शैलियाँ: यह किस तरह का चित्र है?
शैली (genre) यानी विषय का प्रकार। कलाकृति पढ़ने का पहला कदम शैली पहचानना है।
- व्यक्ति-चित्र (पोर्ट्रेट): किसी असली व्यक्ति की छवि। प्रकार: सिर-कंधे तक, आधा, पूरा, समूह-चित्र, आत्म-चित्र, घुड़सवार चित्र, राजकीय चित्र।
- भू-दृश्य (लैंडस्केप): प्रकृति या कोई जगह। उप-प्रकार: वेदुता (शहर का बारीक, सटीक दृश्य), समुद्र-दृश्य (समुद्र, जहाज़, तट), आदर्श भू-दृश्य (कल्पना की सुंदर प्रकृति)।
- दैनिक-जीवन दृश्य (genre scene): रोज़ का जीवन, जैसे बाज़ार, रसोई या खेल।
- धार्मिक दृश्य: किसी धर्म की कथाएँ और आकृतियाँ।
- पौराणिक दृश्य: देवों और नायकों की कथाएँ (यूनानी, रोमन, भारतीय महाकाव्य आदि)।
- ऐतिहासिक दृश्य: कोई बड़ी घटना, युद्ध या संधि, अक्सर बड़ा और गंभीर।
- स्थिर-जीवन (स्टिल लाइफ़): न हिलने वाली चीज़ें: फल, फूल, किताबें, बर्तन।
- मानव आकृति-अध्ययन: शरीर का अध्ययन, जो प्राचीन काल से आदर्श सुंदरता और शरीर-रचना दिखाने के लिए होता रहा है।
लंबे समय तक कला अकादमियाँ शैलियों को दर्जा देती थीं: ऊपर ऐतिहासिक चित्र, नीचे स्थिर-जीवन। आज सभी का सम्मान है।
अमूर्तन: असली से अमूर्त तक
अमूर्तन (abstraction) का मतलब है ब्योरे छोड़कर सिर्फ़ वह रखना जो कलाकार को ज़रूरी लगे: आकार, रंग, रेखा, लय।
- यथार्थवादी / आकृतिमूलक: असली चीज़ जैसा दिखता है।
- सरलीकृत / शैलीबद्ध: पहचान में आता है, पर रूप घटा दिए गए हैं (लोक कला, क्यूबिज़्म, कई भारतीय लघुचित्र शैलियाँ)।
- अमूर्त / अनाकृतिक: कोई पहचानने लायक चीज़ नहीं; बात सिर्फ़ रंग, रूप और भाव की।
अमूर्तन पुराना है: मिट्टी के बर्तनों के ज्यामितीय नमूने, इस्लामी टाइलें और कपड़ों के डिज़ाइन अमूर्त हैं। 20वीं सदी में कई चित्रकारों ने पूरी तरह अमूर्त चित्र बनाए, कुछ तीखे ज्यामितीय आकारों से, कुछ खुले, भावपूर्ण ब्रश से।
कला के काम: यह क्यों बनी?
- धार्मिक (पवित्र): पूजा या प्रार्थना के लिए: मंदिर की मूर्तियाँ, आइकन, वेदी-चित्र।
- मृतक-संबंधी: मृतकों के लिए: मक़बरे, पिरामिड, क़ब्र की वस्तुएँ।
- स्मारक: किसी व्यक्ति या घटना की याद: स्मारक, स्तंभ, स्मृति-पट्ट।
- सजावटी: जगहों और चीज़ों को सुंदर बनाना: फूलदान, कालीन, दीवार के नमूने।
- शिक्षाप्रद (डिडैक्टिक): सिखाने के लिए, अक्सर उन्हें जो पढ़ नहीं सकते थे: मंदिर की दीवारों पर कथा-पट्ट, रंगीन काँच की खिड़कियाँ।
- प्रचार: मनाने और ताक़त दिखाने के लिए: शासकों के चित्र, पोस्टर, सिक्के।
- रक्षात्मक और उपयोगी: शहर की दीवारें, द्वार और क़िले जो वास्तुकला की कृतियाँ भी हैं।
- सौंदर्य और आत्म-अभिव्यक्ति: सुंदरता और अपने भाव के लिए कला।
कई कृतियों के एक से ज़्यादा काम होते हैं: नक़्क़ाशीदार मंदिर-द्वार सजाता भी है, सिखाता भी है और पवित्र भी है।
प्रतीक और रूपक
प्रतीक वह चीज़ या रंग है जो किसी विचार के लिए खड़ा हो: कबूतर = शांति, खोपड़ी = मृत्यु, रेत-घड़ी = बीतता समय, कमल = पवित्रता, लॉरेल का हार = जीत।
रूपक (allegory) किसी अमूर्त विचार को व्यक्ति या पूरे दृश्य में बदल देता है, जो कई प्रतीकों से बना हो। न्याय एक स्त्री है जिसके पास तराज़ू (निष्पक्ष तौल), तलवार (दंड की शक्ति) और अक्सर आँखों पर पट्टी (किसी का पक्ष नहीं) होती है। दूसरे आम रूपक: चार ऋतुएँ, सद्गुण, बिगुल लिए यश, हँसिया लिए बूढ़े के रूप में समय।
