स्वतंत्र इच्छा क्या है?
स्वतंत्र इच्छा यानी यह चुन पाना कि हम क्या करें, ताकि हमारे काम सच में हमारे हों। दो विचार जुड़े हैं:
- दूसरा भी कर सकते थे: चुनाव के पल एक से ज़्यादा रास्ते खुले थे।
- स्रोत: चुनाव मुझसे (मेरी सोच से) आया, बाहर से नहीं।
यह क्यों ज़रूरी है? तारीफ़, दोष, सज़ा और गर्व, सब मानते हैं कि लोग अपने स्वतंत्र कामों के ज़िम्मेदार हैं।
दार्शनिक इच्छा की स्वतंत्रता (अंदर का चुनना) और कर्म की स्वतंत्रता (चुना हुआ कर पाना, बिना ज़ंजीर या रोक) को अलग करते हैं।
नियतिवाद और तीन मुख्य जवाब
नियतिवाद: हर घटना पिछली घटनाओं और प्रकृति के नियमों का ज़रूरी नतीजा है। किसी पल दुनिया के बारे में सब पता हो तो सिद्धांत में अगला पल बताया जा सकता है। कारण भौतिक (दिमाग़ का रसायन), जैविक (जीन) या सामाजिक (परवरिश, संस्कृति) हो सकते हैं।
- कठोर नियतिवाद: नियतिवाद सच है, इसलिए स्वतंत्र इच्छा भ्रम है। (स्पिनोज़ा: हम उस पत्थर जैसे हैं जो सोचता है कि वह गिरना चुन रहा है।)
- स्वेच्छावाद (दर्शन में, राजनीति वाला नहीं): कुछ चुनाव पूरी तरह तय नहीं; व्यक्ति कर्म का असली आरंभ है। सार्त्र: हम "स्वतंत्र होने को अभिशप्त" हैं।
- संगततावाद: स्वतंत्र इच्छा और नियतिवाद दोनों सच हो सकते हैं। कर्म स्वतंत्र है अगर वह बिना बाहरी ज़बरदस्ती आपकी अपनी इच्छाओं और कारणों से निकले (हॉब्स, ह्यूम)।
आधुनिक विज्ञान नए सवाल जोड़ता है: क्वांटम भौतिकी छोटे पैमाने पर संयोग दिखाती है, और दिमाग़ के प्रयोग (जैसे लिबेट के) दिखाते हैं कि फ़ैसले का एहसास होने से पहले दिमाग़ में गतिविधि होती है। पर सिर्फ़ संयोग नियंत्रण नहीं है, और प्रयोगों पर बहस जारी है।
अरस्तू: स्वैच्छिक कर्म और इच्छाशक्ति की कमज़ोरी
अरस्तू ने पूछा कि किसी की तारीफ़ या दोष कब उचित है। कर्म स्वैच्छिक है जब उसका आरंभ व्यक्ति में हो और वह जानता हो कि क्या कर रहा है।
- ज़बरन कर्म: कारण बाहर है, जैसे तूफ़ान आपको रास्ते से उड़ा ले जाए।
- ज़रूरी बातों की अज्ञानता में किए कर्म पूरी तरह स्वैच्छिक नहीं।
- मिश्रित कर्म: तूफ़ान में जहाज़ बचाने को माल फेंकना। चुना आपने, पर कठिन हालात के कारण।
इच्छाशक्ति की कमज़ोरी (यूनानी अक्रेसिया): सबसे अच्छा जानते हुए भी कुछ और करना क्योंकि इच्छा जीत गई। सुकरात मानते थे कोई जानबूझकर ग़लत नहीं करता; अरस्तू असहमत थे: तेज़ भावनाएँ उस पल ज्ञान को धुँधला कर देती हैं। अच्छी आदतें (सद्गुण) इच्छा को तर्क के साथ लाती हैं।
कांट: स्वायत्तता, नैतिक नियम और ज्ञान के प्रकार
कांट के लिए इच्छाओं या बाहरी इनाम से धकेला जाना परायत्तता (बाहर का नियम) है। स्वायत्तता यानी तर्क से ख़ुद को नियम देना और उसे मानना। उनका नैतिक नियम निरपेक्ष आदेश है: सिर्फ़ उस नियम पर चलो जिसे तुम सबके लिए चाह सको, और लोगों को हमेशा साध्य मानो, सिर्फ़ साधन नहीं।
कांट मानते थे कि विज्ञान की दुनिया में सब कुछ कारण से बँधा दिखता है। पर कर्म करते समय हमें ख़ुद को स्वतंत्र मानना ही पड़ता है, क्योंकि 'मुझे करना चाहिए' तभी अर्थ रखता है जब 'मैं कर सकता हूँ'।
प्रागनुभविक और आनुभविक ज्ञान
