भौगोलिक पर्यावरण क्या है?
भौगोलिक पर्यावरण वह सारा प्राकृतिक परिवेश है जो हमारे रहने की जगह और तरीक़े पर असर डालता है: भू-आकृतियाँ (पर्वत, मैदान, पठार), जल (नदी, झील, सागर), मिट्टी, जलवायु, पेड़-पौधे और जानवर। इसे प्राकृतिक या भौतिक पर्यावरण भी कहते हैं। अलग जगहों पर इनका मेल अलग होता है, इसलिए हर जगह का अपना भू-दृश्य (landscape) होता है।
भू-दृश्य के उदाहरण: बर्फ़ वाला पहाड़, उपजाऊ मिट्टी वाला नदी का मैदान, सूखा रेगिस्तान, बंदरगाह वाला समुद्र तट।
भू-दृश्य और उनसे मिलने वाला लाभ
- पर्वत: पानी का स्रोत, जंगल, खनिज, पर ढलान ज़्यादा होने से खेती कठिन।
- मैदान: समतल ज़मीन और नदी की मिट्टी से उपजाऊपन, खेती और शहरों के लिए अच्छे।
- नदियाँ: पानी, मछली और यातायात।
- तट: बंदरगाह, मछली पकड़ना और व्यापार।
भूमि सब कुछ तय नहीं करती, पर लोगों को विकल्प और सीमाएँ देती है।
मनुष्य का अनुकूलन
अनुकूलन यानी अपने जीने का तरीक़ा पर्यावरण के हिसाब से बदलना। उदाहरण: ढलान पर खेती के लिए काटी गई सीढ़ियाँ (terraces), नदी की बाढ़ से बचने के लिए खंभों पर घर, ठंडी जगह पर गर्म कपड़े और मोटी दीवारें, गरम जगह पर हल्के सूती कपड़े, सूखे इलाक़े में नहर और कुएँ, और तट पर बंदरगाह। लोग पर्यावरण को अपने हिसाब से भी बदलते हैं, जैसे बाँध बनाकर, पर इससे नई समस्याएँ भी आ सकती हैं।
प्राकृतिक आपदाएँ
प्राकृतिक ख़तरा (hazard) ऐसी प्राकृतिक घटना है जो लोगों को नुक़सान पहुँचा सकती है। जब यह लोगों को भारी नुक़सान पहुँचाए तो वह आपदा बन जाती है।
- बाढ़: भारी बारिश या बर्फ़ पिघलने से नदियाँ उफन जाती हैं।
- भूकंप: चट्टानों की परतें खिसकती हैं और ज़मीन हिलती है (अक्सर प्लेट की सीमाओं पर)।
- ज्वालामुखी: गरम चट्टान, राख और गैसें धरती से बाहर आती हैं।
- चक्रवात, सूखा, भूस्खलन और भी उदाहरण हैं।
ज़्यादातर आपदाओं को रोका नहीं जा सकता, पर पूर्व चेतावनी, मज़बूत इमारतों, सुरक्षित जगह पर निर्माण और अभ्यास से नुक़सान घटाया जा सकता है।
जलवायु परिवर्तन
जलवायु किसी जगह का लगभग 30 साल या ज़्यादा का सामान्य मौसम है। कोयला, तेल और गैस जलाने से हवा में कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) बढ़ती है। CO2 कंबल की तरह गर्मी रोकती है, इसलिए धरती गरम होती है। गरम हवा से ग्लेशियर और बर्फ़ की चादरें पिघलती हैं और गरम पानी फैलता है, इसलिए समुद्र का स्तर बढ़ता है। बारिश का ढर्रा बदलता है, लू और भारी बारिश की संभावना बढ़ती है, और निचले तटों पर बाढ़ का ख़तरा बढ़ता है। इसे घटाने के लिए स्वच्छ ऊर्जा, ऊर्जा की बचत, जंगलों की रक्षा और जो बदलाव टल नहीं सकते उनकी तैयारी ज़रूरी है।
खुद करके देखो
अपने रहने की जगह का एक सरल चित्र बनाओ: वह पहाड़ी, नदी या समुद्र के पास है? वहाँ लोग किन दो तरीक़ों से ढलते हैं और एक आपदा कौन सी आती है, लिखो। 3D में तापमान स्लाइडर बढ़ाओ और देखो बर्फ़ की टोपी और समुद्र का क्या होता है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- पर्यावरण = भूमि + जल + मिट्टी + जलवायु + जीव
- अनुकूलन = जगह के हिसाब से जीने का तरीक़ा बदलना
- ज़्यादा CO2 → ज़्यादा गर्मी रुकना → जलवायु गरम → बर्फ़ पिघलना → समुद्र का स्तर बढ़ना
हल किए गए उदाहरण
1. एक गाँव नदी के सामान्य स्तर से 1.5 मीटर ऊपर है। बाढ़ सामान्य स्तर से 2 मीटर ऊपर चढ़ती है। गाँव में पानी कितना गहरा होगा?
2 − 1.5 = 0.5 मीटर, यानी 0.5 मीटर गहरा पानी गाँव को ढकेगा।
2. पहाड़ी पर तीन सीढ़ियाँ हैं, हर एक 2 मीटर ऊँची। कुल ऊँचाई कितनी है?
3 × 2 = 6 मीटर।
3. शहर का औसत तापमान 14.0 °C से बढ़कर 15.2 °C हो गया। बढ़ोतरी कितनी है?
15.2 − 14.0 = 1.2 °C।
4. (a) बाढ़ (b) खड़ी ढलान (c) ठंडी सर्दी के लिए एक-एक अनुकूलन बताओ।
(a) खंभों या ऊँचे चबूतरे पर घर। (b) सीढ़ीदार खेती। (c) मोटी दीवारें, गर्म कपड़े, हीटिंग।
आम गलतियाँ
- ख़तरे (hazard) और आपदा (disaster) को एक कहना। ख़तरा घटना है; जब लोगों को गंभीर नुक़सान हो तब वह आपदा है।
- मौसम और जलवायु को मिला देना। मौसम आज का है; जलवायु लंबे समय का ढर्रा है।
- सोचना कि अनुकूलन पर्यावरण नहीं बदलता। बाँध और समुद्री दीवारें उसे बदलती हैं और नई समस्याएँ ला सकती हैं।
- यह मानना कि गरमी बढ़ने का मतलब सिर्फ़ गरम दिन हैं। इससे बारिश, बर्फ़ और समुद्र स्तर भी बदलते हैं।