कर्नाटक संगीत क्या है?
कर्नाटक (कर्नाटक संगीत) दक्षिण भारत का शास्त्रीय कला-संगीत है। यह मुख्यतः गायन पर आधारित है: वायलिन और वीणा भी "गाने" की कोशिश करते हैं। हर प्रस्तुति दो स्तंभों पर खड़ी है: राग (धुन-योजना) और ताल (समय-चक्र)। गीत ज़्यादातर तेलुगु, संस्कृत, तमिल और कन्नड़ में हैं।
सबसे पुरानी जड़ नाट्यशास्त्र है (भरत मुनि का, लगभग 2,000 साल पुराना)। इसमें स्वर, 22 श्रुतियाँ (बारीक सुर-स्थान), आरंभिक स्केल (जाति), ताल और वाद्यों के चार परिवार हैं: तत (तार), सुषिर (फूँक), अवनद्ध (चमड़े वाले ढोल) और घन (ठोस)। इसमें लय और ताल-वाद्य नाटक का हिस्सा हैं।
मुख्य ग्रंथ समय के क्रम में
- बृहद्देशी (मतंग, लगभग 9वीं सदी): राग की पहली साफ़ परिभाषा; क्षेत्रीय (देशी) संगीत का वर्णन।
- संगीत रत्नाकर (शार्ङ्गदेव, 13वीं सदी): स्वर, राग, ताल (पुराने मार्ग ताल सहित), वाद्य और नृत्य का बड़ा सार। दोनों धाराएँ इसे उद्धृत करती हैं।
- स्वरमेलकलानिधि (रामामात्य, 1550): वीणा के पर्दों के आधार पर रागों को जनक मेलों में बाँटा।
- रागविबोध (सोमनाथ, 1609): मेल और राग, गमकों पर टिप्पणियाँ।
- चतुर्दंडी प्रकाशिका (वेंकटमखी, 17वीं सदी): 72 मेल संभव हैं, संगीत के चार दंड (गीत, प्रबंध, ठाय, आलाप) और सुळादि ताल।
- संगीत सारामृत (तंजावुर के राजा तुलजा, 18वीं सदी): उस समय गाए जाने वाले रागों के लक्षण और वाक्यांश।
- संगीत संप्रदाय प्रदर्शिनी (सुब्बराम दीक्षितर, 1904): सैकड़ों रचनाओं, खासकर दीक्षितर कृतियों की छपी स्वरलिपि, गमक चिह्नों के साथ।
रचनाकार जिन्होंने रचना-भंडार बनाया
- अन्नमाचार्य (15वीं सदी): भगवान वेंकटेश्वर पर हज़ारों तेलुगु संकीर्तन।
- पुरंदर दास (1484–1564): कर्नाटक संगीत के पितामह; मायामालवगौळ में क्रमबद्ध पाठ और बहुत से कन्नड़ गीत।
- क्षेत्रय्या (17वीं सदी): तेलुगु पदम, नृत्य में प्रयुक्त धीमे प्रेम-गीत।
- त्रिमूर्ति (18वीं–19वीं सदी, तीनों तिरुवारूर में जन्मे):
- त्यागराज (1767–1847): भक्ति भरी तेलुगु कृतियाँ; पंचरत्न कृतियाँ जैसे समूह-गीत।
- मुत्तुस्वामी दीक्षितर (1775–1835): संस्कृत कृतियाँ, धीमी और भव्य, मुद्रा "गुरुगुह"।
- श्यामा शास्त्री (1762–1827): कृतियाँ और स्वरजतियाँ, कठिन लय के लिए प्रसिद्ध।
- स्वाति तिरुनाल (1813–1846): त्रावणकोर के राजा, कई भाषाओं में रचनाएँ।
- गोपालकृष्ण भारती (19वीं सदी): तमिल गीत और संगीत-कथा नंदनार चरित्रम।
- पट्णम सुब्रह्मण्य अय्यर (1845–1902): प्रसिद्ध वर्णम और कृतियाँ।
महान कलाकार: गायन, तार-वाद्य और ताल-वाद्य
स्वर-वाद्य
- वीणा धनम्माल (1867–1938): कोमल, गहरी शैली की वीणा वादिका; उनका परिवार संगीत और नृत्य की एक परंपरा बना।
- कारैकुडी बंधु (सुब्बराम और सांबशिव अय्यर): वीणा जोड़ी जिसने पुरानी शुद्ध शैली बचाए रखी।
