South 고등학교 2학년 Life Science
अध्याय: 3
1. Organisation of living systems
Features of life and life science · Levels from cell to ecosystem · Energy in metabolism · Organ systems working together · Metabolic diseases · Ecosystem structure and cycles · Populations and communities
- जीवन के लक्षण (सजीवों की विशेषताएँ) – सजीवों में कुछ साझा लक्षण होते हैं: वे कोशिकाओं से बने होते हैं, ऊर्जा का उपयोग करते हैं (उपापचय), आसपास के बदलाव पर प्रतिक्रिया करते हैं, अपने अंदर की हालत स्थिर रखते हैं (समस्थापन), बढ़ते हैं, प्रजनन करते हैं, और समूह के रूप में पीढ़ियों में अनुकूलित होते हैं। जिसमें ये सब हों, वही सजीव है। वायरस सीमा पर है, क्योंकि वह केवल किसी कोशिका के अंदर ही अपनी प्रतियाँ बनाता है।
- संगठन के स्तर: कोशिका से जीवमंडल तक – जीवन सीढ़ी की तरह स्तरों में बना है, जैसे डिब्बे के अंदर डिब्बा। कोशिकाएँ मिलकर ऊतक बनाती हैं, ऊतक मिलकर अंग, अंग मिलकर अंग तंत्र और अंग तंत्र मिलकर पूरा जीव। एक जाति के जीव मिलकर समष्टि बनाते हैं; कई समष्टियाँ मिलकर समुदाय; समुदाय और उसके आस-पास की निर्जीव चीज़ें मिलकर पारितंत्र; और धरती के सारे पारितंत्र मिलकर जीवमंडल। हर स्तर अपने नीचे वाले स्तर से बनता है और कुछ नया कर सकता है।
- उपापचय: कोशिका कैसे तोड़ती, बनाती और ऊर्जा चलाती है – उपापचय (metabolism) शरीर के अंदर होने वाली सभी रासायनिक क्रियाओं का नाम है. बड़े अणुओं को छोटे टुकड़ों में तोड़ना अपचय (catabolism) है; इसमें ऊर्जा निकलती है. छोटे अणुओं को जोड़कर बड़ा बनाना उपचय (anabolism) है; इसमें ऊर्जा लगती है. ATP इन दोनों के बीच ऊर्जा ले जाता है, जैसे रिचार्ज होने वाली बैटरी. हर क्रिया का अपना एंज़ाइम होता है और क्रियाएँ जुड़कर उपापचयी पथ बनाती हैं.
- मानव शरीर के अंग तंत्र – हमारा शरीर स्तरों में बना है: कोशिकाएँ मिलकर ऊतक, ऊतक मिलकर अंग, अंग मिलकर अंग तंत्र और सारे तंत्र मिलकर पूरा जीव यानी हम। हर तंत्र का एक मुख्य काम है: कंकाल (ढाँचा), पेशी (गति), परिसंचरण (ढुलाई), श्वसन (गैसों का लेन-देन), पाचन (भोजन), उत्सर्जन (कचरा), तंत्रिका और अंतःस्रावी (नियंत्रण), प्रतिरक्षा (बचाव), त्वचा तंत्र और जनन तंत्र। कोई तंत्र अकेले काम नहीं करता: व्यायाम में पेशियाँ, दिल, फेफड़े और नसें साथ बदलकर शरीर के अंदर का हाल स्थिर रखते हैं (समस्थिति)।
- चयापचय रोग: डायबिटीज़ और रक्त शुगर – चयापचय रोग तब होते हैं जब शरीर ऊर्जा और पोषक तत्वों को ठीक से संभाल नहीं पाता। डायबिटीज़ (मधुमेह) में रक्त में ग्लूकोज़ बहुत ज़्यादा रहता है, या तो इंसुलिन कम बनता है (टाइप 1) या कोशिकाएँ इंसुलिन की बात नहीं मानतीं (टाइप 2)। खान-पान, कसरत और दवा से शुगर काबू में रहती है।
