फ़िल्म बनाने के तीन चरण
- पूर्व-निर्माण (योजना): विचार, शोध, पटकथा, स्टोरीबोर्ड, कलाकार चुनना (कास्टिंग), शूटिंग की जगह (लोकेशन), पोशाक और सामान, बजट और शूटिंग का समय-सारिणी। अच्छी योजना बाद में समय और पैसा बचाती है।
- निर्माण (शूटिंग): टीम शॉट और ध्वनि रिकॉर्ड करती है। हर शॉट कई बार लिया जा सकता है; हर कोशिश एक टेक है। क्लैपरबोर्ड पर दृश्य और टेक नंबर लिखे होते हैं ताकि संपादक उन्हें ढूँढ सके।
- उत्तर-निर्माण (अंतिम रूप): चित्रों का संपादन, ध्वनि साफ़ करना और मिलाना, संगीत और ध्वनि प्रभाव, कलर ग्रेडिंग, विज़ुअल इफ़ेक्ट, टाइटल और क्रेडिट। फिर फ़िल्म एक्सपोर्ट होकर दिखाई जाती है (वितरण)।
पटकथा और स्टोरीबोर्ड
पटकथा (स्क्रीनप्ले) शब्दों में कहानी है। इसमें दृश्य शीर्षक (अंदर या बाहर, जगह, दिन या रात), छोटी क्रिया पंक्तियाँ (क्या दिखता है) और हर पात्र के नाम के नीचे संवाद होते हैं। पटकथा का एक पन्ना परदे पर लगभग एक मिनट।
छोटी फ़िल्म में भी साफ़ ढाँचा चाहिए: शुरुआत (कौन, कहाँ), एक समस्या, और अंत जिसमें कुछ बदले।
तकनीकी पटकथा (शॉट सूची) हर दृश्य को नंबर वाले शॉट में बाँटती है: आकार, कोण, चाल, ध्वनि और अवधि।
स्टोरीबोर्ड फ़िल्म का कॉमिक-स्ट्रिप रूप है: हर शॉट का एक चित्र, कैमरा या अभिनेता की चाल के तीर, ध्वनि के नोट। डंडी वाले आदमी भी चलेंगे। इससे शूटिंग से पहले ही सब फ़िल्म देख लेते हैं।
कैमरे की भाषा: शॉट, कोण और चाल
शॉट के आकार
- एक्सट्रीम वाइड / एस्टैब्लिशिंग शॉट: पूरी जगह दिखाता है।
- वाइड (लॉन्ग) शॉट: आसपास के साथ पूरा शरीर।
- मीडियम शॉट: कमर से ऊपर; बातचीत और क्रिया के लिए।
- क्लोज़-अप: चेहरा; भावनाएँ दिखाता है।
- एक्सट्रीम क्लोज़-अप: एक बारीकी, जैसे आँखें या टिक-टिक करती घड़ी।
कोण
ऊँचा कोण (कैमरा नीचे देखता है) व्यक्ति को छोटा या कमज़ोर दिखाता है। आँख के स्तर पर सामान्य लगता है। नीचा कोण (कैमरा ऊपर देखता है) व्यक्ति को ताक़तवर या डरावना दिखाता है।
चाल
पैन (बाएँ-दाएँ घूमना), टिल्ट (ऊपर-नीचे घूमना), ट्रैकिंग/डॉली (कैमरा साथ चलता है), ज़ूम (लेंस बदलता है, कैमरा वहीं) और हैंडहेल्ड (हिलता हुआ, असली लगता है)।
संयोजन
तिहाई का नियम: 3 × 3 जाल सोचो और ज़रूरी चीज़ें रेखाओं पर रखो। व्यक्ति जिधर देख रहा है, उधर जगह छोड़ो। 180° नियम: बातचीत में दो अभिनेताओं के बीच की रेखा के एक ही ओर कैमरा रखो, ताकि वे जगह बदलते न लगें।
कौन क्या करता है: टीम
- निर्माता (प्रोड्यूसर): पैसा जुटाता है, बजट और समय सँभालता है।
- निर्देशक: रचनात्मक दृष्टि; अभिनेताओं और टीम को राह दिखाता है।
- पटकथा लेखक: पटकथा लिखता है।
- छायाकार / कैमरा ऑपरेटर: शॉट, लेंस और रोशनी का रूप चुनता है।
- प्रकाश टीम: लाइट लगाती है। बुनियादी व्यवस्था: की लाइट (मुख्य), फ़िल लाइट (परछाईं नरम), बैक लाइट (व्यक्ति को पृष्ठभूमि से अलग)।
- ध्वनि रिकॉर्डिस्ट और बूम ऑपरेटर: फ़्रेम के ठीक बाहर माइक रखकर साफ़ संवाद रिकॉर्ड करते हैं।
- प्रोडक्शन डिज़ाइनर, पोशाक और मेकअप: दुनिया का रूप बनाते हैं।
- अभिनेता पात्र निभाते हैं; संपादक अंतिम फ़िल्म जोड़ता है।
स्कूल की फ़िल्म में एक व्यक्ति कई काम करता है, पर काम के नाम याद रखने से कुछ छूटता नहीं।
संपादन, ध्वनि और उत्तर-निर्माण
संपादक क्लिप को टाइमलाइन पर रखता है, सबसे अच्छे टेक चुनता है, हर क्लिप का आगा-पीछा काटता है और क्रम में लगाता है। जोड़ के प्रकार:
- कट: तुरंत बदलाव; सबसे आम।
