नई तकनीकें कला को बदलती हैं
तकनीक यानी लोगों का बनाया कोई औज़ार या तरीक़ा। कलाकार को नया औज़ार मिलता है तो वह ऐसा बना पाता है जो पहले असंभव था।
- लगभग 1450 – छापाख़ाना: लकड़ी या धातु पर खुदे चित्र सैकड़ों बार छपने लगे। छपे चित्र सस्ते थे, तो कला मंदिर-महलों से निकलकर घरों तक पहुँची।
- 1700–1800 के दशक – औद्योगिक क्रांति: कारख़ानों में नए रंग, सस्ता काग़ज़, लोहा और काँच बने। लोहे-काँच की इमारतों ने वास्तुकला बदल दी।
- 1841 – रंग की ट्यूब: रंग साथ ले जाना आसान हुआ। इम्प्रेशनिस्ट चित्रकार बाहर (en plein air) बदलती रोशनी पकड़ने लगे।
- 1839 – फ़ोटोग्राफ़ी और 1895 – सिनेमा: अगले भाग में।
- 1960 से – कंप्यूटर: डिजिटल चित्र, वीडियो कला, इंटरनेट, गेम, 3D प्रिंटिंग, वर्चुअल रियलिटी और अब AI चित्र।
कला और यथार्थ: फ़ोटोग्राफ़ी और सिनेमा
कैमरे से पहले चित्रकारों को चेहरे और जगहें हूबहू बनाने के पैसे मिलते थे। कैमरा यही काम सेकंडों में करता है: लेंस रोशनी को मोड़कर फ़िल्म या सेंसर पर (उल्टी) छवि बनाता है।
तब चित्रकारों ने पूछा, "चित्रकला ऐसा क्या कर सकती है जो फ़ोटो नहीं?" जवाब: तेज़ रंग, दिखते ब्रश के निशान, एक साथ कई कोण (क्यूबिज़्म) और सिर्फ़ आकार (अमूर्त कला)।
फ़ोटोग्राफ़ी ख़ुद भी कला बन गई: फ़्रेम, पल और रोशनी चुनने की कला।
सिनेमा हर सेकंड लगभग 24 स्थिर फ़्रेम दिखाता है, तो आँख को गति दिखती है। फ़िल्म में समय, एडिटिंग और आवाज़ जुड़ी। भारत का फ़िल्म उद्योग 1913 से बढ़कर दुनिया के सबसे बड़े उद्योगों में से एक बना।
पुनरुत्पादन, डिजिटलीकरण और 'मूल' कृति
पुनरुत्पादन (reproduction) यानी कलाकृति की प्रतियाँ बनाना। छपाई, फ़ोटो, रिकॉर्डिंग और इंटरनेट — हर एक ने नक़ल आसान की।
कुछ विचारकों का कहना था कि कॉपी में मूल कृति की ख़ास 'आभा' नहीं रहती — वह एक ही चीज़, एक ही जगह। दूसरों ने कहा यह अच्छी ख़बर है: अब सब महान कला देख सकते हैं।
डिजिटलीकरण चित्र और आवाज़ को संख्याओं (पिक्सेल और सैंपल) में बदलता है। डिजिटल फ़ाइल की बिल्कुल सही कॉपी मुफ़्त बनती है, उसे बेहिसाब बदला और सेकंडों में दुनिया भर भेजा जा सकता है। नए सवाल: डिजिटल कृति का मालिक कौन? AI से बनी तस्वीर कला है क्या, और उसका लेखक कौन? कलाकार अपने काम की रक्षा कैसे करें और दूसरों को श्रेय कैसे दें?
