निर्माण विधियाँ
निर्माण विधि (construction method) वह तरीक़ा है जिससे मालिक तय करता है कि डिज़ाइन कौन करेगा और निर्माण कौन। तीन आम विधियाँ:
- अलग-अलग कारीगर। मालिक हर कारीगर (राजमिस्त्री, बढ़ई, बिजली मिस्त्री) को सीधे रखता है। नियंत्रण सबसे ज़्यादा और अक्सर दाम कम, पर सबको जोड़ने का काम मालिक पर।
- मुख्य ठेकेदार। मालिक एक मुख्य निर्माता से एक अनुबंध करता है, जो कारीगरों को रखकर सँभालता है। मालिक के लिए आसान। डिज़ाइनर अलग रहता है और काम जाँच सकता है।
- डिज़ाइन-बिल्ड। एक ही फ़र्म डिज़ाइन और निर्माण करती है। तेज़ और ज़िम्मेदारी एक जगह, पर स्वतंत्र जाँच कम।
एक और चुनाव है कि हिस्से कैसे बनें: साइट पर (वहीं ढालकर) या प्रीफ़ैब्रिकेटेड (फ़ैक्टरी में बनाकर उठाकर जोड़ना)। प्रीफ़ैब तेज़ और साफ़ होता है, पर अच्छी ढुलाई और क्रेन चाहिए।
निर्माण अनुबंध
अनुबंध (contract) मालिक और निर्माता के बीच लिखित समझौता है। इसमें काम (नक्शे और विनिर्देश), दाम, तारीख़ें, भुगतान का तरीक़ा और गड़बड़ी होने पर क्या होगा, लिखा होता है।
- तय दाम (lump sum)। पूरे काम का एक दाम। असली लागत बढ़े तो नुकसान ठेकेदार का। नक्शे पूरे हों तब अच्छा।
- लागत-प्लस। मालिक असली लागत और शुल्क या प्रतिशत देता है। काम अस्पष्ट हो तब अच्छा, पर लागत बढ़ने का जोखिम मालिक का।
- इकाई दर। प्रति इकाई दाम (प्रति m³ कंक्रीट, प्रति मीटर पाइप) गुणा असली मात्रा।
परिवर्तन (variation / change order) काम में लिखित बदलाव है, उसके दाम और समय के साथ।
निर्माण योजना
निर्माण योजना में काम की सूची, हर काम में कितना समय और क्रम (अगला शुरू होने से पहले क्या ख़त्म होना है) होता है। समय-रेखा पर पट्टियों में बनाने पर यह बार चार्ट (गैंट चार्ट) कहलाता है। जो काम की कड़ी अंतिम तारीख़ तय करती है वह क्रांतिक पथ (critical path) है: उस पर देरी पूरे काम को देर कर देती है।
योजना में मज़दूर, सामान, मशीनें और सुरक्षा भी आते हैं।
पर्यवेक्षण
पर्यवेक्षण (supervision) यानी साइट निरीक्षण का मतलब है यह जाँचना कि काम नक्शे और विनिर्देश के अनुसार, अच्छे गुण से, समय पर और सुरक्षित हो रहा है। पर्यवेक्षक:
- हर हफ़्ते असली प्रगति को योजना की प्रगति से मिलाता है;
- सामान और परीक्षण जाँचता है (जैसे कंक्रीट के घन);
- ढकने से पहले काम जाँचता है, जैसे कंक्रीट से पहले सरिया;
- समस्याएँ दर्ज करता है और सुधार का आदेश देता है।
काम पीछे हो तो पहले कारण खोजते हैं, फिर मज़दूर, शिफ़्ट या मशीनें बढ़ाते हैं।
करके देखिए
छोटे काम की योजना बनाइए: किताबों की अलमारी बनाना। 4 काम लिखिए, हर एक का समय घंटों में लिखिए और बताइए कौन-सा पहले होगा। घंटे जोड़कर ख़त्म होने का समय निकालिए। फिर सोचिए लकड़ी 2 घंटे देर से आई: कौन-से काम खिसके?
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- अनुबंध = काम + दाम + समय + भुगतान की शर्तें
- तय दाम: मालिक तय रकम देता है। लागत-प्लस: मालिक असली लागत + शुल्क देता है
- कुल समय = क्रांतिक पथ के कामों का योग
- प्रगति का अंतर = असली प्रगति − योजना की प्रगति
हल किए गए उदाहरण
1. घर की बोली 50 लाख तय दाम पर है। सरिया महँगा हुआ और असली लागत 54 लाख हो गई। अतिरिक्त 4 लाख कौन देगा?
ठेकेदार, क्योंकि दाम तय है। मालिक के कहने पर अतिरिक्त काम अलग परिवर्तन होगा।
2. वही काम लागत-प्लस में, 10% शुल्क, असली लागत 54 लाख। मालिक कितना देगा?
54 + 54 का 10% = 54 + 5.4 = 59.4 लाख।
3. काम एक के बाद एक: नींव 3 हफ़्ते, ढाँचा 4, दीवार 3, फ़िनिशिंग 2। नींव में 2 हफ़्ते की देरी। नया अंतिम समय?
सामान्य कुल = 12 हफ़्ते। देरी के साथ 14 हफ़्ते, क्योंकि हर अगला काम 2 हफ़्ते देर से शुरू होता है।
4. हफ़्ता 6 पर योजना कहती है 50% होना चाहिए पर पर्यवेक्षक 40% देखता है। इसका क्या मतलब?
काम 10 प्रतिशत अंक पीछे है। कारण खोजिए और मज़दूर या अतिरिक्त शिफ़्ट जोड़िए।
आम गलतियाँ
- नक्शे साफ़ होने से पहले अनुबंध का प्रकार चुनना। काम अस्पष्ट हो तो तय दाम से झगड़े होते हैं।
- ठेकेदार और पर्यवेक्षक को एक समझना। पर्यवेक्षक ठेकेदार को जाँचता है।
- छोटी देरी को अनदेखा करना। अगर वह क्रांतिक पथ पर है तो पूरा काम खिसकता है।
- काम में बदलाव सिर्फ़ बोलकर करना। बदलाव दाम और समय के साथ परिवर्तन के रूप में लिखित होना चाहिए।