सूर्य क्या है? भौतिक गुण
सूर्य एक तारा है, हमारे सबसे पास वाला। यह लकड़ी की तरह जल नहीं रहा। यह बहुत गरम प्लाज़्मा का गोला है (इतनी गरम गैस कि परमाणुओं के इलेक्ट्रॉन अलग हो जाते हैं)।
| गुण | मान (लगभग) |
|---|---|
| व्यास | 13.9 लाख km (पृथ्वी का 109 गुना) |
| द्रव्यमान | 2 × 1030 kg (पृथ्वी का 3.33 लाख गुना; सौरमंडल का 99.86%) |
| औसत घनत्व | 1.41 g/cm³ (पानी से थोड़ा ज़्यादा) |
| पृथ्वी से दूरी | 15 करोड़ km = 1 खगोलीय इकाई (AU); प्रकाश को ~8 मिनट 20 सेकंड |
| सतह का तापमान | ~5500 °C (5778 K) |
| क्रोड का तापमान | ~1.5 करोड़ °C |
| शक्ति (ज्योति) | 3.8 × 1026 W |
| बनावट (द्रव्यमान से) | ~73% हाइड्रोजन, ~25% हीलियम, ~2% भारी तत्व |
| घूर्णन | विषुवत पर ~25 दिन, ध्रुवों के पास ~35 दिन (यह ठोस नहीं है) |
| आयु | ~4.6 अरब वर्ष; अपनी आधी उम्र पर |
सूर्य मध्यम आकार का, पीला-सफ़ेद मुख्य अनुक्रम तारा (वर्ग G2) है। यह इतना बड़ा और चमकीला सिर्फ़ इसलिए दिखता है क्योंकि पास है। इसकी बनावट हम इसके स्पेक्ट्रम की काली रेखाओं से जानते हैं। हीलियम पहले (1868 में) सूर्य के स्पेक्ट्रम में मिला, पृथ्वी पर बाद में।
सावधानी: सूर्य को कभी सीधे मत देखो, धूप के चश्मे से भी नहीं। पिनहोल प्रोजेक्टर या प्रमाणित सौर फ़िल्टर का प्रयोग करो।
सूर्य की संरचना: परतें
सूर्य प्याज़ की तरह परतों में है। अंदर की परतें (दिखती नहीं):
- क्रोड (core): त्रिज्या का अंदरूनी चौथाई हिस्सा। ~1.5 करोड़ °C, बहुत घना। संलयन सिर्फ़ यहीं होता है।
- विकिरण क्षेत्र: ऊर्जा प्रकाश (फ़ोटॉन) के रूप में बाहर जाती है। हर फ़ोटॉन सोखा जाता है और फिर किसी भी दिशा में निकलता है, इसलिए टेढ़ा-मेढ़ा चलता है। यह सफ़र हज़ारों साल ले सकता है।
- संवहन क्षेत्र: बाहरी ~30%। गरम गैस ऊपर उठती, ठंडी होकर नीचे जाती, फिर उठती है, जैसे उबलता दलिया। सतह पर इनके सिरे कणिकाओं (granules) जैसे दिखते हैं।
वायुमंडल (दिखता है):
- प्रकाशमंडल: दिखने वाली 'सतह', ~5500 °C। प्रकाश यहीं से अंतरिक्ष में जाता है।
- वर्णमंडल (chromosphere): पतली लाल परत, पूर्ण सूर्य ग्रहण में दिखती है।
- कोरोना: बाहरी हल्का प्रभामंडल, 10 लाख °C से ज़्यादा। यह सतह से इतना गरम क्यों है, इस पर अभी शोध चल रहा है; चुंबकीय तरंगें और छोटे विस्फोट मुख्य कारण माने जाते हैं।
ऊर्जा का स्रोत: नाभिकीय संलयन और सौर न्यूट्रिनो
क्रोड में ताप और दाब इतना ज़्यादा है कि हाइड्रोजन नाभिक (प्रोटॉन) टकराकर जुड़ जाते हैं। इस क्रम को प्रोटॉन–प्रोटॉन श्रृंखला कहते हैं:
4 ¹H → ⁴He + 2 e⁺ + 2 न्यूट्रिनो + ऊर्जा
हीलियम नाभिक 4 प्रोटॉन से लगभग 0.7% हल्का है। यह घटा द्रव्यमान आइंस्टीन के सूत्र E = mc² से ऊर्जा बनता है। c² बहुत बड़ा है, इसलिए थोड़े द्रव्यमान से बहुत ऊर्जा मिलती है।
सूर्य हर सेकंड लगभग 40 लाख टन द्रव्यमान ऊर्जा में बदलता है, फिर भी इसमें लगभग 5 अरब साल और चमकने लायक हाइड्रोजन है।
