स्थिर और चलती तस्वीरें
फ़ोटो एक स्थिर तस्वीर है। फ़िल्म बहुत-सी स्थिर तस्वीरें तेज़ी से दिखाती है; हर तस्वीर एक फ़्रेम। सिनेमा आम तौर पर 24 फ़्रेम प्रति सेकंड (fps) दिखाता है; टीवी-वीडियो 25 या 30। आँख और दिमाग़ फ़्रेमों को मिलाकर चिकनी गति बना देते हैं।
लगभग 12–16 fps से कम पर गति झटकेदार लगती है। जितने फ़्रेम खींचे, उससे धीमे दिखाओ तो स्लो-मोशन। फ़्लिप-बुक भी ऐसे ही चलती है।
आम दृश्य-श्रव्य (audiovisual) रूप: फ़ीचर फ़िल्म, लघु फ़िल्म, वृत्तचित्र, एनीमेशन, टीवी धारावाहिक, म्यूज़िक वीडियो, विज्ञापन, वेब वीडियो।
फ़िल्म की भाषा: शॉट, कोण और चाल
शॉट का आकार:
- एक्सट्रीम वाइड / एस्टैब्लिशिंग शॉट: बताता है हम कहाँ हैं।
- वाइड शॉट: पूरा शरीर और आसपास।
- मीडियम शॉट: कमर से ऊपर; बातचीत के लिए।
- क्लोज़-अप: चेहरा; भावना।
- एक्सट्रीम क्लोज़-अप: एक बारीक चीज़, जैसे आँखें।
कैमरा कोण: आँख के स्तर पर (सामान्य), high angle (ऊपर से; पात्र कमज़ोर), low angle (नीचे से; ताक़तवर), डच टिल्ट (टेढ़ा; बेचैनी)।
कैमरा की चाल: पैन (दाएँ-बाएँ घूमना), टिल्ट (ऊपर-नीचे), ट्रैकिंग/डॉली (कैमरा ख़ुद चलता है), ज़ूम (लेंस बदलना), हैंडहेल्ड (हिलता, असली-सा)।
मीज़-आँ-सेन, रोशनी और ध्वनि
मीज़-आँ-सेन (फ़्रेंच: "दृश्य में रखना") यानी कैमरे के सामने रखी हर चीज़: सेट, सामान, पोशाक, मेकअप, कलाकारों की चाल और रोशनी।
रोशनी: हाई-की (उजली, कम परछाई; कॉमेडी) और लो-की (अँधेरी, गहरी परछाई; थ्रिलर, हॉरर)। अक्सर तीन-बिंदु रोशनी: की लाइट, फ़िल लाइट, बैक लाइट।
ध्वनि: संवाद, ध्वनि प्रभाव, संगीत और चुप्पी। डाइजेटिक ध्वनि कहानी की दुनिया के अंदर से आती है (बजता रेडियो); नॉन-डाइजेटिक दर्शकों के लिए जोड़ी जाती है (पृष्ठभूमि संगीत, सूत्रधार)।
संपादन: शॉट जोड़ना
संपादन (editing) शॉट चुनता और क्रम देता है। सबसे आम जोड़ कट है; दूसरे: फ़ेड, डिज़ॉल्व, वाइप।
- निरंतरता संपादन: समय और जगह साफ़ रहती है, कट दिखते नहीं।
- 180° नियम: बात करते दो लोगों के बीच काल्पनिक रेखा; कैमरा एक ही तरफ़, ताकि हर कोई परदे पर एक ही दिशा में देखे।
- शॉट / रिवर्स शॉट: बातचीत में दोनों के बीच कट।
- मोंटाज: छोटे शॉटों की लड़ी, समय बीतना या कोई विचार दिखाने को।
- क्रॉस-कटिंग: एक साथ हो रही दो घटनाओं के बीच अदला-बदली।
तेज़ कट रोमांच बढ़ाते हैं; लंबे टेक शांति या तनाव।
सिनेमा का छोटा इतिहास और आंदोलन
- 1820–1830 का दशक: पहली तस्वीरें (फ़ोटोग्राफ़ी)।
- 1895: लुमिएर भाइयों ने पेरिस में टिकट लेकर फ़िल्में दिखाईं। शुरुआती फ़िल्में मूक, श्वेत-श्याम।
- 1913: दादासाहेब फाल्के की राजा हरिश्चंद्र, भारत की पहली पूरी लंबाई वाली फ़िल्म।
- 1920 का दशक: जर्मन अभिव्यंजनावाद (टेढ़े सेट, गहरी परछाइयाँ) और सोवियत मोंटाज (संपादन से अर्थ)।
- 1920 के दशक का अंत: आवाज़ आई। भारत की पहली बोलती फ़िल्म आलम आरा 1931 में।
- 1930–1950: स्टूडियो युग, रंगीन फ़िल्में फैलीं।
- 1940 का दशक: इतालवी नवयथार्थवाद: असली गलियाँ, आम लोग, ग़ैर-पेशेवर कलाकार।
- 1950 के अंत–1960: फ़्रेंच न्यू वेव: हाथ में कैमरा, जंप कट, निजी कहानियाँ। भारत में समानांतर सिनेमा (जैसे सत्यजित राय की पथेर पांचाली, 1955)।
- 1990 से आज: डिजिटल कैमरे, कंप्यूटर प्रभाव (CGI), स्ट्रीमिंग।
फ़िल्म और जीवन
फ़िल्में समाज का आईना भी हैं और उसे बदलती भी हैं। वे परिवार, दोस्ती, काम और टकराव दिखाती हैं और दूसरों को देखने का हमारा नज़रिया बदल सकती हैं।
समझदार दर्शक बनो: फ़िल्में रूढ़िवादी छवि (stereotype) दिखा सकती हैं, चीज़ें बेच सकती हैं, बुरी आदतों को चमकदार बना सकती हैं। उम्र-श्रेणी देखो (भारत में U, U/A, A) और पूछो: यह किसने बनाई और क्यों?
