National Year 12 Film Studies
अध्याय: 4
1. Core study areas
Area 1: Key elements of film form · Area 2: Meaning and response · Area 3: Contexts of film
- फ़िल्म अध्ययन: फ़िल्में कहानी कैसे कहती हैं – फ़िल्म तेज़ी से चलती स्थिर तस्वीरों (फ़्रेम) की लड़ी है जिसे दिमाग़ गति की तरह देखता है। फ़िल्मकार एक दृश्य भाषा बोलते हैं: शॉट का आकार, कैमरा कोण, कैमरा की चाल, रोशनी, मीज़-आँ-सेन, ध्वनि और संपादन। हर चुनाव हमारी भावना बदलता है। सिनेमा 1890 के दशक में शुरू हुआ, 1920 के दशक के अंत में आवाज़ आई, फिर रंग; सोवियत मोंटाज, इतालवी नवयथार्थवाद, फ़्रेंच न्यू वेव और भारतीय समानांतर सिनेमा जैसे आंदोलन आए। फ़िल्म समीक्षा का मतलब है सबूत के साथ वर्णन, विश्लेषण, अर्थ और निर्णय।
- फ़िल्म विश्लेषण: फ़िल्में अर्थ कैसे बनाती हैं – फ़िल्म विश्लेषण पूछता है कि फ़िल्म अर्थ कैसे बनाती है और हम कैसे प्रतिक्रिया देते हैं। पहले बताओ परदे पर क्या है (डिनोटेशन), फिर उसका इशारा क्या है (कोनोटेशन)। फ़िल्म लोगों और जगहों का प्रतिनिधित्व करती है: कौन बीच में है, कौन बोलता है, लिंग, उम्र, वर्ग, संस्कृति और जगहें कैसे दिखाई गईं; इससे रूढ़ियाँ मज़बूत भी हो सकती हैं और टूट भी सकती हैं। फ़िल्म एक सौंदर्य माध्यम भी है: फ़्रेम, रंग, लय और ध्वनि अपनी सुंदरता के लिए भी सराहे जाते हैं। दर्शक अलग-अलग पढ़ते हैं (स्वीकार, आंशिक स्वीकार, विरोध), पर हर पढ़त के लिए फ़िल्म से सबूत चाहिए।
- फ़िल्म के संदर्भ: फ़िल्म के चारों ओर की दुनिया – हर फ़िल्म किसी ख़ास समय, जगह में, ख़ास लोगों द्वारा, ख़ास पैसे और औज़ारों से बनती है। यही उसके संदर्भ हैं। सामाजिक संदर्भ: लोग कैसे जीते थे (परिवार, वर्ग, लिंग, काम)। सांस्कृतिक: उस दौर की कला, संगीत, फ़ैशन, विचार। राजनीतिक: सरकार, युद्ध, आंदोलन, क़ानून, सेंसर। संस्थागत: फ़िल्म किसने बनाई और पैसा किसने दिया — बड़ा स्टूडियो या स्वतंत्र कंपनी, बजट, सितारे, वितरण, रेटिंग, फ़िल्म महोत्सव। तकनीकी/निर्माण: ध्वनि, रंग, चौड़ी स्क्रीन, हल्के कैमरे, डिजिटल, CGI। संदर्भ समझाता है कि फ़िल्म जैसी दिखती और कहती है, वैसी क्यों है, और उस समय के दर्शकों ने उसे कैसे लिया।
2. Component 1 Section A: Hollywood 1930-1990 (comparative)
Classical Hollywood 1930-1960 (one film) · New Hollywood 1961-1990 (one film) · Specialist area: the auteur
- हॉलीवुड 1930–1990: स्टूडियो सिस्टम से न्यू हॉलीवुड तक – क्लासिकल हॉलीवुड (लगभग 1930–1960) में कुछ बड़े स्टूडियो फ़िल्में बनाते, बाँटते और अपने सिनेमाघरों में दिखाते थे (वर्टिकल इंटीग्रेशन)। सितारे और निर्देशक लंबे अनुबंध पर थे, फ़िल्में जॉनर में बनती थीं, और शैली 'अदृश्य' थी: साफ़ कारण-परिणाम, लक्ष्य वाला नायक, निरंतर संपादन, बंद अंत। 1934 से सख़्ती से लागू प्रोडक्शन कोड ने सेक्स, हिंसा, अपराध पर रोक लगाई। 1948 के पैरामाउंट फ़ैसले से स्टूडियो को सिनेमाघर बेचने पड़े, और टीवी ने दर्शक छीने। न्यू हॉलीवुड (लगभग 1967–1980) में युवा निर्देशक, एंटीहीरो, खुले अंत, यूरोपीय प्रभाव और सामाजिक मुद्दे आए; 1968 में कोड की जगह उम्र-रेटिंग आई। 1975 से ब्लॉकबस्टर ने उद्योग फिर बदल दिया।
