समाजोपयोगी व्यवहार क्या है?
समाजोपयोगी व्यवहार वह कोई भी काम है जो हम अपनी मर्ज़ी से दूसरों की भलाई के लिए करते हैं। जैसे खाना बाँटना, रोते दोस्त को चुप कराना, रास्ता बताना, रक्तदान करना।
परोपकार (altruism) इसका खास रूप है: बिना किसी इनाम की सोच के मदद करना। ज़्यादातर मदद में थोड़ा इनाम भी जुड़ा होता है, जैसे अच्छा लगना या धन्यवाद मिलना।
इसका उलटा समाज-विरोधी व्यवहार है जो दूसरों को नुकसान पहुँचाता है। दर्शक (bystander) वह है जो घटना देखता है पर उसका हिस्सा नहीं है।
दर्शक प्रभाव और उसके कारण
दर्शक प्रभाव (bystander effect): जब आसपास और लोग हों, तो एक व्यक्ति के मदद करने की संभावना कम हो जाती है। इसके तीन कारण हैं:
- ज़िम्मेदारी का बँटवारा (diffusion of responsibility): मदद का फ़र्ज़ सबमें बँट जाता है, हर एक को छोटा हिस्सा लगता है।
- बहुलवादी अज्ञानता (pluralistic ignorance): हालात साफ़ न हों तो हम दूसरों को देखते हैं। वे शांत दिखें तो हम मान लेते हैं कि आपातकाल नहीं, जबकि वे भी उलझन में हैं।
- दर्शकों का संकोच (audience inhibition): डर कि मदद करने पर कुछ न निकला तो सबके सामने मज़ाक बनेगा।
1960 के दशक के प्रयोगों में जो लोग सोचते थे कि सिर्फ़ वही किसी की परेशानी सुन रहे हैं, उन्होंने जल्दी और लगभग हमेशा मदद की; जो सोचते थे कि दूसरे भी सुन रहे हैं, उन्होंने देर से और कम मदद की।
मदद करने पर असर डालने वाले कारक
- दर्शकों की संख्या: ज़्यादा लोग, हर एक की कम मदद (अस्पष्ट हालात में)।
- गंभीरता और स्पष्टता: साफ़, गंभीर आपातकाल (चीख, खून, आग) में ज़्यादा मदद।
- मदद की कीमत: खतरा, समय, मेहनत, गंदगी या शर्म से मदद घटती है।
- पीड़ित से समानता: जो हम जैसा लगे (उम्र, समूह, कपड़े, टीम), उसकी ज़्यादा मदद।
- योग्यता (competence): नर्स या लाइफ़गार्ड जैसे हुनर वाले लोग आगे आते हैं।
- मूड और जल्दी: अच्छे मूड में ज़्यादा मदद, जल्दी में कम।
- व्यक्तित्व और परवरिश: सहानुभूति और घर में मदद होते देखना, मदद बढ़ाते हैं।
पिलियाविन का मेट्रो अध्ययन (1969)
उद्देश्य: असली आपातकाल में, जहाँ लोग आसानी से हट न सकें, पीड़ित का प्रकार और नस्ल मदद पर कैसे असर डालते हैं।
विधि: न्यूयॉर्क की एक्सप्रेस ट्रेन में क्षेत्र प्रयोग (field experiment), उस हिस्से में जहाँ लगभग 7½ मिनट कोई स्टेशन नहीं आता। ट्रेन चलने के करीब 70 सेकंड बाद एक शोधकर्ता ("पीड़ित") गिर पड़ता। कुछ बार उसके हाथ में छड़ी होती और वह बीमार लगता; कुछ बार उससे शराब की गंध आती और हाथ में बोतल होती, यानी नशे में लगता। पीड़ित अश्वेत या श्वेत होते। छिपे पर्यवेक्षक लिखते कि किसने, कितनी जल्दी मदद की। करीब 4,450 यात्री अनजाने में शामिल हुए।
परिणाम: "बीमार" पीड़ित को लगभग 95% बार अपने आप मदद मिली, "नशे वाले" को लगभग 50% बार। मदद आमतौर पर जल्दी आई। पहले मदद करने वाले ज़्यादातर पुरुष थे। ज़िम्मेदारी के बँटवारे के खास संकेत नहीं मिले: बड़े समूहों ने कम मदद नहीं की। नशे वाली स्थिति में लोग अपनी ही नस्ल वाले की थोड़ी ज़्यादा मदद करते दिखे।
निष्कर्ष: उत्तेजना-कीमत-इनाम मॉडल (arousal–cost–reward)। किसी को मुसीबत में देखकर हम बेचैन होते हैं। उस बेचैनी को कम करने के लिए हम तौलते हैं: मदद करने की कीमत (खतरा, घिन, मेहनत) बनाम मदद न करने की कीमत (अपराध-बोध, दोष)। नशे वाले की मदद ज़्यादा महँगी लगी, इसलिए कम लोग आगे आए।