विज्ञान का उपयोग करते कलाकार और कलात्मक शोध
- परिप्रेक्ष्य (perspective): पुनर्जागरण के कलाकारों ने ज्यामिति से (रेखाएँ एक लुप्त बिंदु पर मिलती हैं) गहराई दिखाई।
- शरीर-रचना: शरीर सही बनाने के लिए कलाकारों ने उसका अध्ययन किया; लियोनार्डो दा विंची की नोटबुक में कला और विज्ञान साथ हैं।
- रंग-विज्ञान: प्रिज़्म सफ़ेद रोशनी को वर्णक्रम में बाँटता है। चित्रकारों ने पूरक रंगों और शुद्ध रंग के बिंदुओं (जो आँख में मिल जाते हैं — पॉइंटिलिज़्म) का उपयोग किया।
- प्रकाशिकी और प्रकाश-कला: ऑप आर्ट के पैटर्न आँख को धोखा देते हैं; प्रकाश-कलाकार LED और लेज़र का उपयोग करते हैं।
- बायो आर्ट और डेटा आर्ट: कुछ कलाकार जीवित कोशिकाओं, समुद्र की आवाज़ या जलवायु के आँकड़ों से काम करते हैं।
कलात्मक शोध यानी कलाकार किसी सवाल (जैसे, रात में शहर कैसा सुनाई देता है) की जाँच बनाकर और परखकर करता है, वैज्ञानिक की तरह, और नतीजे के साथ प्रक्रिया भी साझा करता है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- मुख्य शब्द – तकनीक: लोगों का बनाया औज़ार या तरीक़ा
- पुनरुत्पादन: कलाकृति की प्रतियाँ बनाना (छपाई, फ़ोटो, रिकॉर्डिंग, फ़ाइल)
- फ़्रेम दर: हर सेकंड दिखाए गए फ़्रेम; सिनेमा ≈ 24 fps
- पिक्सेल: डिजिटल चित्र का सबसे छोटा रंगीन वर्ग; चित्र का आकार = चौड़ाई × ऊँचाई (पिक्सेल में)
- परिप्रेक्ष्य: ज्यामिति से सपाट चित्र में गहराई दिखाना
- डिजिटलीकरण: चित्र और आवाज़ को संख्याओं में बदलना
- कलात्मक शोध: कला बनाकर किसी सवाल की जाँच
- समयरेखा: छपाई ≈1450 → फ़ोटो 1839 → रंग की ट्यूब 1841 → सिनेमा 1895 → कंप्यूटर 1960+ → इंटरनेट 1990 → AI चित्र 2020
हल किए गए उदाहरण
1. लगभग 1850 के बाद बहुत-से चित्रकारों ने हूबहू नक़ल बनाना क्यों छोड़ा?
कैमरा असलियत की नक़ल तेज़ और सस्ते में कर देता था। चित्रकारों ने वह खोजा जो सिर्फ़ चित्रकला कर सकती है: तेज़ रंग, ब्रश के निशान, भावनाएँ और देखने के नए ढंग।
2. एक डिजिटल चित्र 1200 पिक्सेल चौड़ा और 800 पिक्सेल ऊँचा है। कुल पिक्सेल?
1200 × 800 = 9,60,000 पिक्सेल (लगभग 1 मेगापिक्सेल)।
3. 3 सेकंड का एनिमेशन 24 फ़्रेम प्रति सेकंड पर चलता है। कितने फ़्रेम चाहिए?
24 × 3 = 72 फ़्रेम।
4. रंग की ट्यूब ने पेंटिंग की जगह कैसे बदली?
पहले रंग स्टूडियो में पीसा जाता था और जल्दी सूख जाता था। बंद ट्यूब में रंग ताज़ा रहता और साथ ले जाया जा सकता था, तो कलाकार बाहर दिन के अलग-अलग समय की असली रोशनी पकड़ने लगे।
5. एक संग्रहालय एक मशहूर पेंटिंग को ऊँची गुणवत्ता में ऑनलाइन डालता है। एक फ़ायदा और एक नुक़सान बताओ।
फ़ायदा: दुनिया में कोई भी मुफ़्त देख-पढ़ सकता है। नुक़सान: असली आकार, बनावट और मूल कृति के सामने खड़े होने का अनुभव नहीं मिलता।
आम गलतियाँ
- सोचना कि फ़ोटोग्राफ़ी ने चित्रकला ख़त्म कर दी। उसने चित्रकला का काम बदला; चित्रकला और आज़ाद हो गई।
- सोचना कि सिर्फ़ तकनीक कला बनाती है। कलाकार के विचार और चुनाव उसे कला बनाते हैं, सिर्फ़ औज़ार नहीं।
- आविष्कारों का क्रम गड़बड़ करना। कैमरा (1839) रंग की ट्यूब (1841) से थोड़ा पहले आया; छपाई लगभग 400 साल पहले।
- मान लेना कि कॉपी और मूल हर तरह से एक हैं। कॉपी में चित्र तो है पर मूल का आकार, पदार्थ और इतिहास नहीं।