CBSE कक्षा 11 कर्नाटक संगीत ताल वाद्य
अध्याय: 2
1. इतिहास और सिद्धांत
ग्रंथ और आचार्य · लय शब्दावली · वाद्य और लिपि
- कर्नाटक संगीत: कहानी, ग्रंथ और महान संगीतकार – कर्नाटक संगीत दक्षिण भारत का शास्त्रीय संगीत है। इसके विचार पुराने ग्रंथों (नाट्यशास्त्र, बृहद्देशी, संगीत रत्नाकर) से निकले। लगभग 13वीं सदी के बाद भारतीय कला-संगीत दो धाराओं में बढ़ा: हिंदुस्तानी और कर्नाटक। पुरंदर दास ने क्रमबद्ध पाठ बनाए; रामामात्य, सोमनाथ और वेंकटमखी ने रागों को जनक मेलों में सजाया, जिसका अंत 72 मेलकर्ता में हुआ। त्रिमूर्ति (त्यागराज, मुत्तुस्वामी दीक्षितर, श्यामा शास्त्री) और स्वाति तिरुनाल जैसे रचनाकारों ने मुख्य रचनाएँ दीं; छपी स्वरलिपि और महान कलाकार इसे आधुनिक कच्चेरी तक लाए।
- ताल: हिंदुस्तानी संगीत का लय चक्र – ताल मात्राओं का एक तय चक्र है, जो विभागों में बँटा होता है। चक्र सम से शुरू होता है, भरे विभाग ताली से और हल्का विभाग खाली (हाथ हिलाकर) से दिखाया जाता है। इसके मूल बोल ठेका कहलाते हैं।
- वाद्य यंत्र (Musical Instruments) – हर वाद्य किसी चीज़ में कंपन कराता है: तार, हवा का स्तंभ, तनी खाल, ठोस वस्तु या इलेक्ट्रॉनिक सर्किट और स्पीकर। हम वाद्यों को इसी से बाँटते हैं कि क्या काँपता है: तत (तार), सुषिर (हवा), अवनद्ध (खाल), घन (ठोस) और इलेक्ट्रॉनिक। छोटा, कसा या पतला हिस्सा ऊँचा स्वर देता है। हर वाद्य का अपना टिम्बर (स्वर का रंग) होता है क्योंकि वह हार्मोनिक्स का अपना मिश्रण जोड़ता है। ऑर्केस्ट्रा या बैंड में वाद्य मिलकर समृद्ध रंग बनाते हैं।
2. प्रायोगिक
वादन
- संगीत प्रस्तुति (Music Performance): एकल और समूह में – संगीत प्रस्तुति यानी श्रोताओं के सामने कोई रचना बजाना या गाना। अच्छी प्रस्तुति में शुद्धता (सही सुर, सही लय), एक-सी ताल (टेम्पो), भाव दिखाने के लिए डायनेमिक्स और फ़्रेज़िंग, और शैली के अनुसार वादन होता है। समूह में कलाकार एक-दूसरे को सुनते हैं, आवाज़ का संतुलन रखते हैं और इशारों पर चलते हैं। अच्छी तैयारी = धीमा, सही रियाज़, छोटे टुकड़ों में, फिर गति बढ़ाना और दूसरों को सुनाना।