- जीव और समष्टियाँ: वृद्धि और पारस्परिक क्रिया – समष्टि (population) यानी एक ही जाति के वे सब जीव जो एक समय पर एक जगह रहते हैं। समष्टि के ऐसे गुण होते हैं जो अकेले जीव में नहीं होते: घनत्व, जन्म दर, मृत्यु दर, लिंग अनुपात और आयु संरचना। जन्म और आप्रवासन से N बढ़ता है, मृत्यु और उत्प्रवासन से घटता है। भोजन असीमित हो तो तेज़ वृद्धि (J-वक्र, dN/dt = rN); सीमित हो तो वृद्धि धीमी होकर वहन क्षमता K पर रुकती है (S-वक्र, dN/dt = rN(1 − N/K))। जातियाँ एक-दूसरे पर असर डालती हैं: सहोपकारिता (+/+), स्पर्धा (−/−), परभक्षण और परजीविता (+/−), सहभोजिता (+/0), असहभोजिता (−/0)।
2. Homeostasis and control
Neurons · Synapses · Human nervous system · Hormones and homeostasis · Pathogens · Antigen-antibody specificity · Vaccines
- तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय – समन्वय यानी अंगों का मिलकर काम करना। तंत्रिका तंत्र यह तेज़ी से तंत्रिका कोशिकाओं से करता है। तंत्रिका कोशिका में कोशिका काय, द्रुमिकाएँ और तंत्रिकाक्ष हैं; कई तंत्रिकाक्षों पर रैनवियर पर्व वाला माइलिन आच्छद है। केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (मस्तिष्क, मेरुरज्जु) सूचना संसाधित करता है; परिधीय तंत्र (तंत्रिकाएँ) उसे ढोता है। PNS के दो भाग: कायिक (कंकाली पेशियाँ) और स्वायत्त (अनुकंपी, परानुकंपी), जो अंदर के अंगों यानी अंतरंग तंत्र को चलाता है। आराम में तंत्रिकाक्ष ध्रुवित है: अंदर −, बाहर +, लगभग −70 mV। उद्दीपन से Na+ अंदर आकर क्रिया विभव बनाता है जो आगे दौड़ता है। सिनैप्स पर तंत्रिका संचारी संकेत अगली कोशिका तक पहुँचाते हैं।
- रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण – हॉर्मोन रासायनिक संदेशवाहक हैं जो नलिकाविहीन (अंतःस्रावी) ग्रंथियाँ बहुत कम मात्रा में बनाती हैं। ये रक्त में चलकर सही ग्राही वाली लक्ष्य कोशिकाओं पर काम करते हैं। हाइपोथैलेमस पीयूष को, और पीयूष कई ग्रंथियों को नियंत्रित करता है; ऋणात्मक पुनर्निवेशन स्तर स्थिर रखता है। मुख्य ग्रंथियाँ: पीनियल, पीयूष, थायरॉयड, पैराथायरॉयड, थाइमस, एड्रीनल, अग्न्याशय (द्वीप), वृषण, अंडाशय। हृदय, वृक्क, आहारनाल भी हॉर्मोन बनाते हैं। प्रोटीन हॉर्मोन झिल्ली ग्राही और cAMP जैसे द्वितीयक संदेशवाहक से; स्टेरॉयड व थायरॉयड हॉर्मोन कोशिका में जाकर जीन बदलते हैं। बहुत कम (अल्पस्राव) या बहुत ज़्यादा (अतिस्राव) हॉर्मोन से बौनापन, महाकायता, गलगंड, मधुमेह, एडिसन, कुशिंग जैसे रोग होते हैं।
- मानव स्वास्थ्य तथा रोग – स्वास्थ्य का मतलब है शरीर, मन और सामाजिक जीवन तीनों ठीक हों। रोग कई बार कीटाणुओं (रोगजनक) से होते हैं: जीवाणु, वायरस, प्रोटोज़ोआ, कृमि और कवक। शरीर दो तरह की प्रतिरक्षा से लड़ता है: सहज (जन्म से) और उपार्जित (सीखी हुई, याद रखने वाली)। टीके इसी याददाश्त का उपयोग करते हैं। HIV सहायक T कोशिकाओं को नष्ट करके एड्स करता है। कैंसर में कोशिकाएँ बिना रुके बँटती हैं। नशा और शराब किशोरों के शरीर और मन को नुकसान पहुँचाते हैं।
