अवस्था के छह परिवर्तन
पदार्थ आमतौर पर ठोस, द्रव या गैस अवस्था में मिलता है। गरम या ठंडा करने से एक अवस्था दूसरी में बदल सकती है।
| परिवर्तन | किससे → किसमें | ऊष्मा | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| गलन (पिघलना) | ठोस → द्रव | ली जाती है | बर्फ़ से पानी |
| हिमीकरण (जमना) | द्रव → ठोस | दी जाती है | फ्रीज़र में पानी से बर्फ़ |
| क्वथन / वाष्पीकरण | द्रव → गैस | ली जाती है | पानी से भाप |
| संघनन | गैस → द्रव | दी जाती है | ठंडे गिलास पर बूँदें |
| ऊर्ध्वपातन | ठोस → गैस | ली जाती है | शुष्क बर्फ़, नेफ़्थलीन की गोली, कपूर |
| निक्षेपण | गैस → ठोस | दी जाती है | ठंडी खिड़की पर पाला (frost) |
ये सब भौतिक परिवर्तन हैं। कण वही रहते हैं, कोई नया पदार्थ नहीं बनता और द्रव्यमान वही रहता है: 100 g बर्फ़ से 100 g पानी बनता है। परिवर्तन को उलटा भी जा सकता है।
पिघलना और जमना
ठोस को गरम करने पर उसके कण ज़्यादा काँपते हैं। एक तय तापमान पर, जिसे गलनांक (melting point) कहते हैं, वे अपनी कतारें तोड़ देते हैं और ठोस द्रव बन जाता है।
- शुद्ध पदार्थ एक तय तापमान पर पिघलता है। बर्फ़ 0 °C पर, लोहा लगभग 1538 °C पर।
- द्रव उसी तापमान पर जमता है जिस पर ठोस पिघलता है। पानी 0 °C पर जमता है।
- तय गलनांक वाले ठोस क्रिस्टलीय कहलाते हैं (बर्फ़, नमक, धातुएँ)। मोम, काँच और मक्खन जैसे अक्रिस्टलीय ठोस धीरे-धीरे नरम होते हैं, इनका कोई तेज़ गलनांक नहीं होता।
- अशुद्धि गलनांक बदल देती है। बर्फ़ीली सड़क पर नमक डालने से बर्फ़ 0 °C से नीचे ही पिघल जाती है।
तापमान रुकता क्यों है?
बर्फ़ पिघलते समय ऊष्मा कणों का खिंचाव तोड़ने में लगती है, उन्हें तेज़ करने में नहीं। इसलिए पूरी बर्फ़ पिघलने तक थर्मामीटर 0 °C पर रुका रहता है। ग्राफ़ पर यह सपाट रेखा दिखती है।
वाष्पीकरण और क्वथन (उबलना)
दोनों में द्रव गैस बनता है, पर दोनों एक जैसे नहीं हैं।
| वाष्पीकरण | क्वथन | |
|---|---|---|
| तापमान | किसी भी तापमान पर | सिर्फ़ क्वथनांक पर |
| कहाँ | सिर्फ़ सतह से | पूरे द्रव में (बुलबुले) |
| गति | धीमा | तेज़ |
| असर | बचा द्रव ठंडा होता है | तापमान क्वथनांक पर टिका रहता है |
वाष्पीकरण से ठंडक क्यों?
द्रव के कण अलग-अलग गति से चलते हैं। सतह के पास के सबसे तेज़ कण बाहर निकल जाते हैं। धीमे कण बचे रहते हैं, तो बची हुई औसत ऊर्जा घट जाती है। इसीलिए पसीना सूखने पर ठंडक लगती है।
वाष्पीकरण को तेज़ करने वाले कारक
- ज़्यादा तापमान (ज़्यादा तेज़ कण)।
- बड़ा सतह क्षेत्रफल (कपड़े फैलाकर सुखाओ)।
- हवा (वह भाप को दूर ले जाती है)।
- कम आर्द्रता (सूखी हवा जल्दी भाप लेती है)।
क्वथनांक और दाब
समुद्र तल पर पानी 100 °C पर उबलता है। ऊँचे पहाड़ पर हवा का दाब कम होता है, तो पानी 100 °C से कम पर उबलता है और खाना देर से पकता है। प्रेशर कुकर दाब बढ़ाता है, इसलिए पानी लगभग 120 °C पर उबलता है और खाना जल्दी पकता है।
ऊर्ध्वपातन और निक्षेपण
कुछ ठोस बिना द्रव बने सीधे गैस बन जाते हैं। इसे ऊर्ध्वपातन (sublimation) कहते हैं। उदाहरण: शुष्क बर्फ़ (ठोस कार्बन डाइऑक्साइड) -78 °C पर, कपूर, अलमारी में रखी नेफ़्थलीन की गोलियाँ, और गरम करने पर आयोडीन।
उल्टा, यानी गैस से सीधे ठोस बनना, निक्षेपण (deposition) कहलाता है। बहुत ठंडी खिड़की पर पाला जमना इसका उदाहरण है।
