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हिंदुस्तानी संगीत की शैलियाँ

हिंदुस्तानी (उत्तर भारतीय) शास्त्रीय संगीत की कई शैलियाँ हैं। ध्रुपद सबसे पुरानी: गंभीर, धीमी, लंबे नोम-तोम आलाप के बाद पखावज के साथ चौताल में, चार भागों (स्थायी, अंतरा, संचारी, आभोग) में। धमार ध्रुपद-शैली में 14 मात्रा के धमार ताल में होली के गीत हैं। ख़याल ("कल्पना") 18वीं सदी में बढ़ा: ज़्यादा खुला और सजावटी, विलंबित बड़ा ख़याल और द्रुत छोटा ख़याल, तबले के साथ। तराना शब्दों के बजाय बोलों से बनता है और द्रुत होता है। सितार-सरोद पर मसीतख़ानी गत धीमी और रज़ाख़ानी गत तेज़ होती है, दोनों तीनताल में।

🎬 कदम-दर-कदम कहानी

  1. ध्रुपद सबसे पुरानी शैली है। पहले बिना ताल का धीमा आलाप, फिर 4 भाग: स्थायी, अंतरा, संचारी, आभोग।
  2. ध्रुपद पखावज पर चौताल (12 मात्रा) में होता है। धमार, धमार ताल (14 मात्रा) में। पहली मात्रा सम है।
  3. ख़याल का अर्थ है कल्पना। बड़ा ख़याल बहुत धीमा होता है। उसके बाद छोटा ख़याल तेज़ होता है।
  4. तराना में शब्द नहीं, ता, ना, देरे, दिम, तोम जैसे बोल होते हैं। यह तेज़ और चंचल है।
  5. सितार या सरोद पर मसीतख़ानी गत धीमी और शांत है। रज़ाख़ानी गत तेज़ और चमकीली है।
  6. खुद खेलिए: कोई भी शैली चुनिए और उसकी लय, ताल और मुख्य बातें मिलाइए।

टिप: 3D दृश्य को घुमाने के लिए खींचें। ज़ूम के लिए दो उंगलियाँ इस्तेमाल करें।

🤔 आम शंकाएँ और उनके जवाब

ध्रुपद बिना ताल के क्यों शुरू होता है?

खुला आलाप गायक को लय शुरू होने से पहले राग धीरे-धीरे, स्वर-दर-स्वर दिखाने देता है।

सम क्या है और लाल क्यों है?

सम ताल के आवर्तन की पहली मात्रा है, जहाँ गायक और वादक मिलते हैं। यह सबसे ज़ोरदार जगह है, इसलिए लाल।

क्या बड़ा ख़याल और छोटा ख़याल अलग राग में होते हैं?

नहीं। प्रायः एक ही राग पहले धीमा (बड़ा), फिर तेज़ (छोटा) गाया जाता है।

क्या तराने के बोलों का कोई अर्थ है?

ये शब्दकोश वाले शब्द नहीं हैं; लय और बहाव के लिए चुनी ध्वनियाँ हैं।

दोनों गतें तीनताल में हैं, तो फ़र्क क्या?

लय और बोलों की बनावट: मसीतख़ानी धीमी और खुली, रज़ाख़ानी तेज़ और चमकीली।

ध्रुपद और धमार

ध्रुपद (ध्रुव = अटल, पद = छंद) उत्तर भारत में आज भी गाई जाने वाली सबसे पुरानी शैली है। यह मंदिर के गीतों और पुराने प्रबंध गीतों से बढ़ी और दरबारी कला बनी। ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर (15वीं सदी) ने इसे बढ़ावा दिया और अकबर के दरबार में तानसेन (16वीं सदी) ने इसे प्रसिद्ध किया।

ध्रुपद की बनावट

धमार ध्रुपद शैली में, पर धमार ताल (14 मात्रा) में गाया जाता है। इसके गीत ज़्यादातर होली और कृष्ण पर होते हैं। आज का प्रसिद्ध ध्रुपद परिवार: डागर परिवार।

ख़याल

ख़याल फ़ारसी/उर्दू शब्द है, अर्थ "कल्पना"। यह गायक को ध्रुपद से ज़्यादा आज़ादी देता है। परंपरा इसे अमीर ख़ुसरो (13वीं–14वीं सदी) से जोड़ती है, पर यह असल में 18वीं सदी में दिल्ली के मुहम्मद शाह के दरबार में पनपा, जहाँ सदारंग (नियामत ख़ाँ) और अदारंग ने बहुत से ख़याल रचे।