3. Continuity and diversity of life
Chromosomes, DNA and genes · Meiosis vs mitosis · Evolution · Classification of life · Animal and plant phyla
- आनुवंशिकता और मेंडल के नियम – माता-पिता से बच्चों में लक्षणों का जाना आनुवंशिकता है। हर लक्षण के लिए माँ और पिता दोनों एक-एक जीन देते हैं। प्रभावी जीन अप्रभावी को छुपा देता है, इसलिए एकसंकर में 3:1 और द्विसंकर में 9:3:3:1 अनुपात आता है। जीन DNA का टुकड़ा है जो प्रोटीन बनवाता है, और प्रोटीन से लक्षण बनता है।
- कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन – कोशिका एक तय क्रम में बढ़ती है, DNA दोहराती है और बँटती है – इसे कोशिका चक्र कहते हैं: अंतरावस्था (G1, S, G2) और M प्रावस्था। S प्रावस्था में DNA दोगुना (2C → 4C) होता है, पर गुणसूत्र संख्या वही रहती है। समसूत्री विभाजन (पूर्वावस्था, मध्यावस्था, पश्चावस्था, अंत्यावस्था) और कोशिकाद्रव्य विभाजन से जनक जैसी दो कोशिकाएँ बनती हैं – यह समीकरणीय विभाजन वृद्धि और मरम्मत के लिए है। अर्धसूत्री विभाजन में दो विभाजन होते हैं; अर्धसूत्री I में समजात गुणसूत्र जोड़ा बनाते हैं, जीन विनिमय करते हैं और अलग होते हैं, जिससे गुणसूत्र संख्या आधी (2n → n) होती है। इससे युग्मकों के लिए चार अगुणित कोशिकाएँ बनती हैं और विविधता आती है।
- विकास: नए प्रकार के जीव कैसे बनते हैं – जनन के समय विविधताएँ आती हैं। प्रकृति उन विविधताओं को चुनती है जो जीवित रहने में मदद करें, और कई पीढ़ियों में आबादी बदल जाती है: यही विकास है। सिर्फ़ वंशागत (DNA वाले) बदलाव आगे जाते हैं, उपार्जित नहीं। अलग हुई आबादियाँ नई जातियाँ बन सकती हैं। समजात अंग, समरूप अंग और जीवाश्म बताते हैं कि कौन किससे संबंधित है, और जटिल अंग चरण-दर-चरण बने।
- जीव जगत का वर्गीकरण – व्हिटेकर (1969) ने जीवों को पाँच जगत में बाँटा: मोनेरा, प्रोटिस्टा, कवक, पादप और जंतु। आधार थे: कोशिका का प्रकार, कोशिका भित्ति, शरीर की बनावट, पोषण का तरीका, जनन और आपसी संबंध। मोनेरा प्रोकैरियोट हैं (बैक्टीरिया, आर्कीबैक्टीरिया, सायनोबैक्टीरिया, माइकोप्लाज़्मा)। प्रोटिस्टा एककोशिकी यूकैरियोट हैं, पाँच समूहों में। कवक काइटिन भित्ति वाले परपोषी हैं, चार वर्गों में। लाइकेन शैवाल और कवक की साझेदारी है। वायरस, विरोइड और प्रायन किसी जगत में नहीं।
- जीवों में विविधता और वर्गीकरण – धरती पर लाखों तरह के जीव हैं, और भारत सबसे समृद्ध जगहों में है। इन्हें पढ़ने के लिए हम आसान सवाल पूछकर समूह बनाते हैं: केंद्रक है या नहीं? एक कोशिका या कई? भोजन खुद बनाता है? इससे पाँच जगत बनते हैं: मोनेरा, प्रोटिस्टा, कवक, पादप और जंतु। जंतु अकशेरुकी और कशेरुकी में बँटते हैं। हर जाति का दो शब्दों का वैज्ञानिक नाम होता है। वायरस कोशिका नहीं है, इसलिए किसी जगत में नहीं आता।