सौर न्यूट्रिनो
संलयन से न्यूट्रिनो भी बनते हैं: लगभग बिना द्रव्यमान और बिना आवेश वाले नन्हे कण। ये किसी चीज़ से मुश्किल से टकराते हैं, इसलिए क्रोड से सीधे निकलकर ~8 मिनट में पृथ्वी पहुँचते हैं। हर सेकंड अरबों न्यूट्रिनो तुम्हारे नाखून से गुज़रते हैं। ज़मीन के नीचे बने विशाल डिटेक्टर (जैसे जापान का सुपर-कामिओकांडे, कनाडा का सडबरी) कुछ को पकड़ते हैं। इनके मिलने से साबित हुआ कि सूर्य संलयन से ही चमकता है। शुरू में अपेक्षा के सिर्फ़ एक-तिहाई न्यूट्रिनो मिले ('सौर न्यूट्रिनो समस्या')। हल: रास्ते में न्यूट्रिनो अपना प्रकार बदलते हैं (न्यूट्रिनो दोलन), जिससे पता चला कि उनका थोड़ा द्रव्यमान है।
सौर सक्रियता: सौर कलंक, ज्वाला, उभार, CME
सूर्य विषुवत पर ध्रुवों से तेज़ घूमता है, इसलिए इसका चुंबकीय क्षेत्र मुड़-तुड़ जाता है। इससे बनते हैं:
- सौर कलंक (sunspots): प्रकाशमंडल पर काले धब्बे, जहाँ तेज़ चुंबकीय क्षेत्र नीचे से आती गर्मी रोकता है। ये ~3500–4500 °C हैं, आसपास से ठंडे, इसलिए काले दिखते हैं (अकेले हों तो भी चमकेंगे)। अक्सर उल्टे चुंबकीय ध्रुवों वाले जोड़ों में आते हैं। इनकी चाल देखकर पता चला कि सूर्य घूमता है।
- सौर ज्वाला (flares): मुड़ा चुंबकीय क्षेत्र टूटकर फिर जुड़े तो अचानक चमक। कुछ मिनटों में अरबों परमाणु बमों जितनी ऊर्जा X-किरण, UV और तेज़ कणों के रूप में निकलती है।
- सौर उभार (prominences): सतह के ऊपर चुंबकीय क्षेत्र से थमे चमकती गैस के विशाल लूप।
- कोरोनल द्रव्य उत्क्षेपण (CME): अंतरिक्ष में फेंके गए प्लाज़्मा के विशाल बादल; 1–3 दिन में पृथ्वी तक पहुँचते हैं।
11 वर्ष का सौर चक्र
सौर कलंकों की संख्या लगभग हर 11 साल में बढ़ती-घटती है (सौर अधिकतम और न्यूनतम)। हर चक्र में सूर्य के चुंबकीय ध्रुव पलट जाते हैं। अधिकतम के पास ज्वालाएँ और CME सबसे ज़्यादा होते हैं।
सूर्य का पृथ्वी पर असर
रोज़ के असर: धूप गर्मी देती है, मौसम, हवाएँ और जल चक्र चलाती है, और प्रकाश संश्लेषण को ऊर्जा देती है (लगभग हर खाद्य श्रृंखला की नींव)। सौर और पवन ऊर्जा भी इसी पर टिकी है।
सौर पवन कोरोना से निकलते आवेशित कणों की लगातार धारा है। पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र (चुंबकमंडल) हमें बचाता है और कुछ कणों को ध्रुवों की ओर मोड़ देता है।
ज्वाला और CME से अंतरिक्ष मौसम:
- आकाश में ध्रुवीय ज्योति (aurora), जब कण ऊपरी हवा के ऑक्सीजन और नाइट्रोजन से टकराते हैं;
- शॉर्ट-वेव रेडियो बंद, GPS में गड़बड़ी;
- उपग्रहों को नुकसान, अंतरिक्ष यात्रियों को खतरा;
- बिजली लाइनों और ट्रांसफ़ॉर्मरों पर ज़्यादा भार (भू-चुंबकीय तूफ़ान)।
ओज़ोन परत और वायुमंडल ज़्यादातर हानिकारक UV और X-किरणें रोक लेते हैं। अंतरिक्ष एजेंसियाँ अब सूर्य पर हर समय नज़र रखकर तूफ़ान की चेतावनी देती हैं।
