भरतनाट्यम की प्रस्तुतियाँ (मार्गम): पुष्पांजलि से थिल्लाना
भरतनाट्यम के पूरे कार्यक्रम में प्रस्तुतियों के क्रम को मार्गम (मार्ग) कहते हैं।
- पुष्पांजलि: फूलों की अंजलि; ईश्वर, गुरु, संगीतकारों और दर्शकों को प्रणाम।
- अलारिप्पु: पहली ताल-प्रस्तुति; केवल ताल के बोल; गर्दन, आँखें और शरीर खुलते हैं।
- जतिस्वरम: स्वरों पर शुद्ध नृत्य; कोई शब्द नहीं।
- शब्दम: शब्दों वाला नृत्य; नर्तक गीत का अर्थ दिखाता है।
- वर्णम: सबसे लंबी और मुख्य प्रस्तुति; नृत्त (कदम) और नृत्य (कथा) साथ-साथ। यह कार्यक्रम का केंद्र है।
- पदम: धीमा, कोमल भाव-गीत, अक्सर प्रेम; चेहरे से गहरा अभिनय।
- जावली: छोटा, हल्का प्रेम-गीत, पदम से तेज़।
- थिल्लाना: आनंद भरा तेज़ समापन, शुद्ध कदम और सुंदर मुद्राएँ।
क्रम देखिए: पहले कथा रहित ताल, फिर कथा और भाव, अंत में शुद्ध आनंद।
विशेषताएँ: वेशभूषा, संगीत और मूल मुद्रा
वेशभूषा: प्लेटदार चटक रेशमी साड़ी जो घुटने मुड़ने पर पंखे की तरह खुलती है, कमरबंद, गहने, बालों में फूल, हाथ-पैरों पर लाल रंग और पैरों में घुँघरू।
संगीत: कर्नाटक संगीत। नट्टुवनार (गुरु) छोटी झाँझ से ताल देते हैं और ताल के बोल बोलते हैं। साथ में गायक, मृदंग, वायलिन या बाँसुरी, और कभी-कभी वीणा।
मूल मुद्रा: अरमंडी (आधा बैठना): पीठ सीधी, घुटने मुड़े और बाहर की ओर, एड़ियाँ साथ, दोनों पैरों पर बराबर भार। सारे अडवु इसी से शुरू होते हैं।
मणिपुरी प्रस्तुति: रास लीला, अभिसार और नर्तन
मणिपुरी नृत्य मणिपुर से आया है। इसकी मुख्य प्रस्तुति रास लीला है: कृष्ण, राधा और गोपियाँ कोमल घेरों में नाचते हैं। अलग-अलग ऋतुओं और कथाओं की अलग रास लीलाएँ हैं।
दो मुख्य दृश्य हैं अभिसार (राधा कृष्ण से मिलने निकलती हैं) और नर्तन (दोनों का आनंद-नृत्य)।
पुंग चोलम और करताल चोलम
पुंग चोलम ढोल का नृत्य है। पुरुष पुंग (दो मुँह वाला ढोल) बजाते हुए कूदते, घूमते और झूमते हैं। करताल चोलम झाँझ (करताल) का नृत्य है, जो ताल के साथ बजाई जाती है। दोनों मणिपुर की संकीर्तन परंपरा से आते हैं।
लास्य और तांडव; पदचालन; संपूर्ण-शरीर अभिनय
लास्य का अर्थ है कोमल, सुंदर नृत्य; तांडव का अर्थ है बलशाली, दृढ़ नृत्य। मणिपुरी में दोनों हैं: रास लीला अधिकतर लास्य है, पुंग चोलम तांडव।
पदचालन कोमल और तैरती हुई होती है; पैर फर्श को हल्के से छूते हैं, घुटने थोड़े मुड़ते हैं, और गतियाँ तीखी नहीं बल्कि गोल और बहती हुई हैं।
मणिपुरी में अभिनय पूरे शरीर से होता है: चेहरा शांत रहता है, और भाव बाँहों, हाथों, शरीर के झुकाव और चाल से दिखता है। लड़कियों की वेशभूषा में कड़ा बेलनाकार घाघरा (कुमिल) और हल्का दुपट्टा होता है, और कृष्ण धोती तथा मोरपंख वाला मुकुट पहनते हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- मार्गम क्रम: पुष्पांजलि → अलारिप्पु → जतिस्वरम → शब्दम → वर्णम → पदम → जावली → थिल्लाना
- अरमंडी = आधा बैठने की मुद्रा, घुटने बाहर
- नट्टुवनार = झाँझ से ताल देने वाले गुरु
- मणिपुरी: रास लीला, पुंग चोलम (ढोल), करताल चोलम (झाँझ), लास्य और तांडव
हल किए गए उदाहरण
1. क्रम में लगाइए: थिल्लाना, वर्णम, अलारिप्पु, पदम।
अलारिप्पु → वर्णम → पदम → थिल्लाना।
2. किन प्रस्तुतियों में कथा या शब्द नहीं, केवल कदम और ताल हैं?
अलारिप्पु (ताल के बोल) और जतिस्वरम (स्वर)। थिल्लाना भी अधिकतर शुद्ध नृत्य है।
3. वर्णम को कार्यक्रम के बीच में क्यों रखा जाता है?
यह सबसे लंबी और कठिन प्रस्तुति है, जिसमें कदम और कथा साथ हैं। तब तक नर्तक अभ्यस्त हो चुका होता है, इसलिए यह शुरुआती अभ्यास के बाद और हल्की प्रस्तुतियों से पहले आती है।
4. पुरुषों का समूह ढोल बजाते हुए कूदता और घूमता है। यह मणिपुरी की कौन सी प्रस्तुति है और लास्य है या तांडव?
पुंग चोलम। यह बलशाली है, इसलिए तांडव है।
आम गलतियाँ
- पदम और वर्णम का क्रम उलट देना। पहले वर्णम आता है; पदम उसके बाद।
- भरतनाट्यम का संगीत हिंदुस्तानी कहना। वह कर्नाटक है।
- अरमंडी को पूरा बैठना समझना। यह पीठ सीधी रखकर आधा बैठना है।
- मणिपुरी में भी भरतनाट्यम की तरह घुँघरू और तीखे कदम बताना। मणिपुरी कोमल और बहती हुई है।