मूल्यांकन: असली ट्रेन, असली प्रतिक्रिया, यानी उच्च पारिस्थितिक वैधता। पर यात्रियों से सहमति नहीं ली गई, न बाद में उन्हें बताया गया, और डिब्बे में कौन है इस पर नियंत्रण नहीं था।
खेल और समूह गतिविधियों में समाजोपयोगी व्यवहार
टीम खेल मदद करना सीखने की बढ़िया जगह हैं: हौसला बढ़ाना, घायल खिलाड़ी की मदद, गेंद बाँटना, चुप रहने वाले साथियों को शामिल करना, रेफ़री का फ़ैसला मानना और मैच के बाद हाथ मिलाना। कोच हर खिलाड़ी को साफ़ भूमिका दें (यह ज़िम्मेदारी के बँटवारे को तोड़ता है), फ़ेयर प्ले की तारीफ़ करें और दूसरों की भावनाओं पर बात करें, तो मदद बढ़ती है।
करके देखो: बँटा हुआ काम
घर या कक्षा में एक दोस्त के पास "गलती से" पेन गिराओ, और किसी और दिन पूरे समूह के पास। गिनो कि कितने सेकंड में कोई उठाता है। फिर नाम लेकर कहो: "रिया, ज़रा पकड़ा दो?" देखो, नाम लेने से मदद कितनी जल्दी आती है। (बाद में सबको ज़रूर बताओ कि तुम क्या जाँच रहे थे।)
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- समाजोपयोगी व्यवहार: दूसरों की मदद करने वाला कोई भी स्वैच्छिक काम
- परोपकार: बिना इनाम की उम्मीद के मदद
- दर्शक प्रभाव: ज़्यादा दर्शक → हर एक के मदद करने की संभावना कम
- ज़िम्मेदारी का बँटवारा: फ़र्ज़ बँटा, तो हर एक को कम लगता है
- बहुलवादी अज्ञानता: दूसरे शांत दिखे, तो लगा कि गंभीर नहीं
- उत्तेजना-कीमत-इनाम मॉडल: मदद न करने की कीमत > मदद की कीमत, तो मदद
- पिलियाविन 1969: बीमार (छड़ी) ≈ 95% मदद; नशे में ≈ 50% मदद
हल किए गए उदाहरण
1. भीड़ वाले पार्क में एक लड़की साइकिल से गिरती है। बीस लोग देखते हैं पर एक मिनट तक कोई नहीं हिलता। मनोविज्ञान से समझाओ।
ज़िम्मेदारी का बँटवारा: बीस में से हर एक को फ़र्ज़ का छोटा हिस्सा लगता है। बहुलवादी अज्ञानता: हर कोई दूसरों को शांत देखकर सोचता है कि शायद गंभीर नहीं।
2. उसी पार्क में कोई चिल्लाता है: "आप, लाल जैकेट वाले, एंबुलेंस बुलाइए।" यह क्यों काम करता है?
नाम लेकर एक व्यक्ति को कहने से ज़िम्मेदारी का बँटवारा खत्म होता है। अब पूरा काम उसी का है, तो मदद जल्दी आती है।
3. उत्तेजना-कीमत-इनाम मॉडल से समझाओ कि पिलियाविन के अध्ययन में "नशे वाले" की मदद कम क्यों हुई।
नशे वाले की मदद महँगी लगी (उल्टी, झगड़ा या शर्मिंदगी का डर) और मदद न करना कम बुरा लगा (लोग उसी को दोष दे सकते थे)। तराज़ू मदद न करने की ओर झुक गया।
4. पिलियाविन अध्ययन की एक खूबी और एक कमी बताओ।
खूबी: असली ट्रेन में हुआ, इसलिए व्यवहार स्वाभाविक था (उच्च पारिस्थितिक वैधता)। कमी: यात्रियों से सहमति नहीं ली गई और उन्हें बाद में बताया नहीं गया, जो नैतिक समस्या है।
5. बस में एक नर्स बेहोश आदमी की मदद करती है, बाकी देखते रहते हैं। कौन-सा कारक इसे समझाता है?
योग्यता: उसे पता है क्या करना है, तो उसके लिए मदद की कीमत और अनिश्चितता कम है।
आम गलतियाँ
- यह कहना कि पिलियाविन को ट्रेन में तेज़ दर्शक प्रभाव मिला। उलटा: बड़े समूहों ने कम मदद नहीं की।
- ज़िम्मेदारी के बँटवारे (फ़र्ज़ बँटना) और बहुलवादी अज्ञानता (दूसरों के शांत चेहरे देखकर हालात गलत समझना) को मिला देना।
- हर मदद को "परोपकार" कहना। परोपकार में कोई इनाम नहीं चाहिए; ज़्यादातर मदद में कुछ इनाम मिलता है।
- अध्ययन लिखते समय उद्देश्य, विधि, परिणाम और निष्कर्ष में से कुछ छोड़ देना। परीक्षा में अक्सर चारों चाहिए।