तापन और शीतलन वक्र, और गुप्त ऊष्मा
बर्फ़ को लगातार गरम करें और तापमान बनाम समय (या ऊर्जा) का ग्राफ़ बनाएँ, तो तापन वक्र मिलता है:
- ढलान: बर्फ़ 0 °C तक गरम होती है।
- सपाट: बर्फ़ 0 °C पर पिघलती है।
- ढलान: पानी 100 °C तक गरम होता है।
- सपाट: पानी 100 °C पर उबलता है (यह हिस्सा ज़्यादा लंबा है)।
- ढलान: भाप और गरम होती है।
शीतलन वक्र यही चित्र उल्टा है: संघनन और जमना सपाट हिस्सों में दिखते हैं।
सपाट हिस्से में लगी ऊर्जा को गुप्त ऊष्मा (latent heat) कहते हैं; गुप्त यानी छिपी, क्योंकि थर्मामीटर पर नहीं दिखती।
- संगलन की विशिष्ट गुप्त ऊष्मा: 1 kg ठोस को बिना तापमान बदले पिघलाने की ऊर्जा। बर्फ़ के लिए लगभग 334 000 J/kg।
- वाष्पन की विशिष्ट गुप्त ऊष्मा: 1 kg द्रव को उबालकर गैस बनाने की ऊर्जा। पानी के लिए लगभग 2 260 000 J/kg।
अवस्था बदलने की ऊर्जा: E = m × L। उबलने में पिघलने से बहुत ज़्यादा ऊर्जा लगती है, क्योंकि कणों को पूरी तरह अलग करना पड़ता है। इसीलिए भाप से जलना उबलते पानी से जलने से ज़्यादा बुरा है: भाप त्वचा पर संघनित होकर अपनी गुप्त ऊष्मा छोड़ती है।
घर पर करके देखो
दो एक जैसे गीले रूमाल लो: एक मोड़कर, एक फैलाकर रखो। पहले अनुमान लगाओ कौन पहले सूखेगा, फिर 30 मिनट बाद जाँचो। फिर एक को छाँव में और एक को हवा में रखकर देखो।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- अवस्था बदलने की ऊर्जा: E = m × L
- बर्फ़ की संगलन गुप्त ऊष्मा: L ≈ 334 000 J/kg
- पानी की वाष्पन गुप्त ऊष्मा: L ≈ 2 260 000 J/kg
- अवस्था बदले बिना गरम करना: E = m × c × ΔT (पानी का c ≈ 4200 J/kg °C)
- ऊष्मा अंदर: पिघलना, उबलना/वाष्पीकरण, ऊर्ध्वपातन। ऊष्मा बाहर: जमना, संघनन, निक्षेपण
हल किए गए उदाहरण
1. परिवर्तन का नाम बताओ: धूप वाली दोपहर में पानी का गड्ढा सूख जाता है।
वाष्पीकरण (क्वथनांक से कम तापमान पर सतह से द्रव → गैस)।
2. ठंडी बोतल के बाहर पानी की बूँदें क्यों दिखती हैं?
हवा की जलवाष्प ठंडी बोतल को छूकर ऊष्मा खोती है और संघनित होकर बूँदें बनती है। पानी हवा से आता है, काँच के आर-पार नहीं।
3. 0 °C पर 2 kg बर्फ़ पिघलाने में कितनी ऊर्जा लगेगी? (L = 334 000 J/kg)
E = m × L = 2 × 334 000 = 668 000 J = 668 kJ। पूरे समय तापमान 0 °C रहता है।
4. 100 °C पर 0.5 kg पानी को 100 °C की भाप बनाने में कितनी ऊर्जा? (L = 2 260 000 J/kg)
E = 0.5 × 2 260 000 = 1 130 000 J = 1130 kJ।
5. एक हीटर पिघलती बर्फ़ को हर सेकंड 500 J देता है। 0 °C पर 0.3 kg बर्फ़ पिघलने में कितना समय लगेगा?
E = 0.3 × 334 000 = 100 200 J। समय = 100 200 ÷ 500 = 200.4 s, लगभग 3.3 मिनट।
6. 0 °C की 1 kg बर्फ़ को 20 °C के पानी में बदलने की कुल ऊर्जा?
पिघलाना: 1 × 334 000 = 334 000 J। गरम करना: 1 × 4200 × 20 = 84 000 J। कुल = 418 000 J = 418 kJ।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि बर्फ़ पिघलते समय तापमान बढ़ता रहता है। पूरी बर्फ़ पिघलने तक यह 0 °C पर रहता है।
- वाष्पीकरण और क्वथन को एक मानना। वाष्पीकरण हर तापमान पर सिर्फ़ सतह से; क्वथन एक तय तापमान पर पूरे द्रव में।
- यह कहना कि ठंडे गिलास पर बूँदें काँच से रिसकर आईं। वे हवा की जलवाष्प के संघनन से बनती हैं।
- यह सोचना कि अवस्था बदलने से नया पदार्थ बनता है। बर्फ़, पानी और भाप तीनों पानी ही हैं; यह भौतिक परिवर्तन है।