आज ख़याल सबसे प्रचलित गायन शैली है; प्रमुख घराने (ग्वालियर, आगरा, किराना, जयपुर-अतरौली, पटियाला) ख़याल की ही शैलियाँ हैं।

तराना

तराना में ऐसे बोल होते हैं जो अर्थवाले शब्द नहीं हैं, जैसे ता, ना, देरे, दिम, तोम, ओदानी, यलली। परंपरा इसका श्रेय अमीर ख़ुसरो को देती है। यह ज़्यादातर ख़याल के बाद द्रुत लय में, ख़ुशी भरे समापन की तरह गाया जाता है। कुछ तरानों में तबला-पखावज के बोल या छोटा फ़ारसी शेर भी होता है। गायक की आवाज़ लगभग ताल-वाद्य जैसी चलती है।

वाद्य की गतें: मसीतख़ानी और रज़ाख़ानी

सितार, सरोद जैसे स्वर-वाद्यों पर तय रचना को गत कहते हैं। इसकी बनावट दाएँ हाथ के बोलों से बनती है: दा (अंदर), रा (बाहर), और दिर = दा+रा जल्दी से।

मसीतख़ानी गतरज़ाख़ानी गत
किसके नाम परमसीत ख़ाँ, दिल्ली, 18वीं सदीग़ुलाम रज़ा ख़ाँ, लखनऊ, 19वीं सदी
लयविलंबितमध्य या द्रुत
तालतीनताल (16 मात्रा)तीनताल (16 मात्रा)
आम शुरुआत12वीं मात्रा; बोल दिर दा दिर, दा रा, दा दा राअक्सर दूसरी या नौवीं मात्रा; छोटे, चमकीले बोल
भावशांत, खुला, बहुत मींडचंचल, चमकदार, बाद में अक्सर झाला

सभा का आम क्रम: आलाप → जोड़ → झाला (बिना ताल), फिर मसीतख़ानी गत, फिर रज़ाख़ानी गत।

मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ

हल किए गए उदाहरण

1. गायक "नोम तोम" से लंबा धीमा आलाप करता है, फिर पखावज के साथ 12 मात्रा में चार भाग गाता है। कौन-सी शैली?

ध्रुपद: नोम-तोम आलाप, चार भाग (स्थायी, अंतरा, संचारी, आभोग), पखावज के साथ चौताल।

2. ध्रुपद और ख़याल में तीन अंतर बताइए।

(1) ध्रुपद पुराना और गंभीर; ख़याल ज़्यादा खुला। (2) ध्रुपद के चार भाग; ख़याल के दो (स्थायी, अंतरा)। (3) ध्रुपद में पखावज-चौताल; ख़याल में तबला, एकताल-तीनताल आदि; ख़याल में तेज़ तानें, ध्रुपद में प्रायः नहीं।

3. सितार की एक गत विलंबित तीनताल की 12वीं मात्रा से दिर दा दिर दा रा बोलों से शुरू होती है। नाम और उससे जुड़ा व्यक्ति बताइए।

मसीतख़ानी गत, दिल्ली के मसीत ख़ाँ (18वीं सदी) से जुड़ी।

आम गलतियाँ

अभ्यास क्विज़

1. हिंदुस्तानी गायन की सबसे पुरानी जीवित शैली:
2. धमार ताल में कितनी मात्राएँ हैं?
3. "ख़याल" का अर्थ है:
4. किस शैली में ता, ना, देरे, दिम जैसे बोल होते हैं?
5. रज़ाख़ानी गत किस लय में बजती है?

अभ्यास: खुद जवाब दो

अपना जवाब लिखो या चुनो, फिर जाँचें दबाओ। अटको तो संकेत देखो; जवाब देने के बाद पूरा हल दिखेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायन की मुख्य शैलियाँ कौन-सी हैं?

ध्रुपद, धमार, ख़याल और तराना शास्त्रीय शैलियाँ हैं; ठुमरी, दादरा और टप्पा उपशास्त्रीय।

मसीतख़ानी और रज़ाख़ानी गत में क्या अंतर है?

मसीतख़ानी विलंबित है और दिल्ली के मसीत ख़ाँ से जुड़ी है; रज़ाख़ानी द्रुत है और लखनऊ के ग़ुलाम रज़ा ख़ाँ से जुड़ी है। दोनों आमतौर पर तीनताल में।

ख़याल का जनक किसे कहते हैं?

परंपरा ख़याल को अमीर ख़ुसरो से जोड़ती है, पर आज के ख़याल को 18वीं सदी में सदारंग-अदारंग ने आकार दिया।

यह कहाँ पढ़ाया जाता है

सीबीएसई (भारत)कक्षा 11रूप
सीबीएसई (भारत)कक्षा 11संगीत के रूप

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