- तिरुक्कोडिकावल कृष्ण अय्यर (1857–1913) और द्वारम वेंकटस्वामी नायडू (1893–1964): वायलिन के उस्ताद जिन्होंने वायलिन को एकल कर्नाटक वाद्य बनाया।
- कुंभकोणम राजमाणिक्कम पिळ्ळै: संगत के लिए प्रसिद्ध वायलिन वादक।
ताल-वाद्य (मृदंगम, कंजीरा)
- नारायणस्वामी अप्पा और अळगुनंबि पिळ्ळै (तंजावुर): आरंभिक मृदंगम उस्ताद।
- मामुंडिया पिळ्ळै (पुदुक्कोट्टै) और दक्षिणामूर्ति पिळ्ळै: पुदुक्कोट्टै शैली के कंजीरा और मृदंगम उस्ताद।
- पालघाट मणि अय्यर (1912–1981) और पलनि सुब्रह्मण्य पिळ्ळै (1908–1962): 20वीं सदी के मृदंगम दिग्गज, अलग-अलग प्यारी शैलियाँ।
आज की कच्चेरी
आधुनिक कच्चेरी में मुख्य गायक या वादक, वायलिन, मृदंगम और अक्सर घटम या कंजीरा होते हैं। आमतौर पर वर्णम से शुरुआत, फिर कृतियाँ, फिर एक बड़ी मुख्य रचना आलापना, निरवल और कल्पना स्वरों के साथ, ताल-वाद्य का एकल (तनि आवर्तनम), और अंत में हल्के गीत और मंगलम।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- दो स्तंभ: राग (धुन) + ताल (लय)
- नाट्यशास्त्र → बृहद्देशी → संगीत रत्नाकर → स्वरमेलकलानिधि → रागविबोध → चतुर्दंडी प्रकाशिका → संगीत सारामृत → संप्रदाय प्रदर्शिनी
- त्रिमूर्ति = त्यागराज + मुत्तुस्वामी दीक्षितर + श्यामा शास्त्री
- पाठ-सीढ़ी: सरली → जंटा → अलंकारम → गीतम → स्वरजति → वर्णम → कृति
- 72 मेलकर्ता (वेंकटमखी)
हल किए गए उदाहरण
1. समय के क्रम में लगाइए: चतुर्दंडी प्रकाशिका, बृहद्देशी, संगीत रत्नाकर।
बृहद्देशी (लगभग 9वीं सदी) → संगीत रत्नाकर (13वीं सदी) → चतुर्दंडी प्रकाशिका (17वीं सदी)।
2. पुरंदर दास को कर्नाटक संगीत का पितामह क्यों कहते हैं?
उन्होंने शिक्षा को क्रमबद्ध चरणों (सरली, जंटा, अलंकारम, गीतम) में एक राग, मायामालवगौळ, में सजाया, ताकि शुरुआती छात्र क्रम से सीखें। गुरु आज भी यही पद्धति अपनाते हैं।
3. किस ग्रंथ ने पहली बार दिखाया कि 72 मेल संभव हैं, और लेखक कौन?
चतुर्दंडी प्रकाशिका, वेंकटमखी (17वीं सदी)।
4. त्रिमूर्ति के नाम और हर एक की एक विशेषता बताइए।
त्यागराज: तेलुगु भक्ति कृतियाँ। मुत्तुस्वामी दीक्षितर: "गुरुगुह" मुद्रा वाली भव्य संस्कृत कृतियाँ। श्यामा शास्त्री: कठिन लय वाली कृतियाँ और स्वरजतियाँ।
5. संगीत संप्रदाय प्रदर्शिनी (1904) आज इतनी उपयोगी क्यों है?
इसमें सैकड़ों रचनाओं की स्वरलिपि गमक चिह्नों के साथ छपी, जिससे पता चलता है कि सौ साल पहले वे कैसे गाई जाती थीं।
आम गलतियाँ
- पुरंदर दास को त्रिमूर्ति में गिनना। त्रिमूर्ति उनके लगभग 250 साल बाद आई।
- सोचना कि 72 मेलकर्ता सब पुराने राग थे। वेंकटमखी ने गिनती से निकाले; कई बाद में भरे गए।
- लेखक उलझाना: संगीत रत्नाकर शार्ङ्गदेव, बृहद्देशी मतंग, चतुर्दंडी प्रकाशिका वेंकटमखी।
- कहना कि कर्नाटक संगीत केवल कर्नाटक राज्य का है। "कर्नाटक" पूरी दक्षिण भारतीय परंपरा के लिए है।