प्रागनुभविक (a priori) ज्ञान अनुभव के बिना तर्क से: 7 + 5 = 12, हर त्रिभुज की तीन भुजाएँ। आनुभविक (a posteriori) ज्ञान अनुभव से: समुद्र तल पर पानी 100 °C पर उबलता है। कांट के अनुसार स्वतंत्रता अनुभव से सिद्ध नहीं होती, पर नैतिकता के लिए तर्क उसे ज़रूरी मानता है।
राजनीतिक स्वतंत्रता और क़ानून के अधीन स्वतंत्रता
राजनीतिक स्वतंत्रता इस बारे में है कि समाज और राज्य क्या करने देते हैं: बोलना, आस्था, आना-जाना, वोट देना, इकट्ठा होना।
- नकारात्मक स्वतंत्रता: दख़ल से मुक्ति, कोई रोकता नहीं।
- सकारात्मक स्वतंत्रता: सच में कर पाने की आज़ादी, शिक्षा, स्वास्थ्य और साधनों के साथ।
क्या क़ानून स्वतंत्रता घटाते हैं? रूसो और कांट के अनुसार न्यायपूर्ण क़ानून, जिन पर हम सहमत हो सकें, स्वतंत्रता संभव बनाते हैं; उनके बिना ताक़तवर कमज़ोर पर राज करता है। मिल का हानि सिद्धांत: राज्य आपकी आज़ादी सिर्फ़ दूसरों को नुकसान से बचाने के लिए सीमित करे। स्वतंत्रता के साथ ज़िम्मेदारी भी आती है।
करके देखो
आज का एक चुनाव सोचो। उसके पीछे के कारण लिखो, फिर पूछो: क्या यह मेरे तर्क से था, तर्क के ख़िलाफ़ इच्छा से, या दबाव से?
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- स्वतंत्र इच्छा = दूसरा कर सकते थे + स्रोत मैं हूँ
- नियतिवाद: पिछले कारण + प्रकृति के नियम → एक तय भविष्य
- कठोर नियतिवाद: नियतिवाद सच → स्वतंत्र इच्छा नहीं
- स्वेच्छावाद: स्वतंत्र इच्छा सच → नियतिवाद ग़लत
- संगततावाद: स्वतंत्र = अपने कारणों से, बिना बाहरी ज़बरदस्ती
- स्वायत्तता (कांट) = ख़ुद को दिया तर्कसंगत नियम मानना
हल किए गए उदाहरण
1. रवि चाकू वाले लुटेरे को फ़ोन दे देता है। क्या यह स्वैच्छिक था?
पूरी तरह नहीं। अरस्तू के अनुसार यह मिश्रित या ज़बरन कर्म है: आरंभ बाहरी धमकी है। संगततावादी भी कहेगा बाहरी ज़बरदस्ती के कारण स्वतंत्र नहीं।
2. मीरा दोस्त की मदद करती है क्योंकि वह दयालुता को महत्व देती है, जो उसकी परवरिश से आई। स्वतंत्र या नहीं?
कठोर नियतिवादी: सच में स्वतंत्र नहीं (मूल्य कारणों से बने)। संगततावादी: स्वतंत्र, क्योंकि कर्म उसके अपने मूल्यों से, बिना ज़बरदस्ती।
3. प्रागनुभविक या आनुभविक: (क) वर्ग की चार भुजाएँ, (ख) मुंबई में मानसून की बारिश।
(क) प्रागनुभविक: सिर्फ़ तर्क से। (ख) आनुभविक: अवलोकन से।
4. कांट 'चाहिए का अर्थ है सकते हो' से स्वतंत्रता का समर्थन क्यों करते हैं?
नैतिकता बताती है क्या करना चाहिए। इसका अर्थ तभी है जब हम कर सकें, इसलिए कर्म करते समय हमें ख़ुद को तर्क मानने में स्वतंत्र समझना होता है।
आम गलतियाँ
- नियतिवाद को भाग्यवाद समझना ('कुछ भी करूँ, नतीजा वही')। नियतिवाद में आपके चुनाव भी कारण हैं और नतीजा बदलते हैं।
- स्वतंत्र इच्छा को रैंडम चुनाव मानना। रैंडम काम भी आपके नियंत्रण में नहीं।
- दार्शनिक स्वेच्छावाद (स्वतंत्र इच्छा सच है) को राजनीतिक लिबरटेरियनवाद (छोटी सरकार) से मिलाना।
- कहना कि हर क़ानून स्वतंत्रता नष्ट करता है। कई दार्शनिक कहते हैं न्यायपूर्ण क़ानून सबकी समान स्वतंत्रता बचाते हैं।