स्थिर-जीवन में भी प्रतीक छिपे हो सकते हैं। मुरझाते फूल या जलती मोमबत्ती याद दिलाती है कि जीवन छोटा है (इसे वैनिटास कहते हैं)।
प्रतिमा-विज्ञान: देवताओं और संतों के चिह्न
प्रतिमा-विज्ञान (iconography) चित्रों के अर्थ का अध्ययन है। इसका मुख्य औज़ार है विशेषता-चिह्न (attribute): वह चीज़, जानवर या लक्षण जो हमेशा किसी आकृति के साथ हो।
यूनानी देवता
- ज़्यूस: वज्र, बाज़। पोसाइडन: त्रिशूल। एथेना: उल्लू, टोप, भाला। अपोलो: लायर (वाद्य), लॉरेल। हर्मीज़: पंख वाली चप्पलें और टोपी। आर्टेमिस: धनुष और हिरण।
ईसाई संत
- संत पीटर: चाबियाँ। संत कैथरीन: पहिया। संत जॉर्ज: ड्रैगन। चार सुसमाचार-लेखक: मनुष्य/देवदूत, शेर, बैल और बाज़।
हिंदू और बौद्ध कला
- शिव: त्रिशूल, डमरू, सर्प। विष्णु: शंख, चक्र, गदा, पद्म। गणेश: हाथी का सिर, मूषक। सरस्वती: वीणा, पुस्तक, हंस। बुद्ध: कमल-आसन, हाथ की मुद्राएँ, धर्मचक्र।
कोई अनजाना चिह्न मिले तो प्रतीक-कोश या प्रतिमा-विज्ञान कोश देखो: इनमें चीज़ों की सूची होती है और बताया जाता है कि हर संस्कृति में वे किसकी ओर इशारा करती हैं। एक ही चीज़ अलग संस्कृतियों में अलग अर्थ रख सकती है, इसलिए संदर्भ ज़रूर देखो।
खुद करके देखो: चार सवालों से पढ़ाई
कोई भी चित्र लो: कैलेंडर, मंदिर की दीवार, डाक टिकट या संग्रहालय की वेबसाइट। चार पंक्तियाँ लिखो: शैली: किस तरह का चित्र? अमूर्तन: यथार्थ, सरलीकृत या अमूर्त? काम: क्यों बना? प्रतीक: दो चीज़ें लिखो और अनुमान लगाओ उनका अर्थ क्या है। फिर 3D का आख़िरी चरण खोलकर चिह्न-चुनाव से खुद को परखो।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- शैली = विषय का प्रकार (व्यक्ति-चित्र, भू-दृश्य, स्थिर-जीवन…)
- वेदुता = शहर का बारीक दृश्य
- अमूर्तन: यथार्थ → सरलीकृत → अनाकृतिक
- प्रतीक = एक चीज़, एक विचार
- रूपक = प्रतीकों से बना व्यक्ति या दृश्य, जो एक विचार दिखाए
- विशेषता-चिह्न = आकृति की पहचान कराने वाली चीज़
- प्रतिमा-विज्ञान = चित्रों और प्रतीकों के अर्थ का अध्ययन
हल किए गए उदाहरण
1. एक चित्र में सेबों का कटोरा, एक सुराही और लगभग बुझी मोमबत्ती है। शैली बताओ और छिपा अर्थ सुझाओ।
शैली: स्थिर-जीवन। जलकर ख़त्म होती मोमबत्ती बीतते समय और छोटे जीवन का प्रतीक हो सकती है (वैनिटास विचार)।
2. एक मूर्ति में टोप और भाला लिए स्त्री है, पैरों के पास उल्लू है। वह कौन है?
एथेना, बुद्धि की यूनानी देवी। उल्लू, टोप और भाला उसके चिह्न हैं।
3. एक बहुत बड़े चित्र में प्रसिद्ध युद्ध है और बीच में घोड़े पर शासक। शैली और दो संभावित काम बताओ।
ऐतिहासिक दृश्य (घुड़सवार चित्र के साथ)। काम: स्मारक (घटना की याद) और प्रचार (शासक की ताक़त दिखाना)।
4. मंदिर की दीवार पर नक़्क़ाशी किसी महाकाव्य की कथा कदम-दर-कदम बताती है। मुख्य काम क्या है?
शिक्षाप्रद (कथा सिखाना) और साथ ही धार्मिक; यह सजावटी भी है।
आम गलतियाँ
- 'शैली' (विषय का प्रकार) और 'दैनिक-जीवन दृश्य' (genre scene, रोज़ का जीवन दिखाने वाली एक शैली) को मिला देना।
- यह सोचना कि अमूर्त कला का मतलब 'ख़राब ड्रॉइंग' है। अमूर्तन जान-बूझकर ब्योरे छोड़ने का चुनाव है।
- मान लेना कि हर संस्कृति में प्रतीक का एक ही अर्थ है। यूनानी कला में उल्लू बुद्धि है, दूसरी जगह कुछ और; संदर्भ देखो।
- हर प्रतीक वाले चित्र को रूपक कहना। रूपक विचार को आकृति या कथा में बदलता है; अकेला प्रतीक रूपक नहीं।