करके देखो: सूर्य को सुरक्षित रूप से देखो
पिनहोल प्रोजेक्टर बनाओ: एक कार्ड में छोटा साफ़ छेद करो। सूर्य की ओर पीठ करके खड़े हो जाओ और छेद से आती रोशनी 1 m दूर सफ़ेद कागज़ पर डालो। सूर्य की छोटी गोल छवि दिखेगी। छवि का व्यास d और दूरी L नापो। सूर्य का व्यास ≈ (d ÷ L) × 15 करोड़ km। d = 9.3 mm और L = 1 m से लगभग 14 लाख km मिलता है। सूर्य को कभी सीधे मत देखो।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- संलयन: 4 ¹H → ⁴He + 2 e⁺ + 2 ν + ऊर्जा
- E = mc² (ऊर्जा = घटा द्रव्यमान × प्रकाश की चाल का वर्ग, c = 3 × 10⁸ m/s)
- प्रकाश का समय t = दूरी ÷ c = 1.5 × 10¹¹ m ÷ 3 × 10⁸ m/s ≈ 500 s
- पिनहोल: सूर्य का व्यास ÷ सूर्य की दूरी = छवि का व्यास ÷ छेद से दूरी
- सौर चक्र ≈ 11 वर्ष (चुंबकीय चक्र ≈ 22 वर्ष)
हल किए गए उदाहरण
1. धूप को पृथ्वी तक आने में कितना समय लगता है? (दूरी 1.5 × 10¹¹ m, c = 3 × 10⁸ m/s)
t = d ÷ c = 1.5 × 10¹¹ ÷ 3 × 10⁸ = 500 s ≈ 8 मिनट 20 सेकंड। यानी हम सूर्य को हमेशा 8 मिनट पहले जैसा देखते हैं।
2. एक संलयन श्रृंखला में 4 प्रोटॉन का कुल द्रव्यमान 6.690 × 10⁻²⁷ kg और हीलियम नाभिक का 6.644 × 10⁻²⁷ kg है। निकली ऊर्जा ज्ञात करो।
घटा द्रव्यमान Δm = 0.046 × 10⁻²⁷ = 4.6 × 10⁻²⁹ kg। E = Δm c² = 4.6 × 10⁻²⁹ × 9 × 10¹⁶ ≈ 4.1 × 10⁻¹² J। एक अभिक्रिया के लिए बहुत कम, पर सूर्य हर सेकंड लगभग 10³⁸ अभिक्रियाएँ करता है।
3. सूर्य की शक्ति 3.8 × 10²⁶ W है। हर सेकंड कितना द्रव्यमान घटता है?
E = mc² से m = E ÷ c² = 3.8 × 10²⁶ ÷ 9 × 10¹⁶ ≈ 4.2 × 10⁹ kg प्रति सेकंड, यानी लगभग 40 लाख टन हर सेकंड।
4. सौर कलंक ~4000 °C के होते हुए भी काले क्यों दिखते हैं?
चमक की तुलना आसपास से होती है। चारों ओर का प्रकाशमंडल ~5500 °C है और कहीं ज़्यादा चमकीला है (गरम सतह बहुत ज़्यादा प्रकाश देती है)। उसके सामने ठंडा धब्बा काला लगता है, जैसे फ़्लडलाइट के आगे टॉर्च का बल्ब।
5. एक बड़ी ज्वाला 10:00 बजे दिखी। इसकी X-किरणें ~10:08 पर रेडियो पर असर क्यों डालती हैं, जबकि CME के कण 2 दिन बाद पहुँचते हैं?
X-किरणें प्रकाश हैं, 3 × 10⁸ m/s से चलती हैं, इसलिए ~8 मिनट में पहुँचती हैं। CME पदार्थ का बादल है जो ~500–2000 km/s से चलता है, इसलिए 15 करोड़ km में 1–3 दिन लगते हैं।
आम गलतियाँ
- सोचना कि सूर्य आग की तरह जल रहा है। जलना रासायनिक अभिक्रिया है जिसे ऑक्सीजन चाहिए; सूर्य नाभिकीय संलयन से चमकता है।
- सोचना कि सौर कलंक ठंडे या छेद हैं। वे सिर्फ़ आसपास से ठंडे हैं, फिर भी हज़ारों डिग्री, और चुंबकीय क्षेत्र से बनते हैं।
- सोचना कि प्रकाश क्रोड से 8 मिनट में निकलता है। सतह से पृथ्वी तक ~8 मिनट लगते हैं, पर अंदर से सतह तक ऊर्जा को हज़ारों साल लगते हैं।
- सोचना कि कोरोना सबसे बाहर है इसलिए सबसे ठंडा है। यह 10 लाख °C से ज़्यादा है, प्रकाशमंडल से बहुत गरम।