अपराध, अच्छे और बुरे इरादे
अपराध वह काम है जो देश का क़ानून तोड़ता है। पाप धार्मिक शिक्षा के ख़िलाफ़ काम है; कुछ काम दोनों होते हैं।
- बुरा इरादा: नुक़सान पहुँचाना या अनुचित फ़ायदा।
- अच्छा इरादा: जैसे भूखे बच्चे के लिए खाना चुराना।
- कई धर्म सिखाते हैं कि मनुष्य अच्छाई और बुराई दोनों कर सकता है, और ईश्वर के लिए मन का इरादा मायने रखता है। अदालत भी इरादा देखती है (जैसे हत्या बनाम दुर्घटना से मौत)।
अपराध के कारण; घृणा अपराध और हत्या
- ग़रीबी और बेरोज़गारी।
- परवरिश: घर में उपेक्षा, हिंसा या अपराध।
- नशा: नशे या जुए के पैसे के लिए चोरी।
- मानसिक बीमारी।
- लालच और नफ़रत।
- अन्यायी क़ानून का विरोध: जैसे अहिंसक आंदोलन में अनुचित क़ानून तोड़ना (नमक क़ानून)।
घृणा अपराध: किसी की नस्ल, धर्म, विकलांगता, लिंग या लैंगिकता के कारण उस पर अपराध। हत्या: जान-बूझकर किसी को मारना; सभी धर्म इसे सबसे गंभीर ग़लतियों में मानते हैं क्योंकि जीवन पवित्र है।
अपराधियों पर विचार: अधिकतर धर्म अपराध की निंदा करते हैं, व्यक्ति की नहीं; वे अपराधी को सुधारने और पीड़ित की मदद दोनों को कहते हैं।
सज़ा के उद्देश्य
- प्रतिशोध: अपराधी को वही मिले जिसका वह हक़दार है; "आँख के बदले आँख" सज़ा को अपराध के बराबर सीमित रखता है।
- निवारण: अपराधी और दूसरों को अपराध से रोकना।
- सुधार: शिक्षा, थेरेपी और कौशल से अपराधी को बदलने में मदद।
- सुरक्षा: ख़तरनाक लोगों से समाज को बचाना।
- क्षतिपूर्ति: नुक़सान की भरपाई, जैसे पैसा लौटाना या माफ़ी माँगना (पुनर्स्थापनात्मक न्याय)।
बहुत से धार्मिक लोग सुधार और क्षतिपूर्ति पर ज़ोर देते हैं क्योंकि हर व्यक्ति बदल सकता है।
जेल, शारीरिक और सामुदायिक दंड; अपराधियों से व्यवहार
- जेल: आज़ादी छिनना; समाज की सुरक्षा; कुछ निवारण। समस्या: कुछ लोग छूटकर फिर अपराध करते हैं।
- सामुदायिक सेवा: समाज के लिए बिना वेतन काम; नुक़सान की भरपाई और जेल के बुरे असर से बचाव।
- शारीरिक दंड: बेंत, कोड़े जैसी सज़ा। अधिकतर देशों में क्रूर और मानव गरिमा के ख़िलाफ़ मानकर प्रतिबंधित।
अपराधियों से व्यवहार
निष्पक्ष मुक़दमा, कोई यातना नहीं, ठीक हालात, सीखने और काम के मौक़े। कई धार्मिक समूह क़ैदियों से मिलते हैं और उनके परिवारों की मदद करते हैं।
क्षमा और मृत्युदंड
क्षमा का मतलब नफ़रत और बदला छोड़ना। अधिकतर धर्म क्षमा सिखाते हैं ("जैसे तुम्हें क्षमा मिली वैसे क्षमा करो", बौद्ध धर्म में करुणा, "क्षमा वीरस्य भूषणम्"), पर क्षमा का मतलब यह नहीं कि सज़ा न हो।
मृत्युदंड
| पक्ष | विपक्ष |
|---|---|
| प्रतिशोध: हत्या की उचित सज़ा | हर जीवन पवित्र है; जीवन देना-लेना ईश्वर का काम |
| दूसरों को रोक सकता है | लंबी जेल से ज़्यादा रोकने का प्रमाण कम |
| समाज की स्थायी सुरक्षा | निर्दोषों को फाँसी हुई है; ग़लती सुधारी नहीं जा सकती |
| कुछ धर्मग्रंथ गंभीर अपराध में इसकी अनुमति देते हैं | सुधार और क्षमा का मौक़ा ख़त्म |
लगभग दो-तिहाई देशों ने इसे क़ानून या व्यवहार में ख़त्म किया है। भारत इसे "दुर्लभतम में दुर्लभ" मामलों के लिए रखता है।
करके देखें: 3D और घर पर
फ़्री-प्ले में सज़ाओं की तुलना करें, फिर मृत्युदंड पर परिवार में दो-पक्षीय बहस करें।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- पाँच उद्देश्य: प्रतिशोध + निवारण + सुधार + सुरक्षा + क्षतिपूर्ति
- अपराध = क़ानून तोड़ना; पाप = धार्मिक शिक्षा तोड़ना
- घृणा अपराध = अपराध + पहचान को निशाना
- क्षमा ≠ सज़ा न होना
हल किए गए उदाहरण
1. तोड़फोड़ के लिए सामुदायिक सेवा कौन-से उद्देश्य पूरे करती है?
क्षतिपूर्ति (समाज के नुक़सान की भरपाई) और सुधार (ज़िम्मेदारी सीखना)। कुछ निवारण भी, पर जेल से कम प्रतिशोध और सुरक्षा।
2. एक महिला बीमार बच्चे के लिए दवा चुराती है जो वह ख़रीद नहीं सकती। इरादे पर चर्चा कीजिए।
काम फिर भी अपराध है। उसका इरादा अच्छा है (बच्चे को बचाना), इसलिए बहुत लोग और धर्मगुरु दया दिखाएँगे और कारण, ग़रीबी, को देखेंगे, पर चोरी को ग़लत ही कहेंगे।
3. मृत्युदंड के विरुद्ध दो धार्मिक तर्क दीजिए।
1) जीवन पवित्र है और ईश्वर का है, मनुष्य को इसे नहीं लेना चाहिए। 2) हर कोई पश्चाताप कर बदल सकता है; फाँसी यह मौक़ा छीन लेती है। अदालत की ग़लती भी फिर सुधारी नहीं जा सकती।
आम गलतियाँ
- सोचना कि क्षमा का मतलब सज़ा नहीं। कोई क्षमा करके भी न्याय चाह सकता है।
- निवारण (रोकना) और प्रतिशोध (बदला चुकाना) को मिलाना।
- कहना कि सभी धर्म मृत्युदंड का समर्थन करते हैं। कई धार्मिक समूह विरोध करते हैं।
- सभी अपराधों का एक ही कारण मानना। कारण कई और आपस में जुड़े होते हैं।