मंच-सज्जा क्या है और कौन करता है
मंच-सज्जा (स्टेज डिज़ाइन, scenography) का मतलब उस जगह की रचना है जहाँ प्रदर्शन या प्रदर्शनी होती है। यह केवल थिएटर के लिए नहीं है: यही हुनर कठपुतली थिएटर, प्रदर्शनी स्थल, संगीत समारोह, टीवी स्टूडियो और फ़िल्म में काम आता है।
डिज़ाइनर कहानी पढ़ता है, निर्देशक से बात करता है, रेखाचित्र और पैमाने वाले नक़्शे बनाता है और सामग्री चुनता है। शो-बिज़नेस में कई लोग साथ काम करते हैं:
- निर्देशक: तय करता है कहानी कैसे कही जाएगी।
- सेट डिज़ाइनर: सज्जा की योजना बनाता है।
- वेशभूषा और प्रॉप्स वाले: अभिनेता जो पहनते और पकड़ते हैं, वह बनाते हैं।
- प्रकाश डिज़ाइनर और तकनीशियन: रोशनी ढालते हैं।
- दृश्य-चित्रकार और बढ़ई (कार्यशाला): बनाते और रंगते हैं।
- स्टेज मैनेजर: शो के दिन सब चलाता है।
मंच और उसकी मशीनरी
पारंपरिक थिएटर में प्रेक्षागृह (सीटें) और मंच होता है। जिस खुले हिस्से से दर्शक देखते हैं वह प्रोसीनियम है। मंच के किनारे विंग्स हैं, जहाँ अभिनेता इंतज़ार करते हैं और सज्जा रखी जाती है।
मंच के ऊपर फ़्लाई टावर है: ऊँची जगह जिसमें बैटन नाम के धातु के पाइप होते हैं। रस्सियाँ (या मोटर और प्रतिभार) पृष्ठ-पट, पर्दे और बत्तियाँ उठाती-गिराती हैं। जो "उड़ा" दिया जाए वह सेकंडों में दर्शकों की नज़र से हट जाता है। बत्तियाँ ऊपर और बगल की बार पर लटकती हैं। कुछ मंचों में फ़र्श में ट्रैप-डोर और घूमता मंच भी होता है।
डिज़ाइनर एक भी दीवार खींचने से पहले मंच का असली माप और फ़्लाई टावर की ऊँचाई जाँचता है।
चित्रित, गढ़ी और ढाँचागत सज्जा
- चित्रित तत्व: पृष्ठ-पट या फ़्लैट जिस पर आसमान, गली या जंगल की तस्वीर हो। हल्के और सस्ते; केवल चित्र से जगह बना देते हैं।
- गढ़े हुए तत्व: तीन आयाम वाले आकार, जो तराशे या साँचे में ढाले जाते हैं: चट्टान, पेड़, मूर्ति या सिंहासन। अक्सर फ़ोम, मिट्टी, पेपर-मैशे या रेज़िन से बनते हैं।
- ढाँचागत तत्व: जो वज़न सहें या जगह बाँटें: चबूतरे, सीढ़ियाँ, ढलान, दरवाज़े, चौखटें। इन्हें मज़बूत बनाते हैं, क्योंकि अभिनेता इन पर खड़े होते और चलते हैं।
अच्छे सेट में तीनों मिलते हैं, ताकि दर्शक जगह पर यक़ीन करें।
कार्यशाला में सेट बनाना
ढाँचे, फ़्लैट और चबूतरे। फ़्लैट हल्की लकड़ी का ढाँचा है जिसमें आड़ी पट्टियाँ होती हैं, और उस पर खिंचा कपड़ा (कैनवास या मलमल) या पतला बोर्ड लगता है। चबूतरा (rostrum) मज़बूत बक्सेनुमा ढाँचा है जिस पर तख़्ता और सीढ़ियाँ होती हैं। दोनों इस तरह बनते हैं कि हिलाए, जोड़े और रखे जा सकें।