- ऑत्योर सिद्धांत: क्या निर्देशक फ़िल्म का लेखक है? – ऑत्योर सिद्धांत कहता है कि एक मज़बूत निर्देशक फ़िल्म का असली 'लेखक' (फ़्रेंच में auteur) है, और उसकी फ़िल्मों पर एक निजी छाप होती है: बार-बार आने वाले विषय, दृश्य शैली, पात्रों के प्रकार, संगीत या अभिनेता। यह विचार 1950 के दशक में फ़्रांसीसी पत्रिका Cahiers du cinéma के आलोचकों से आया (त्रूफ़ो का 1954 का लेख)। उन्होंने हिचकॉक, हॉक्स, फ़ोर्ड जैसे हॉलीवुड स्टूडियो निर्देशकों की तारीफ़ की। अमेरिकी आलोचक ऐंड्रयू सैरिस (1962) ने तीन घेरे बताए: तकनीकी कौशल, पहचानी जाने वाली निजी शैली और 'आंतरिक अर्थ'। सिद्धांत किसी निर्देशक के काम में पैटर्न देखने में मदद करता है, पर आलोचक कहते हैं कि फ़िल्म टीमवर्क है और स्टूडियो, सितारे, लेखक, जॉनर भी फ़िल्म गढ़ते हैं।
3. Component 1 Section B: American film since 2012
Mainstream and independent pair · Specialist area: spectatorship
- 2012 के बाद अमेरिकी फ़िल्म: मुख्यधारा और स्वतंत्र – अमेरिकी सिनेमा की दो जुड़ी दुनिया हैं। मुख्यधारा फ़िल्में बड़े स्टूडियो से आती हैं: बड़ा बजट, सितारे और हज़ारों पर्दों पर रिलीज़। स्वतंत्र (इंडी) फ़िल्में बड़े स्टूडियो के बाहर बनती हैं: छोटा बजट, ज़्यादा रचनात्मक जोखिम, और फ़ेस्टिवल व लोगों की चर्चा से धीरे-धीरे फैलती रिलीज़। तुलनात्मक अध्ययन में एक मुख्यधारा और एक स्वतंत्र फ़िल्म की जोड़ी को फ़िल्म-रूप (कैमरा, मीज़-आँ-सेन, संपादन, ध्वनि, अभिनय) और संदर्भ (कब, कैसे, क्यों बनी) से पढ़ते हैं और साझा विषयों की तुलना करते हैं।
- दर्शकत्व: हम फ़िल्में और नाटक कैसे देखते हैं – दर्शकत्व इस बात का अध्ययन है कि दर्शक फ़िल्में और प्रस्तुतियाँ कैसे देखते, महसूस करते और उनसे अर्थ बनाते हैं। पुराने विचार दर्शक को निष्क्रिय मानते थे, जो बस संदेश सोख लेता है। नए विचार उसे सक्रिय मानते हैं: वह अनुमान लगाता, परखता, महसूस करता और अपना जीवन जोड़ता है। फ़िल्में कैमरा, संपादन, ध्वनि और दृष्टिकोण से दर्शक को एक जगह रखती हैं, फिर भी अलग लोग एक ही फ़िल्म को अलग पढ़ सकते हैं। लाइव रंगमंच कलाकार और दर्शक के बीच दोतरफ़ा रिश्ता जोड़ता है।
4. Component 1 Section C: British film since 1995
Two British films · Specialist areas: narrative and ideology
- 1995 के बाद ब्रिटिश फ़िल्म – 1995 के बाद की ब्रिटिश फ़िल्में आमतौर पर साधारण बजट पर बनती हैं, जिनमें पैसा कई जगह से जुड़ता है: सार्वजनिक धन, टीवी चैनलों की फ़िल्म शाखाएँ, निजी और विदेशी निवेशक, और कर छूट। कई फ़िल्में सामाजिक यथार्थवाद (असली जगहें, हाथ का कैमरा, प्राकृतिक रोशनी) से आम ज़िंदगी दिखाती हैं, तो कुछ शैलियाँ मिलाती हैं या कला-सिनेमा का रास्ता लेती हैं। बार-बार आने वाले विषय: वर्ग, युवा, पहचान, अपनापन, आस्था और अतीत की स्मृति। दो ब्रिटिश फ़िल्में पढ़ने के लिए फ़िल्म-रूप, संदर्भ और हर फ़िल्म के विचारों का विश्लेषण करो, फिर तुलना करो।