परिवर्ती तारा क्या है?
ज़्यादातर तारे लगभग एक-सा चमकते हैं। परिवर्ती तारा (variable star) वह तारा है जिसकी चमक समय के साथ बदलती है। कुछ तारे इसलिए बदलते हैं कि तारा खुद बदलता है (वह धड़कता है या भड़कता है)। कुछ सिर्फ़ इसलिए अलग दिखते हैं कि एक तारा दूसरे के सामने से गुज़रता है (ग्रहणी युग्म तारे)।
खगोलविद प्रकाश-वक्र (light curve) बनाते हैं: ऊपर-नीचे चमक और बगल में समय। वक्र का आकार बताता है कि तारा किस प्रकार का है।
सेफ़ीड: दिल की तरह धड़कने वाले तारे
सेफ़ीड एक विशाल तारा है जो धड़कता है। वह फूलता है, फिर सिकुड़ता है, फिर फूलता है, एक बहुत नियमित लय में। इस लय के समय को आवर्तकाल (P) कहते हैं। सेफ़ीड में P लगभग 1 दिन से 100 दिन तक होता है।
यह धड़कता क्यों है? तारे के अंदर गैस की एक परत होती है जो दबने पर गर्मी रोक लेती है। रुकी हुई गर्मी तारे को बाहर धकेलती है। जब तारा फूल जाता है तो गैस गर्मी छोड़ देती है, ठंडी होती है और वापस गिरती है। फिर दब जाती है। यह उछलती हुई स्प्रिंग जैसा है।
सबसे पहले जो सेफ़ीड देखा गया वह तारा डेल्टा सेफ़ी था, इसीलिए पूरे परिवार का यह नाम है।
आवर्तकाल–ज्योति संबंध
1912 में हेनरिएटा लेविट ने तारों के एक छोटे बादल में बहुत से सेफ़ीड देखे। वे सब लगभग एक ही दूरी पर थे, इसलिए जो ज़्यादा चमकीला दिखा वह असल में भी ज़्यादा चमकीला था। उन्होंने पाया: आवर्तकाल जितना लंबा, तारा उतना चमकीला।
यही आवर्तकाल–ज्योति संबंध है। निरपेक्ष कोटि (absolute magnitude) M, यानी तारा 10 पारसेक की दूरी से कितना चमकीला दिखता, का सरल रूप है
M ≈ −2.43 (log₁₀ P − 1) − 4.05, जहाँ P दिनों में है।
छोटा (ज़्यादा ऋणात्मक) M मतलब ज़्यादा चमकीला तारा। P = 10 दिन वाले सेफ़ीड का M ≈ −4.05 होता है, यानी सूर्य से लगभग 2,000 गुना चमकीला।
सेफ़ीड से दूरी नापना
जिस तारे की असली चमक हमें पता हो वह मानक मोमबत्ती (standard candle) है। तरीका:
- तारे को देखकर उसका आवर्तकाल P नापिए।
- संबंध से उसकी असली चमक M निकालिए।
- नापिए कि वह कितना चमकीला दिखता है, m (आभासी कोटि)।
- दूरी मापांक से दूरी निकालिए:
m − M = 5 log₁₀(d / 10 pc), यानीd = 10^((m − M + 5)/5)पारसेक।
एक पारसेक लगभग 3.26 प्रकाश-वर्ष होता है। इसके पीछे व्युत्क्रम-वर्ग नियम है: तारा दो गुना दूर हो तो उसकी रोशनी चार गुना क्षेत्रफल में फैलती है, इसलिए वह चार गुना मंद दिखता है।
1920 के दशक में एडविन हबल ने एंड्रोमेडा नीहारिका में सेफ़ीड खोजे। उनकी दूरी से पता चला कि वह हमारी आकाशगंगा से बहुत बाहर की एक अलग आकाशगंगा है।
सीमाएँ और सावधानी
तारों के बीच की धूल तारे को मंद कर देती है, इसलिए हम उसे असल से ज़्यादा दूर मान सकते हैं। सेफ़ीड के दो परिवार भी हैं: चिरसम्मत सेफ़ीड (युवा, चमकीले) और टाइप II सेफ़ीड (पुराने, कम चमकीले), जिनके संबंध अलग हैं। यह संबंध पहले पास के उन सेफ़ीड से तय होता है जिनकी दूरी लंबन (parallax) से पता है। आरआर लाइरी तारे भी तेज़ धड़कते हैं और मोमबत्ती की तरह काम आते हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- M ≈ −2.43 (log₁₀ P − 1) − 4.05 (P दिनों में, चिरसम्मत सेफ़ीड)
- m − M = 5 log₁₀(d / 10 pc)
- d = 10^((m − M + 5)/5) पारसेक
- दिखती चमक ∝ 1 / d²
- 1 पारसेक ≈ 3.26 प्रकाश-वर्ष
हल किए गए उदाहरण
1. एक सेफ़ीड का आवर्तकाल P = 10 दिन है। उसकी निरपेक्ष कोटि M निकालिए।
log₁₀ 10 = 1। M = −2.43 (1 − 1) − 4.05 = −4.05।
2. एक सेफ़ीड का आवर्तकाल P = 100 दिन है। M निकालिए।
log₁₀ 100 = 2। M = −2.43 (2 − 1) − 4.05 = −2.43 − 4.05 = −6.48। यह 10 दिन वाले तारे से ज़्यादा चमकीला है (ज़्यादा ऋणात्मक)।
3. एक तारे के लिए m = 10 और M = −4 है। उसकी दूरी निकालिए।
m − M = 14। d = 10^((14 + 5)/5) = 10^3.8 ≈ 6,300 पारसेक।
4. दो एक जैसे तारे हैं। B की दूरी A से दो गुना है। B कितना मंद दिखेगा?
चमक ∝ 1/d²। दूरी दो गुना तो 1/2² = 1/4। B चार गुना मंद दिखेगा।
5. 10 दिन वाला एक सेफ़ीड m = 6.0 जैसा दिखता है। वह कितनी दूर है?
M = −4.05, इसलिए m − M = 6.0 + 4.05 = 10.05। d = 10^((10.05 + 5)/5) = 10^3.01 ≈ 1,020 पारसेक (लगभग 3,300 प्रकाश-वर्ष)।
6. सेफ़ीड X का P = 3 दिन और सेफ़ीड Y का P = 30 दिन है। Y कितनी कोटि ज़्यादा चमकीला है और रोशनी में कितने गुना?
M(3) = −2.43 (0.477 − 1) − 4.05 = −2.78। M(30) = −2.43 (1.477 − 1) − 4.05 = −5.21। अंतर = 2.43 कोटि। रोशनी का अनुपात = 10^(0.4 × 2.43) = 10^0.97 ≈ 9.4 गुना।
आम गलतियाँ
- यह मान लेना कि ज़्यादा चमकीला दिखने वाला तारा हमेशा असल में भी ज़्यादा चमकीला है। हो सकता है वह बस पास हो।
- कोटि के चिह्न उलझाना: छोटी या ज़्यादा ऋणात्मक संख्या मतलब ज़्यादा चमकीला तारा।
- आवर्तकाल घंटों या सालों में डालना। सूत्र में P दिनों में होना चाहिए।
- यह भूल जाना कि धूल तारे को मंद कर देती है, जिससे हम दूरी ज़रूरत से ज़्यादा मान लेते हैं।