धन और उसका उपयोग
धन: पैसा, ज़मीन, संपत्ति और सामान।
- अधिकतर धर्म ईमानदारी से कमाने को ठीक मानते हैं; इससे परिवार और अच्छे काम चलते हैं।
- लालच और पैसे के मोह से सावधान किया गया है; अमीरों का कर्तव्य है कि दूसरों की मदद करें।
- न्यासिता (trusteeship) का विचार (गांधी जी): धन समाज की अमानत है।
- बहुत से धर्म सादा जीवन और संतोष सिखाते हैं।
ग़रीबी के कारण
ग़रीबी: भोजन, पानी, घर, इलाज और शिक्षा जैसी मूल ज़रूरतों के लिए भी पर्याप्त न होना। निरपेक्ष ग़रीबी एक न्यूनतम रेखा से नीचे जीना है (विश्व बैंक लगभग 3 अमेरिकी डॉलर प्रतिदिन लेता है); सापेक्ष ग़रीबी आसपास के अधिकतर लोगों से बहुत ग़रीब होना है।
- निजी: बेरोज़गारी, कम वेतन, बीमारी या विकलांगता, परिवार टूटना, नशा, क़र्ज़।
- बड़े: कम शिक्षा, प्राकृतिक आपदा, युद्ध, भ्रष्टाचार, अनुचित व्यापार, भेदभाव (जाति, लिंग, नस्ल)।
बहस: कुछ कहते हैं लोग मेहनत से ग़रीबी से निकलें; दूसरे कहते हैं कई कारण व्यक्ति के बस में नहीं, इसलिए समाज को मदद करनी चाहिए।
ग़रीबों का शोषण
- अनुचित मज़दूरी: जीने लायक़ भी नहीं; असुरक्षित काम की जगह।
- भारी ब्याज: साहूकार बहुत ब्याज लेकर लोगों को क़र्ज़ में फँसाते हैं (बंधुआ मज़दूरी)। कुछ धर्म ब्याज पर रोक या सीमा लगाते हैं (इस्लाम में रिबा)।
- बाल श्रम: बच्चे पढ़ने के बजाय काम करते हैं।
- मानव तस्करी: ज़बरदस्ती या धोखे से लोगों को ले जाकर काम कराना; आधुनिक ग़ुलामी।
उचित व्यापार (फ़ेयरट्रेड), न्यूनतम वेतन क़ानून और उचित क़र्ज़ योजनाएँ इसके जवाब हैं।
ग़रीबों को दान देना
- ज़कात (इस्लाम): हर साल बचत का 2.5%; साथ में स्वैच्छिक सदक़ा।
- दान (हिंदू, बौद्ध): बदले की उम्मीद के बिना उदार देना।
- दशमांश (tithe) (ईसाई): परंपरा से आय का दसवाँ हिस्सा; साथ में चर्च सहायता संगठन।
- त्ज़ेदाक़ा (यहूदी): न्याय के रूप में देना।
- सेवा और दसवंध (सिख): निःस्वार्थ सेवा और दसवाँ हिस्सा देना।
अल्पकालीन बनाम दीर्घकालीन सहायता
आपात (अल्पकालीन) सहायता: आपदा के बाद भोजन, पानी, आश्रय। दीर्घकालीन सहायता: स्कूल, कुएँ, हुनर, उचित क़र्ज़, ताकि लोग ख़ुद कमा सकें। कुछ को डर है कि सीधा पैसा देने से दुरुपयोग या निर्भरता हो सकती है; दूसरे कहते हैं ज़रूरत अभी पूरी होनी चाहिए।
सामाजिक न्याय क्या है?
सामाजिक न्याय मतलब ऐसा न्यायपूर्ण समाज जहाँ सबको बराबर अधिकार, उचित अवसर और मूल ज़रूरतें मिलें। समानता सबको एक-सा देती है; समता (equity) हर किसी को उतना देती है जितना बराबर मौक़े के लिए चाहिए। कई धार्मिक और ग़ैर-धार्मिक समूह ग़रीबी और भेदभाव के ख़िलाफ़ सामाजिक न्याय के लिए काम करते हैं।
करके देखें: 3D और घर पर
फ़्री-प्ले में बाँटने के तीन तरीक़े परखें। फिर फ़ेयरट्रेड चिह्न खोजें या छोटी सेवा गतिविधि की योजना बनाएँ।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- धन का उपयोग: ईमानदार कमाई + अच्छा उपयोग + बाँटना
- ज़कात = न्यूनतम सीमा से ऊपर सालाना बचत का 2.5%
- दशमांश = आय का 1/10
- समानता = सबको एक-सा; समता = ज़रूरत के अनुसार
- अल्पकालीन सहायता = अभी; दीर्घकालीन = आत्मनिर्भरता
हल किए गए उदाहरण
1. एक परिवार की न्यूनतम सीमा से ऊपर साल भर की बचत ₹2,00,000 है। कितनी ज़कात बनती है?
2,00,000 का 2.5% = 0.025 × 2,00,000 = ₹5,000।
2. साहूकार 1,000 रुपये 10% मासिक ब्याज पर देता है, जो बिना चुकाए हर महीने जुड़ता है। 2 महीने बाद कितना बकाया?
महीना 1: 1,000 × 1.1 = 1,100। महीना 2: 1,100 × 1.1 = 1,210। क़र्ज़ तेज़ी से बढ़ता है, यही शोषण है।
3. भूकंप के बाद कौन-सी सहायता अल्पकालीन और कौन-सी दीर्घकालीन: तंबू, स्कूल दोबारा बनाना, भोजन पैकेट, मिस्त्रियों को प्रशिक्षण?
अल्पकालीन: तंबू और भोजन पैकेट। दीर्घकालीन: स्कूल बनाना और मिस्त्रियों को प्रशिक्षण।
आम गलतियाँ
- कहना कि धर्म हर धन को बुरा मानते हैं। अधिकतर कहते हैं ईमानदार कमाई और बाँटना ठीक है।
- ग़रीबी का दोष सिर्फ़ आलस पर डालना। कई कारण व्यक्ति के बस में नहीं।
- सोचना कि दान सिर्फ़ पैसा है। समय, हुनर और सेवा भी दान है।
- समानता (सबको एक-सा) और समता (ज़रूरत अनुसार) को मिलाना।