ध्रुपद और धमार
ध्रुपद (ध्रुव = अटल, पद = छंद) उत्तर भारत में आज भी गाई जाने वाली सबसे पुरानी शैली है। यह मंदिर के गीतों और पुराने प्रबंध गीतों से बढ़ी और दरबारी कला बनी। ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर (15वीं सदी) ने इसे बढ़ावा दिया और अकबर के दरबार में तानसेन (16वीं सदी) ने इसे प्रसिद्ध किया।
ध्रुपद की बनावट
- आलाप: धीमा, बिना ताल, "नोम, तोम, रे, ना" जैसे अक्षरों के साथ; राग को स्वर-दर-स्वर खोलता है।
- फिर चार भागों वाली रचना: स्थायी (मंद्र-मध्य स्वर), अंतरा (ऊँचे स्वर), संचारी (तीनों सप्तक में), आभोग (समापन)।
- ताल: ज़्यादातर चौताल (12 मात्रा), सूलताल और तीव्रा भी; साथ में पखावज।
- भाव: गंभीर, भक्ति या वीर रस; अलंकार कम; शब्द साफ़।
धमार ध्रुपद शैली में, पर धमार ताल (14 मात्रा) में गाया जाता है। इसके गीत ज़्यादातर होली और कृष्ण पर होते हैं। आज का प्रसिद्ध ध्रुपद परिवार: डागर परिवार।
ख़याल
ख़याल फ़ारसी/उर्दू शब्द है, अर्थ "कल्पना"। यह गायक को ध्रुपद से ज़्यादा आज़ादी देता है। परंपरा इसे अमीर ख़ुसरो (13वीं–14वीं सदी) से जोड़ती है, पर यह असल में 18वीं सदी में दिल्ली के मुहम्मद शाह के दरबार में पनपा, जहाँ सदारंग (नियामत ख़ाँ) और अदारंग ने बहुत से ख़याल रचे।
- बड़ा ख़याल: विलंबित लय में, जैसे एकताल या झूमरा; राग धीरे-धीरे बढ़ता है।
- छोटा ख़याल: मध्य या द्रुत लय में, ज़्यादातर तीनताल (16 मात्रा)।
- दो भाग: स्थायी और अंतरा।
- अलंकार: तान, मींड, मुरकी, बोल-तान।
- साथ में तबला, हारमोनियम या सारंगी और तानपूरे का षड्ज।
आज ख़याल सबसे प्रचलित गायन शैली है; प्रमुख घराने (ग्वालियर, आगरा, किराना, जयपुर-अतरौली, पटियाला) ख़याल की ही शैलियाँ हैं।
तराना
तराना में ऐसे बोल होते हैं जो अर्थवाले शब्द नहीं हैं, जैसे ता, ना, देरे, दिम, तोम, ओदानी, यलली। परंपरा इसका श्रेय अमीर ख़ुसरो को देती है। यह ज़्यादातर ख़याल के बाद द्रुत लय में, ख़ुशी भरे समापन की तरह गाया जाता है। कुछ तरानों में तबला-पखावज के बोल या छोटा फ़ारसी शेर भी होता है। गायक की आवाज़ लगभग ताल-वाद्य जैसी चलती है।
वाद्य की गतें: मसीतख़ानी और रज़ाख़ानी
सितार, सरोद जैसे स्वर-वाद्यों पर तय रचना को गत कहते हैं। इसकी बनावट दाएँ हाथ के बोलों से बनती है: दा (अंदर), रा (बाहर), और दिर = दा+रा जल्दी से।
| मसीतख़ानी गत | रज़ाख़ानी गत | |
|---|---|---|
| किसके नाम पर | मसीत ख़ाँ, दिल्ली, 18वीं सदी | ग़ुलाम रज़ा ख़ाँ, लखनऊ, 19वीं सदी |
| लय | विलंबित | मध्य या द्रुत |
| ताल | तीनताल (16 मात्रा) | तीनताल (16 मात्रा) |
| आम शुरुआत | 12वीं मात्रा; बोल दिर दा दिर, दा रा, दा दा रा | अक्सर दूसरी या नौवीं मात्रा; छोटे, चमकीले बोल |
| भाव | शांत, खुला, बहुत मींड | चंचल, चमकदार, बाद में अक्सर झाला |
सभा का आम क्रम: आलाप → जोड़ → झाला (बिना ताल), फिर मसीतख़ानी गत, फिर रज़ाख़ानी गत।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- ध्रुपद: आलाप → स्थायी → अंतरा → संचारी → आभोग; चौताल 12 मात्रा; पखावज
- धमार: ध्रुपद शैली; धमार ताल 14 मात्रा (5+2+3+4); होली गीत
- ख़याल: बड़ा (विलंबित) + छोटा (द्रुत); स्थायी + अंतरा; तबला
- तराना: बोल (ता, ना, देरे, दिम, तोम); द्रुत लय
- मसीतख़ानी गत: विलंबित तीनताल; रज़ाख़ानी गत: द्रुत तीनताल
- लय: विलंबित < मध्य < द्रुत
हल किए गए उदाहरण
1. गायक "नोम तोम" से लंबा धीमा आलाप करता है, फिर पखावज के साथ 12 मात्रा में चार भाग गाता है। कौन-सी शैली?
ध्रुपद: नोम-तोम आलाप, चार भाग (स्थायी, अंतरा, संचारी, आभोग), पखावज के साथ चौताल।
2. ध्रुपद और ख़याल में तीन अंतर बताइए।
(1) ध्रुपद पुराना और गंभीर; ख़याल ज़्यादा खुला। (2) ध्रुपद के चार भाग; ख़याल के दो (स्थायी, अंतरा)। (3) ध्रुपद में पखावज-चौताल; ख़याल में तबला, एकताल-तीनताल आदि; ख़याल में तेज़ तानें, ध्रुपद में प्रायः नहीं।
3. सितार की एक गत विलंबित तीनताल की 12वीं मात्रा से दिर दा दिर दा रा बोलों से शुरू होती है। नाम और उससे जुड़ा व्यक्ति बताइए।
मसीतख़ानी गत, दिल्ली के मसीत ख़ाँ (18वीं सदी) से जुड़ी।
आम गलतियाँ
- ख़याल को ध्रुपद से पुराना कहना: ध्रुपद पुराना है।
- ताल मिलाना: ध्रुपद चौताल (12), धमार धमार ताल (14) में; तीनताल नहीं।
- तराने को शब्दों वाला गीत कहना: इसमें बोल होते हैं, अर्थ वाले शब्द नहीं।
- गतें उलटना: मसीतख़ानी धीमी, रज़ाख़ानी तेज़।