घराना क्या है?
घराना शब्द घर से बना है। यह गुरु–शिष्य परंपरा से आगे बढ़ने वाली संगीत शैली है, अक्सर परिवार के भीतर, पर बाहर के शिष्यों तक भी।
- एक संस्थापक जिसने नई शैली बनाई
- कम से कम तीन पीढ़ियाँ जो इसे जीवित रखें
- साफ़ शैली (बाज): बोल कैसे निकलते हैं, ढोल का कौन-सा भाग, कैसी आवाज़
- अपना रचना-भंडार: क़ायदा, रेला, गत, टुकड़ा, परन आदि
गायन के भी घराने हैं (ग्वालियर, आगरा, किराना, जयपुर-अतरौली, पटियाला), और सितार-सरोद के भी (मैहर, इमदादख़ानी, सेनिया)।
तबला घराने: बंद और खुला बाज
| घराना | बाज | मुख्य विशेषताएँ |
|---|---|---|
| दिल्ली | बंद | सबसे पुराना; सिद्धार ख़ाँ ने शुरू किया; किनार पर उँगलियों के सिरे; नरम, साफ़ क़ायदे |
| अजराड़ा | बंद | दिल्ली से निकला; तीन की चाल (तिस्र जाति); बाएँ (डग्गे) का समृद्ध काम |
| लखनऊ | खुला | पूरी हथेली और स्याही के बीच तक; कथक के साथ पनपा; गत और परन |
| फ़र्रुख़ाबाद | मिश्रित | सुंदर गतें, तेज़ रेले, बड़ा भंडार |
| बनारस | खुला | दमदार, गूँजता, पखावज जैसा; लंबे एकल वादन |
| पंजाब | खुला | पखावज के निकट; लंबी, जटिल रचनाएँ |
बनारस तबला घराना और कुदऊ सिंह पखावज घराना
बनारस घराना (तबला)
- संस्थापक पं. राम सहाय (लगभग 1780–1826), जिन्होंने लखनऊ शैली सीखकर अपनी शैली बनाई।
- खुला बाज: पूरे हाथ से खुले, ज़ोरदार, गूँजते बोल।
- पखावज का गहरा असर; धेरे धेरे, कत, गदि गन जैसे दमदार बोल।
- समृद्ध एकल रूप: उठान, गत, परन, तिहाई; गायन, वादन और नृत्य सबकी संगत।
- प्रसिद्ध नाम: कंठे महाराज, अनोखेलाल मिश्र, किशन महाराज, सामता प्रसाद।
कुदऊ सिंह घराना (पखावज)
- संस्थापक कुदऊ सिंह (19वीं सदी), मध्य भारत के दरबारी पखावज उस्ताद।
- खुले हाथ के ज़ोरदार प्रहार; ध्रुपद के लिए भव्य, गंभीर आवाज़।
- बड़ी परनें (पखावज की लंबी रचनाएँ) और तेज़, दमदार अंश।
- कहानियाँ कहती हैं कि उनका वादन इतना सधा था कि पागल हाथी भी शांत हो गया; ज़ोर के पीछे पूरा नियंत्रण।
नाना पानसे घराना (पखावज)
महाराष्ट्र से; संतुलित, मधुर और सुंदर; ध्रुपद, कथक और भजन के अनुकूल; रचनाओं का बहुत बड़ा भंडार।
लयकारी
लय यानी गति; लयकारी यानी एक ही स्थिर ताल पर अलग-अलग गति या अनुपात में बजाने-गाने का कौशल।
| नाम | प्रति मात्रा बोल | 4 मात्रा में |
|---|---|---|
| ठाह (बराबर) | 1 | 4 बोल |
| दुगुन | 2 | 8 बोल |
| तिगुन | 3 | 12 बोल |
| चौगुन | 4 | 16 बोल |
| आड़ | 3/2 (2 मात्रा में 3 बोल) | 6 बोल |
| कुआड़ | 5/4 | 5 बोल |
| बिआड़ | 7/4 | 7 बोल |
ठेके की दुगुन लिखने के लिए हर मात्रा के खाने में दो बोल रखें। दुगुन को सम पर ख़त्म करने के लिए आधे आवर्तन से शुरू करें।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- घराना = संस्थापक + 3+ पीढ़ियाँ + अपनी शैली + अपना भंडार
- बंद बाज: दिल्ली, अजराड़ा; खुला बाज: लखनऊ, फ़र्रुख़ाबाद (मिश्रित), बनारस, पंजाब
- बनारस: राम सहाय; कुदऊ सिंह घराना: पखावज, ज़ोरदार
- एक आवर्तन में बोल = मात्राएँ × लयकारी संख्या
- ठाह 1, दुगुन 2, तिगुन 3, चौगुन 4, आड़ 3/2, कुआड़ 5/4, बिआड़ 7/4
हल किए गए उदाहरण
1. तीनताल (16 मात्रा) के एक आवर्तन में तिगुन में कितने बोल?
16 × 3 = 48 बोल।
2. दुगुन में तीनताल का पूरा ठेका (16 बोल) कितनी मात्राएँ लेगा? सम पर ख़त्म करने के लिए कहाँ से शुरू करें?
16 ÷ 2 = 8 मात्रा। 9वीं मात्रा से शुरू करें, ताकि 16वीं के अंत पर पूरा होकर सम पर आए।
3. वादक पूरी हथेली, ज़ोरदार खुले बोल और लंबी परनें बजाता है। कौन-सा घराना हो सकता है?
खुले बाज वाला घराना, जैसे बनारस (दमदार, पखावज जैसा) या पंजाब।
आम गलतियाँ
- घराने को सिर्फ़ शहर समझना: यह अपनी शैली वाली शिक्षा-परंपरा है; शहर बस इसका मूल है।
- दिल्ली को खुले बाज में रखना: दिल्ली और अजराड़ा बंद बाज हैं।
- तिगुन को तीन मात्रा समझना: तिगुन यानी हर मात्रा में 3 बोल।
- कुदऊ सिंह को तबला वादक कहना: वे पखावज के उस्ताद थे।