"मैं कौन हूँ?" का प्रश्न
व्यक्तिगत पहचान दो प्रश्नों के बारे में है:
- मैं क्या हूँ? मुझे किस तरह का प्राणी क्या बनाता है (शरीर, मन, आत्मा, व्यक्ति)?
- क्या मैं समय के साथ वही हूँ? पुरानी फ़ोटो का बच्चा और आज का मैं एक ही व्यक्ति कैसे?
आत्म को परतों में सोच सकते हैं: शरीर; हमारी भूमिकाएँ (छात्र, संतान, दोस्त, नागरिक); हमारा चरित्र और मूल्य; और भीतर का "मैं", जो सोचता, महसूस करता और चुनता है। पहचान का एक व्यक्तिगत पक्ष (जो मुझे अनोखा बनाए) और एक सामाजिक पक्ष (जिन समूहों का मैं हिस्सा हूँ) भी है।
बदलाव और "वही" होना: थीसियस का जहाज़
एक पुरानी पहेली: जहाज़ के तख़्ते एक-एक कर बदले जाते हैं, जब तक कोई पुराना तख़्ता न बचे। क्या यह वही जहाज़ है? और अगर कोई पुराने तख़्तों से दूसरा जहाज़ बना ले, तो "असली" कौन-सा है?
हमारे साथ भी यही पहेली है। सालों में शरीर की बहुत-सी कोशिकाएँ बदलती हैं, रूप, पसंद और राय बदलती है। फिर भी हमें लगता है कि हम वही व्यक्ति हैं। दार्शनिक हर बारीकी में बिल्कुल एक जैसा होना और एक ही चलती हुई चीज़ होना अलग करते हैं।
चार बड़े उत्तर
- शरीर मत: आप अपना जीवित शरीर और मस्तिष्क हैं; वही शरीर, वही व्यक्ति। सरल और जाँचने में आसान, पर मस्तिष्क-बदल वाले काल्पनिक प्रयोग का क्या?
- स्मृति / मनोवैज्ञानिक मत (जॉन लॉक): जहाँ तक आपकी चेतना और यादें पीछे जाती हैं, वहाँ तक आप वही व्यक्ति हैं, साथ में चलता चरित्र, आदतें और योजनाएँ। समस्या: हम भूलते हैं, और यादें ग़लत हो सकती हैं।
- आत्मा मत: कई धर्म मानते हैं कि हर व्यक्ति में एक स्थायी आत्मा है (हिंदू विचार में आत्मन्; ईसाई, इस्लाम और यहूदी परंपरा में soul/रूह) जो असली "मैं" है और हर मनुष्य को बराबर गरिमा देती है।
- अनात्म / गुच्छा मत: डेविड ह्यूम को भीतर झाँकने पर अनुभवों का "गुच्छा" ही मिला; बौद्ध विचार (अनात्म) सिखाता है कि स्थायी "मैं" से चिपकना दुख देता है, और आत्म एक बदलती प्रक्रिया है।
हर मत सच का एक हिस्सा देखता है; कई विचारक इन्हें मिलाते हैं।
आत्म-ज्ञान
"अपने को जानो" यूनान के डेल्फ़ी मंदिर पर खुदा था, और सुकरात ने सिखाया कि बिना जाँचा जीवन जीने लायक नहीं। भारतीय परंपराएँ भी साधक से "मैं कौन हूँ?" (कोऽहम्) पूछने को कहती हैं।
एक आधुनिक उपाय जोहारी खिड़की है: चार खाने: जो मुझे और दूसरों को पता है (खुला), जो दूसरों को पता है पर मुझे नहीं (अंधा कोना), जो मुझे पता है पर छिपा है (छिपा), और जो किसी को नहीं पता (अज्ञात)। ईमानदार राय अंधा कोना छोटा करती है; बाँटना छिपा खाना छोटा करता है। आत्म-ज्ञान चिंतन, डायरी, राय और नए अनुभवों से बढ़ता है।
नैतिक स्वायत्तता और ज़िम्मेदारी
स्वायत्तता (यूनानी auto = स्व, nomos = नियम) का अर्थ है ख़ुद को नियम देना। इमैनुएल कांट के अनुसार व्यक्ति नैतिक तब है जब वह ऐसे नियम पर चले जिसे उसने तर्क से बनाया हो और जिसे वह सब पर लागू होते देखना चाहे, इनाम, डर या भीड़ के कारण नहीं। सिर्फ़ बाहरी ताक़तों से चलना परायत्तता (heteronomy) है।