- फ़ेड / डिज़ॉल्व: धीमा बदलाव, अक्सर समय बीतना दिखाता है।
- मैच कट: मिलते आकार या चाल वाले दो शॉट जोड़ना।
- क्रॉस-कटिंग: दो जगहों के बीच आना-जाना, एक साथ होती घटनाएँ दिखाने को।
निरंतरता संपादन समय और जगह साफ़ रखता है ताकि कट महसूस न हों। मॉन्टाज कई छोटे शॉट जोड़कर बहुत सारा समय जल्दी दिखाता है।
ध्वनि फ़िल्म का आधा हिस्सा है: संवाद, ध्वनि प्रभाव, परिवेश ध्वनि और संगीत। डाइजेटिक ध्वनि कहानी की दुनिया से आती है (दरवाज़ा बंद होना); नॉन-डाइजेटिक दर्शकों के लिए जोड़ी जाती है (पृष्ठभूमि संगीत)। आख़िर में कलर ग्रेडिंग मूड बनाती है, और टाइटल व क्रेडिट जुड़ते हैं।
एनिमेशन की सरल तकनीकें
एनिमेशन आँख को चकमा देता है: कई स्थिर चित्र तेज़ी से दिखाओ तो चलते लगते हैं। फ़िल्में आमतौर पर 24 फ़्रेम प्रति सेकंड (fps) दिखाती हैं; सरल एनिमेशन 12 fps पर, हर चित्र दो फ़्रेम तक।
- फ़्लिपबुक: हर पन्ने पर थोड़ा बदला चित्र; पन्ने तेज़ी से पलटो।
- स्टॉप मोशन: मिट्टी की आकृति या खिलौना ज़रा-सा हिलाओ, फ़ोटो लो, दोहराओ। 12 fps पर 12 फ़ोटो = एक सेकंड।
- कट-आउट एनिमेशन: काग़ज़ के आकार मेज़ पर हिलाना।
- 2D डिजिटल एनिमेशन: कंप्यूटर पर चित्र, की-फ़्रेम और बीच के फ़्रेम से।
- 3D कंप्यूटर एनिमेशन: सॉफ़्टवेयर में मॉडल बनाकर चलाना।
अच्छे एनिमेशन के नियम: छोटी, बराबर चालें; कैमरा स्थिर; फ़ोटो के बीच रोशनी न बदले।
करके देखो: एक मिनट की फ़ोन फ़िल्म
तीन पंक्तियों में कहानी लिखो: किसी को कुछ चाहिए, एक मुश्किल आती है, अंत में कुछ बदलता है। 6 चित्रों का स्टोरीबोर्ड बनाओ। हर चित्र फ़ोन से शूट करो: कम से कम एक वाइड, एक मीडियम और एक क्लोज़-अप। चेहरे पर खिड़की की रोशनी डालो। क्लिप क्रम में जोड़ो, फ़ालतू सेकंड काटो, एक ध्वनि प्रभाव और संगीत जोड़ो। परिवार को दिखाओ और पूछो: क्या बिना समझाए कहानी समझ आई?
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- मुख्य शब्द: पूर्व-निर्माण → निर्माण → उत्तर-निर्माण
- मुख्य शब्द: शॉट आकार = वाइड (कहाँ) · मीडियम (क्या) · क्लोज़-अप (भावना)
- मुख्य शब्द: कोण = ऊँचा (कमज़ोर) · आँख के स्तर (सामान्य) · नीचा (ताक़तवर)
- मुख्य शब्द: फ़्रेम प्रति सेकंड (fps): फ़िल्म 24 fps; ज़रूरी फ़्रेम = सेकंड × fps
- मुख्य शब्द: पटकथा का 1 पन्ना ≈ परदे पर 1 मिनट
हल किए गए उदाहरण
1. दर्शकों को लगे कि विशाल रोबोट बहुत ताक़तवर है। कौन-सा कोण लोगे?
नीचा कोण: कैमरा नीचे रखकर रोबोट की ओर ऊपर देखो। इससे वह बड़ा और ताक़तवर लगता है।
2. स्टॉप-मोशन क्लिप 12 fps पर 8 सेकंड की चाहिए। कितनी फ़ोटो?
फ़्रेम = सेकंड × fps = 8 × 12 = 96 फ़ोटो।
3. पटकथा 5 पन्नों की है। फ़िल्म लगभग कितनी लंबी होगी?
लगभग 1 मिनट प्रति पन्ना, यानी करीब 5 मिनट।
4. 'पार्क में एक लड़की को खोया पिल्ला मिलता है' के लिए तीन शॉट सोचो।
1) पार्क का वाइड शॉट (हम कहाँ हैं?)। 2) लड़की आवाज़ सुनकर मुड़ती है, मीडियम शॉट (क्या हो रहा है?)। 3) पिल्ला दौड़कर आता है तो मुस्कुराता चेहरा, क्लोज़-अप (उसे कैसा लगा?)।
आम गलतियाँ
- बिना स्टोरीबोर्ड या शॉट सूची के शूटिंग शुरू करना, फिर शॉट भूलना और समय गँवाना।
- फ़ोन दूर रखकर ध्वनि रिकॉर्ड करना। ख़राब ध्वनि ख़राब चित्र से जल्दी फ़िल्म बिगाड़ती है; माइक पास रखो।
- सिर्फ़ मीडियम शॉट लेना। जगह, क्रिया और भावना दिखाने को वाइड, मीडियम और क्लोज़-अप मिलाओ।
- ज़ूम और ट्रैकिंग को एक समझना। ज़ूम में लेंस बदलता है; ट्रैकिंग में पूरा कैमरा चलता है।