हैं।
संज्ञानात्मक व्याख्या
नैतिक तर्क: कई अपराधी निचले स्तर पर सोचते हैं, बस सज़ा से बचना या इनाम पाना। संज्ञानात्मक विकृतियाँ सोच की ग़लतियाँ हैं: शत्रुता गुण-आरोपण (सामान्य बात को ख़तरा समझना) और न्यूनीकरण (नुक़सान को छोटा बताना, जैसे 'मैंने तो बस उधार लिया था')।
विभेदक संगति सिद्धांत
अपराध दूसरों के साथ रहकर सीखा जाता है: सोच, कारण और तरीक़े। अपराध-समर्थक लोगों से जितना ज़्यादा मेलजोल, अपराध की संभावना उतनी ज़्यादा। जेल 'अपराध का स्कूल' भी बन सकती है।
मनोगतिक व्याख्या
कमज़ोर या बहुत कठोर पराहम (superego) यानी अंतरात्मा अपराध की ओर ले जा सकता है। बचपन में माँ से जल्दी अलगाव से स्नेहहीन मनोरोग (कम अपराधबोध) हो सकता है। इन विचारों को जाँचना कठिन है।
कारावास की सज़ा और दोबारा अपराध
कारावास (custodial) सज़ा यानी जेल में समय। इसके उद्देश्य: निवारण (लोगों को अपराध से डराना), अक्षमीकरण (जनता की सुरक्षा), प्रतिशोध (उचित सज़ा) और पुनर्वास (बदलने में मदद)।
मनोवैज्ञानिक असर: तनाव, अवसाद, ख़ुद को चोट, संस्थानीकरण (बाहर की ज़िंदगी में न ढल पाना) और दूसरे क़ैदियों से और अपराध सीखना।
दोबारा अपराध (recidivism) यानी सज़ा के बाद फिर अपराध। कई देशों में छूटे क़ैदियों का बड़ा हिस्सा कुछ साल में फिर अपराध करता है, यानी सिर्फ़ जेल से सुधार कम होता है।
व्यवहार संशोधन, ग़ुस्सा प्रबंधन और पुनर्स्थापन न्याय
जेल में व्यवहार संशोधन
यह क्रियाप्रसूत अनुकूलन पर आधारित है। टोकन इकॉनमी में अच्छे व्यवहार पर टोकन मिलते हैं, जिन्हें फ़ोन कॉल जैसे इनाम से बदला जा सकता है; बुरे व्यवहार पर टोकन कटते हैं। जेल के अंदर व्यवहार सुधरता है, पर छूटने के बाद असर घट सकता है।
ग़ुस्सा प्रबंधन
यह CBT का रूप है, तीन चरणों में: संज्ञानात्मक तैयारी (अपने ट्रिगर पहचानो), कौशल सीखना (शांत होना, दृढ़ता, ख़ुद से बात) और अभ्यास (रोल-प्ले)। यह उन लोगों पर सबसे अच्छा काम करता है जो बदलना चाहते हैं।
पुनर्स्थापन न्याय
प्रशिक्षित व्यक्ति की मदद से अपराधी और पीड़ित (या समुदाय) मिलते हैं। अपराधी सुनता है कि उसने क्या नुक़सान किया, ज़िम्मेदारी लेता है और भरपाई करता है। ध्यान सज़ा पर नहीं, सुधार और भरपाई पर है। इससे दोबारा अपराध घट सकता है और पीड़ित को राहत मिलती है, पर दोनों की सहमति ज़रूरी है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
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हल किए गए उदाहरण
1. अपराध स्थल पर कोई हथियार नहीं छूटा, पीड़ित सोच-समझकर चुना गया और कोई उँगली का निशान नहीं। ऊपर से नीचे तरीक़ा किस प्रकार का अपराधी बताता है?
चरण 1: हथियार और निशान नहीं → नियंत्रण और योजना। चरण 2: पीड़ित चुना गया → योजना। चरण 3: इसलिए संगठित प्रोफ़ाइल: औसत से ज़्यादा बुद्धि, सामाजिक कौशल, शायद कुशल नौकरी और अपनी गाड़ी।
2. शहर के ग्रिड पर चोरियाँ (1, 2), (3, 4), (5, 0) और (3, 2) km पर हुईं। गुरुत्व केंद्र निकालो।
x̄ = (1 + 3 + 5 + 3) ÷ 4 = 12 ÷ 4 = 3 km। ȳ = (2 + 4 + 0 + 2) ÷ 4 = 8 ÷ 4 = 2 km। केंद्र (3, 2) है: पहले यहीं तलाश करो।
3. एक जेल से छूटे 800 लोगों में से 360 ने दो साल में फिर अपराध किया। दोबारा अपराध दर कितनी है?
दर = 360 ÷ 800 × 100% = 45%। लगभग आधे लोगों ने फिर अपराध किया, यानी सिर्फ़ जेल से ज़्यादातर का सुधार नहीं हुआ।
4. अमन कहता है, 'उसने मुझे घूरा, मतलब वह लड़ना चाहता था। वैसे भी मैंने बस थोड़ा धक्का दिया।' दो संज्ञानात्मक विकृतियाँ बताओ।
'उसने घूरा, मतलब लड़ना चाहता था' शत्रुता गुण-आरोपण है: सामान्य बात को ख़तरा समझना। 'बस थोड़ा धक्का दिया' न्यूनीकरण है: नुक़सान को छोटा बताना।
आम गलतियाँ
- सोचना कि प्रोफ़ाइलिंग अपराधी का नाम बताती है। यह सिर्फ़ व्यक्ति का प्रकार और तलाश की जगह छोटी करती है।
- लोम्ब्रोसो के अटाविस्टिक सिद्धांत को आज का विज्ञान बताना। यह ख़ारिज किया गया पुराना विचार है।
- कहना कि जीन अपराध कराते हैं। जीन सिर्फ़ जोखिम बढ़ाते हैं, जो तनाव भरे माहौल में ही दिखता है।
- पुनर्स्थापन न्याय को सज़ा समझना। इसका लक्ष्य नुक़सान की भरपाई और ज़िम्मेदारी है, अपराधी को दुख देना नहीं।