स्वायत्तता का मतलब मनमानी नहीं: इसका अर्थ है ख़ुद सोचना, अंतरात्मा की सुनना, दूसरों को व्यक्ति के रूप में सम्मान देना, और अपने चुनावों की ज़िम्मेदारी लेना। क्योंकि हर व्यक्ति ऐसे चुन सकता है, हर व्यक्ति की गरिमा है और उसे कभी सिर्फ़ औज़ार की तरह इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
किशोरावस्था में पहचान
मनोवैज्ञानिक एरिक एरिकसन ने किशोरावस्था को पहचान बनाम भूमिका-भ्रम का चरण माना। किशोर अलग शैलियाँ, दोस्त, विश्वास और लक्ष्य आज़माते हैं। खोजने के बाद मूल्यों को अपनाने से पक्की पहचान बनती है; बहुत जल्दी दबाव या बिल्कुल न खोजने से भ्रम हो सकता है। सोशल मीडिया ख़ुद को व्यक्त करने में मदद कर सकता है पर नक़ल भी करा सकता है; मज़बूत पहचान लाइक्स पर नहीं, मूल्यों पर टिकती है।
घर पर करके देखें
"मैं … हूँ" से शुरू होने वाले दस वाक्य लिखिए। हर एक पर श (शरीर), भू (भूमिका), च (चरित्र/मूल्य) या भी (भीतरी "मैं") लिखिए। जो 20 साल बाद भी सच रहेंगे, उन पर गोला लगाइए। किसी भरोसेमंद दोस्त से अपने बारे में एक वाक्य जुड़वाइए: क्या वह आपके अंधे कोने में है?
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- व्यक्तिगत पहचान = मैं क्या हूँ + मुझे समय के साथ वही क्या रखता है
- चार मत: शरीर, स्मृति (लॉक), आत्मा (आत्मन्), गुच्छा/अनात्म (ह्यूम, बौद्ध)
- स्वायत्तता = स्व-निर्धारित नियम (कांट); परायत्तता = बाहर से आया नियम
- जोहारी खिड़की: खुला, अंधा, छिपा, अज्ञात
- एरिकसन (किशोर): पहचान बनाम भूमिका-भ्रम
हल किए गए उदाहरण
1. रिया कहती है: "मैं कक्षा 1 की फ़ोटो वाली लड़की ही हूँ, क्योंकि मुझे वह स्कूल ट्रिप याद है।" वह कौन-सा मत अपना रही है?
जॉन लॉक का स्मृति (मनोवैज्ञानिक) मत: उसकी याद उसके आज के "मैं" को बीते "मैं" से जोड़ती है।
2. एक लड़का फ़ोन सिर्फ़ इसलिए ख़रीदता है कि "क्लास में सबके पास है।" यह स्वायत्त है या परायत्त? इसे स्वायत्त कैसे बनाएँ?
परायत्त: कारण भीड़ का दबाव है। स्वायत्त तब होगा जब वह ख़ुद सोचे (ज़रूरत, क़ीमत, मूल्य) और ऐसे कारणों से चुने जिन्हें वह किसी के लिए भी उचित माने।
3. एक मंदिर के लकड़ी के खंभे 50 साल में, हर साल एक, बदले गए। दो मतों से बताइए कि क्या यह वही मंदिर है।
कड़ा भौतिक मत: नहीं, मूल लकड़ी बची नहीं। निरंतरता मत: हाँ, बदलाव धीरे हुआ, वही रूप, जगह, उद्देश्य और समुदाय बना रहा, जैसे धीरे बदलता व्यक्ति वही रहता है।
आम गलतियाँ
- "वही व्यक्ति" का अर्थ "बिना बदले" समझना। समय के साथ पहचान बढ़ने और बदलने की जगह देती है।
- स्वायत्तता को "जो मन करे वो करना" समझना। इसका अर्थ तर्कसंगत, स्व-निर्धारित नियम और ज़िम्मेदारी है।
- मान लेना कि एक सिद्धांत साफ़ तौर पर सही है। हर मत की ताक़त और कमी है; उत्तर तर्क से दें।
- व्यक्तिगत पहचान (दर्शन) को पहचान पत्रों से मिलाना। दस्तावेज़ पहचान दर्ज करते हैं; वे नहीं बताते कि पहचान है क्या।