फ़िल्म रसास्वादन और समीक्षा
अच्छी समीक्षा के चार हिस्से:
- वर्णन: नाम, निर्देशक, वर्ष, शैली, बिना राज़ खोले छोटी कहानी।
- विश्लेषण: एक-दो मुख्य दृश्यों में शॉट, रोशनी, ध्वनि, अभिनय, संपादन कैसे काम करते हैं।
- अर्थ: फ़िल्म क्या कहना चाहती है? विषय और संदेश।
- निर्णय: तुम्हारी राय, कारण और फ़िल्म से सबूत के साथ।
शैली (genre): जानी-पहचानी बनावट वाली फ़िल्मों का प्रकार: कॉमेडी, ड्रामा, थ्रिलर, हॉरर, विज्ञान-कथा, म्यूज़िकल, वृत्तचित्र, एनीमेशन।
खुद करके देखो
3D में पहले 4 fps, फिर 24 fps रखो और फ़र्क़ देखो। घर पर: 12 पन्नों की उछलती गेंद वाली फ़्लिप-बुक बनाओ। फिर फ़ोन से एक ही व्यक्ति को ऊपर से और नीचे से फ़िल्माओ, और हर एक पर एक पंक्ति लिखो कि कैसा लगा।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- सामान्य फ़िल्म गति: 24 फ़्रेम प्रति सेकंड
- शॉट: एक्सट्रीम वाइड → वाइड → मीडियम → क्लोज़-अप → एक्सट्रीम क्लोज़-अप
- कोण: आँख का स्तर (सामान्य), high (कमज़ोर), low (ताक़तवर), डच टिल्ट (बेचैनी)
- रोशनी: हाई-की = उजली, लो-की = अँधेरी
- समीक्षा: वर्णन → विश्लेषण → अर्थ → निर्णय
हल किए गए उदाहरण
1. फ़िल्म 24 fps पर चलती है। 2 मिनट की क्लिप में कितने फ़्रेम?
2 मिनट = 120 सेकंड। 120 × 24 = 2 880 फ़्रेम।
2. दृश्य पहाड़ी से पूरे शहर से शुरू होकर एक लड़की की भीगी आँखों पर आता है। दोनों शॉट और उनका मक़सद बताओ।
पहला एक्सट्रीम वाइड (एस्टैब्लिशिंग) शॉट, जगह बताता है। फिर एक्सट्रीम क्लोज़-अप, उसकी भावना दिखाता है।
3. खलनायक को नीचे से, एक तरफ़ की धीमी रोशनी में दिखाया गया। इसका क्या अर्थ?
low angle उसे ताक़तवर और ख़तरनाक दिखाता है; लो-की रोशनी रहस्य और डर जोड़ती है।
4. मेज़ पर दो दोस्त बात कर रहे हैं। एक शॉट में A बाईं ओर है; कट के बाद अचानक दाईं ओर। ग़लती क्या है?
कैमरा 180° रेखा पार कर गया। दोनों के बीच की रेखा के एक ही तरफ़ कैमरा रखो।
5. पीछा करने वाले दृश्य की समीक्षा के लिए एक 'विश्लेषण' वाक्य लिखो।
उदाहरण: "हाथ में पकड़े कैमरे के क्लोज़-अप और बाज़ार के वाइड शॉटों के बीच तेज़ कट पीछा करने को साँस फुलाने वाला और अफ़रा-तफ़री भरा बनाते हैं।"
आम गलतियाँ
- ज़ूम (लेंस बदलना) और ट्रैकिंग (कैमरा ख़ुद चलना) को एक समझना।
- सोचना कि high angle का मतलब कैमरा दूर है। कोण ऊँचाई है; शॉट का आकार दूरी।
- समीक्षा में सिर्फ़ कहानी बताना, यह नहीं कि फ़िल्म असर कैसे पैदा करती है।
- सोचना कि डाइजेटिक ध्वनि सिर्फ़ संवाद है। कहानी की दुनिया की हर आवाज़ डाइजेटिक है।