नाट्यशास्त्र में संगीत के तत्व
नाट्यशास्त्र मुनि भरत से जुड़ा ग्रंथ है, जो लगभग 200 ई.पू. से 200 ई. के बीच बना। यह नाटक पर बड़ा ग्रंथ है, और संगीत इसका बड़ा भाग है।
- स्वर: 7 (सा रे ग म प ध नि)।
- श्रुति: सप्तक में 22 छोटे स्वर-क़दम; स्वर चुनी श्रुतियों पर बैठते हैं (4, 3, 2, 4, 4, 3, 2)।
- ग्राम: मूल सप्तक, षड्ज ग्राम और मध्यम ग्राम।
- मूर्च्छना और जाति: स्केल और धुन के प्रकार, रागों के पूर्वज।
- ताल: गीत और नृत्य के लिए समय-चक्र।
- वाद्यों के चार वर्ग: तत (तार), सुषिर (हवा), अवनद्ध (चमड़े से मढ़े), घन (ठोस, टकराकर)।
अवनद्ध वाद्य (चमड़े के ढोल)
नाट्यशास्त्र ढोलों पर विशेष ध्यान देता है। मुख्य समूह पुष्कर वाद्य हैं: मृदंग, पणव और दर्दुर। ग्रंथ की एक कथा बताती है कि मुनि स्वाति को कमल के पत्तों पर गिरती बारिश की आवाज़ से ढोल का विचार आया। ग्रंथ इन्हें बनाने, मिलाने, बोल और गायन-अभिनय में संगत के बारे में बताता है।
मध्यकालीन ग्रंथ: संगीत रत्नाकर और संगीत पारिजात
संगीत रत्नाकर
13वीं सदी में देवगिरि (दक्कन) में शार्ङ्गदेव ने लिखा। यह पुराने सिद्धांत को 7 अध्यायों में जोड़ता है: स्वर, राग, प्रकीर्णक (विविध, गायक के गुण भी), प्रबंध (रचनाएँ), ताल, वाद्य और नर्तन (नृत्य)। हिंदुस्तानी और कर्नाटक दोनों संगीत इसे मुख्य ग्रंथ मानते हैं।
संगीत पारिजात
17वीं सदी में अहोबल ने लिखा। इसका बड़ा विचार: इसने 12 स्वरों (शुद्ध और विकृत) के स्थान वीणा के तार की लंबाई से तय किए। जैसे, प तार के दो-तिहाई पर। इससे स्वर सटीक और नापने योग्य हुए। इसमें उस समय के कई रागों का वर्णन भी है।
तानसेन, भातखंडे और पलुस्कर
- तानसेन (16वीं सदी): स्वामी हरिदास से और ग्वालियर में सीखा; अकबर के दरबार के "नवरत्नों" में एक बने। महान ध्रुपद गायक; मियाँ की मल्हार, मियाँ की तोड़ी, दरबारी कान्हड़ा जैसे राग उनसे जुड़े हैं। उनके वंशजों से सेनिया परंपरा बनी।
- विष्णु नारायण भातखंडे (1860–1936): दूर-दूर यात्रा कर हज़ारों रचनाएँ जमा कीं, सरल हिंदुस्तानी स्वरलिपि बनाई और रागों को 10 थाटों में बाँटा। हिंदुस्तानी संगीत पद्धति और क्रमिक पुस्तक मालिका लिखी; लखनऊ में संगीत महाविद्यालय (आज भातखंडे विश्वविद्यालय) और संगीत सम्मेलन शुरू कराने में मदद की।
- विष्णु दिगंबर पलुस्कर (1872–1931): 1901 में लाहौर में गांधर्व महाविद्यालय खोला, ताकि कोई भी स्कूल में संगीत सीख सके। अपनी स्वरलिपि बनाई, जनता के लिए भजन गाए और समाज में संगीतकारों का सम्मान बढ़ाया।
तबले की उत्पत्ति और विकास
तबले की उत्पत्ति पर कई मत हैं:
- एक प्रचलित कथा कहती है कि अमीर ख़ुसरो ने पखावज को दो भागों में काटा। इतिहासकार इस पर संदेह करते हैं, क्योंकि उस समय का कोई प्रमाण नहीं।
- दूसरा मत: यह पुराने भारतीय जोड़ी-ढोलों और घड़े जैसे ढोलों से, पश्चिम एशियाई ढोलों के असर के साथ बना।
- ज़्यादातर मानते हैं कि 18वीं सदी में तबला महत्त्वपूर्ण बना, जब हल्के, तेज़ ख़याल और दरबारी नृत्य को फुर्तीले, साफ़ ढोल की ज़रूरत थी। दिल्ली के सिद्धार (सुधार) ख़ाँ पहले तबला घराने के संस्थापक माने जाते हैं।
