प्राकृतिक और ऊर्जा संसाधन (Natural and energy resources)
प्राकृतिक संसाधन प्रकृति की वह चीज़ है जिसे लोग काम में लेते हैं: पानी, मिट्टी, जंगल, खनिज और ईंधन। नवीकरणीय संसाधन (सूरज, पवन, पानी, ठीक से सँभाले जंगल) बार-बार मिलते हैं। अनवीकरणीय संसाधन (कोयला, तेल, प्राकृतिक गैस) बनने में करोड़ों साल लगते हैं, इसलिए ख़त्म हो जाते हैं।
ऊर्जा संसाधन हमारे घर, कारखाने और गाड़ियाँ चलाते हैं। आज दुनिया की ज़्यादातर ऊर्जा जीवाश्म ईंधन से आती है, पर इनसे कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है और धरती गरम होती है। पवन, सौर और जल जैसे साफ़ स्रोत तेज़ी से बढ़ रहे हैं।
संसाधन बराबर नहीं बँटे हैं। कहीं तेल है, कहीं उपजाऊ ज़मीन, कहीं तेज़ धूप या हवा, और कहीं बहुत कम। देश व्यापार से कमी पूरी करते हैं, और संसाधन वाली जगहें अक्सर अमीर हो जाती हैं। संसाधनों का समझदारी से उपयोग (बचत, दोबारा उपयोग, साफ़ ऊर्जा) सतत विकास का हिस्सा है।
प्रवास (Migration)
प्रवास का मतलब है लोगों का एक जगह से दूसरी जगह रहने के लिए जाना, कुछ समय के लिए या हमेशा के लिए। यह देश के अंदर (गाँव से शहर) या देशों के बीच हो सकता है।
कारण दो तरह के होते हैं:
- धक्का कारक (छोड़ने पर मजबूर करें): काम न होना, गरीबी, सूखा, युद्ध, प्राकृतिक आपदा।
- खिंचाव कारक (अपनी ओर खींचें): काम, ज़्यादा वेतन, स्कूल, अस्पताल, सुरक्षा।
जिस जगह से कोई जाता है वहाँ से वह उत्प्रवासी है और जहाँ पहुँचता है वहाँ के लिए आप्रवासी। खतरे के कारण घर छोड़ने वाला शरणार्थी कहलाता है। प्रवास से लाभ भी हैं (घर पैसे भेजना, नए हुनर और विचार) और नुकसान भी (भीड़ भरे शहर, खाली गाँव, कुछ प्रवासियों की कठिन ज़िंदगी)।
जनांकिकी (Demography)
जनांकिकी आबादी का अध्ययन है: कितने लोग हैं, संख्या कितनी तेज़ी से बदल रही है और लोगों की उम्र कितनी है।
तीन बातें सबसे ज़रूरी हैं: जन्म दर, मृत्यु दर और प्रवास। आबादी में बदलाव = जन्म − मृत्यु + (आने वाले − जाने वाले)।
जनसंख्या पिरामिड हर उम्र समूह की संख्या को पट्टियों में बनाता है। चौड़ा आधार मतलब बहुत बच्चे और तेज़ वृद्धि। पतला आधार और चौड़ा ऊपरी हिस्सा मतलब बूढ़ी होती आबादी। प्रवास भी पिरामिड बदलता है: युवा गाँव छोड़ते हैं और शहर में आते हैं।
जलवायु और अर्थव्यवस्था (Climate and economy)
जलवायु किसी जगह के बरसों के औसत मौसम को कहते हैं। वही तय करती है कि कौन सी फसल उगेगी, पानी कितना होगा और कौन सी ऊर्जा (सूरज, पवन, जल) मिलेगी।
जब जलवायु बदलती है (ज़्यादा गर्मी, सूखा, बाढ़, समुद्र का स्तर बढ़ना), खेती, मछली पालन और पर्यटन की आमदनी घटती है और मरम्मत व खाने का खर्च बढ़ता है। लोग बेहतर मौके वाली जगह चले जाते हैं। इसे जलवायु-जनित प्रवास कहते हैं।
अर्थव्यवस्था और जलवायु एक-दूसरे पर असर डालते हैं। जीवाश्म ईंधन जलाने से अर्थव्यवस्था बढ़ती है पर धरती गरम होती है। साफ़ ऊर्जा, पानी की बचत और बेहतर खेती नुकसान घटा सकते हैं और काम भी बचाए रख सकते हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- आबादी में बदलाव = जन्म − मृत्यु + आप्रवासी − उत्प्रवासी
- प्राकृतिक वृद्धि = जन्म − मृत्यु
- शुद्ध प्रवास = आने वाले − जाने वाले
- प्रवास का दबाव बढ़ता है जब धक्का (कम बारिश, काम नहीं) और खिंचाव (शहर में काम) दोनों हों
हल किए गए उदाहरण
1. एक साल में किसी क्षेत्र में 12,000 जन्म, 9,000 मृत्यु, 5,000 आने वाले और 8,000 जाने वाले हैं। आबादी में कितना बदलाव हुआ?
प्राकृतिक वृद्धि = 12,000 − 9,000 = 3,000। शुद्ध प्रवास = 5,000 − 8,000 = −3,000। कुल बदलाव = 3,000 + (−3,000) = 0। आबादी उतनी ही रहेगी।
2. एक गाँव में 800 लोग हैं। सूखे से 15% लोग शहर चले गए। कितने गए और कितने रहे?
800 का 15% = 120 गए। 800 − 120 = 680 रहे।
3. एक पिरामिड का आधार बहुत पतला और ऊपर का हिस्सा चौड़ा है। यह आबादी के बारे में क्या बताता है, और क्या दिक़्क़त आ सकती है?
यह बूढ़ी होती आबादी है जिसमें बच्चे कम हैं। कम कामकाजी लोग कई बुज़ुर्गों का सहारा बनेंगे, इसलिए प्रवासी कामगारों और मज़बूत पेंशन-स्वास्थ्य व्यवस्था की ज़रूरत पड़ सकती है।
आम गलतियाँ
- यह मानना कि संसाधन हर जगह बराबर हैं। वे बराबर नहीं हैं, इसीलिए व्यापार और प्रवास होता है।
- धक्का और खिंचाव को मिला देना। धक्का छोड़ने का कारण है (सूखा); खिंचाव जाने का कारण है (काम)।
- आबादी का बदलाव गिनते समय प्रवास भूल जाना। सिर्फ़ जन्म और मृत्यु पूरी कहानी नहीं हैं।
- यह सोचना कि जलवायु परिवर्तन सिर्फ़ मौसम बदलता है। वह खेती की आमदनी, काम और लोगों के रहने की जगह भी बदलता है।