विकास: दिल्ली → अजराड़ा, लखनऊ, फ़र्रुख़ाबाद, बनारस, पंजाब घराने; फिर 20वीं सदी में सभाएँ, रेडियो, फ़िल्में और विश्व मंच।
महान संगीतकार: जीवन परिचय
ताल-वादक
- कुदऊ सिंह (19वीं सदी): मध्य भारत के राज-दरबारों के प्रसिद्ध पखावजी। दमदार खुली शैली और बहुत सी परनों के लिए जाने जाते हैं; कहानियाँ कहती हैं कि उनके वादन से पागल हाथी भी शांत हो गया। कुदऊ सिंह घराने के संस्थापक।
- नाना पानसे (19वीं सदी): महाराष्ट्र के पखावज गुरु। शैली कोमल, मधुर और संतुलित, जो ध्रुपद, कथक और भजन सबमें जमती है। रचनाओं का बड़ा भंडार छोड़ा।
वादक
- इनायत ख़ाँ (1894–1938): इमदादख़ानी (इटावा) परंपरा के सितार-सुरबहार उस्ताद; विलायत ख़ाँ के पिता।
- मुश्ताक़ अली ख़ाँ (1911–1989): सेनिया शैली के सितार वादक, शुद्ध पारंपरिक वादन के लिए प्रसिद्ध।
- अलाउद्दीन ख़ाँ (लगभग 1862–1972): मैहर के सरोद उस्ताद; रवि शंकर, अली अकबर ख़ाँ और अन्नपूर्णा देवी के गुरु; मैहर बैंड बनाया।
गायक
- फ़ैयाज़ ख़ाँ (1886–1950): आगरा घराना; बुलंद आवाज़; "आफ़ताब-ए-मौसिक़ी" (संगीत का सूरज) कहलाए।
- बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ (1902–1968): पटियाला घराना; ख़याल और ठुमरी के लिए प्रसिद्ध, मीठी लचीली आवाज़।
- कृष्णराव शंकर पंडित (1893–1989): ग्वालियर घराना; प्रभावशाली गुरु जिन्होंने पुरानी ग्वालियर शैली जीवित रखी।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- समय-रेखा: सामवेद → नाट्यशास्त्र (~200 ई.पू.–200 ई.) → संगीत रत्नाकर (13वीं सदी) → तानसेन (16वीं) → संगीत पारिजात (17वीं) → तबले का विकास (18वीं) → भातखंडे व पलुस्कर (~1900)
- नाट्यशास्त्र: 7 स्वर, 22 श्रुतियाँ, 2 ग्राम, जातियाँ, 4 वाद्य-वर्ग
- वाद्य-वर्ग: तत (तार), सुषिर (हवा), अवनद्ध (चमड़ा), घन (ठोस)
- श्रुति-बँटवारा: सा 4, रे 3, ग 2, म 4, प 4, ध 3, नि 2 = 22
- संगीत रत्नाकर: शार्ङ्गदेव, 7 अध्याय; संगीत पारिजात: अहोबल, तार की लंबाई से स्वर
- भातखंडे: स्वरलिपि + 10 थाट; पलुस्कर: गांधर्व महाविद्यालय, 1901
हल किए गए उदाहरण
1. ये किस नाट्यशास्त्र वर्ग में आएँगे: सारंगी, शहनाई, तबला, मंजीरा?
सारंगी – तत (तार); शहनाई – सुषिर (हवा); तबला – अवनद्ध (चमड़ा); मंजीरा – घन (ठोस)।
2. जाँचिए कि 4-3-2-4-4-3-2 का जोड़ 22 है।
4 + 3 + 2 + 4 + 4 + 3 + 2 = 22। ✓
3. समय-क्रम में लगाइए: भातखंडे, नाट्यशास्त्र, तानसेन, संगीत रत्नाकर, संगीत पारिजात।
नाट्यशास्त्र → संगीत रत्नाकर (13वीं) → तानसेन (16वीं) → संगीत पारिजात (17वीं) → भातखंडे (~1900)।
आम गलतियाँ
- संगीत रत्नाकर को भरत का कहना: यह शार्ङ्गदेव का है; नाट्यशास्त्र भरत से जुड़ा है।
- 22 स्वर मानना: स्वर 7 हैं, श्रुतियाँ 22।
- अमीर ख़ुसरो वाली तबला कथा को पक्का तथ्य मानना: यह किंवदंती है।
- भातखंडे और पलुस्कर को मिलाना: 10 थाट भातखंडे के; गांधर्व महाविद्यालय पलुस्कर का।