दृश्य-चित्रकारी। पहले कपड़े पर माँड़ी (size coat) लगाकर उसे सील करते हैं, फिर डिज़ाइन उतारते हैं (अक्सर छोटे रेखाचित्र को बड़ा करने के लिए ग्रिड से), फिर बड़े आधार रंग, फिर बारीकियाँ, रोशनी और छाया। दूरी मायने रखती है: दर्शक दूर बैठे हैं, इसलिए ब्रश के वार और रंग गाढ़े रखें।
मूर्तिकला और साँचा। आकृतियाँ फ़ोम से तराशी जाती हैं, तार या लकड़ी के ढाँचे पर बनाई जाती हैं, या प्लास्टर, रेज़िन और पेपर-मैशे से साँचे में ढाली जाती हैं। फिर रंगकर पत्थर, लकड़ी या धातु जैसी दिखाई जाती हैं।
सामग्री। कपड़े (कैनवास, मलमल, मख़मल), रंग और वर्णक, हल्के फ़ोम और मज़बूत रेज़िन। हवादार जगह में काम करें, दस्ताने और मास्क पहनें, और बत्तियों के पास आग-रोधी सामग्री लें।
रोशनी, वेशभूषा और प्रॉप्स
रोशनी रंग, गहराई और भाव बदलती है। गरम रोशनी शाम या अपनेपन जैसी लगती है; ठंडी रोशनी रात या डर जैसी; पतली स्पॉट रोशनी दर्शकों की नज़र एक अभिनेता पर टिका देती है। बत्तियाँ बार पर लटकाकर निशाने पर साधी जाती हैं। ऊँचाई h पर लगी बत्ती, बीम-कोण θ के साथ, फ़र्श पर 2·h·tan(θ/2) चौड़ा गोला रोशन करती है।
वेशभूषा (अभिनेता क्या पहनते हैं) और प्रॉप्स (जो वे पकड़ते या इस्तेमाल करते हैं) सेट की शैली और रंगों से मेल खाने चाहिए। चल संरचनाएँ (पहिये, घूमते मंच, सरकते पैनल) दृश्य जल्दी बदलने देती हैं।
थिएटर, फ़िल्म, टीवी, प्रदर्शनी और डिजिटल साधन
थिएटर में दर्शक पूरे शो में सेट को सामने से देखते हैं, इसलिए वह ठोस और जल्दी बदलने वाला होना चाहिए। फ़िल्म या टीवी सेट में कैमरा हर शॉट का फ़्रेम तय करता है, इसलिए वही बनता है जो कैमरा देख सकता है। दीवारें अधूरी हो सकती हैं, और सेट मंच से बड़ा या छोटा हो सकता है।
प्रदर्शनी के डिज़ाइन में पैनल, शो-केस और रोशनी से दर्शकों को जगह में घुमाया जाता है।
डिजिटल ड्राइंग। डिज़ाइनर कंप्यूटर पर नक़्शे, काट-चित्र और 3D मॉडल (CAD और 3D सॉफ़्टवेयर) बनाते हैं, ताकि निर्देशक, कारीगर और प्रकाश दल एक ही तस्वीर देखें। नई तकनीकों में चलते पृष्ठ-पट दिखाने वाली LED दीवारें, सेट की सतहों पर प्रोजेक्शन, मोटर से चलने वाली मंच मशीनरी और प्रॉप्स के लिए 3D प्रिंटिंग शामिल हैं। फिर भी अच्छा डिज़ाइन साफ़ विचार और पैमाने वाले नक़्शे से ही शुरू होता है।
खुद करके देखें
3D में: चरण 1 में पृष्ठ-पट स्लाइडर चलाइए और देखिए पूरा दृश्य कैसे "ग़ायब" हो जाता है। चरण 3 में निर्माण स्लाइडर चलाइए और हर परत पर ज़ोर से बोलिए कि क्या जोड़ा। चरण 4 में गरम, ठंडी और स्पॉट रोशनी आज़माइए: कौन-सी शाम जैसी लगती है? कौन-सी डरावनी रात जैसी?
घर पर: जूते का डिब्बा लीजिए। एक तरफ़ से काटकर खोलिए। यही आपका मंच और प्रोसीनियम है। कागज़ पर आसमान बनाकर पीछे चिपकाइए (पृष्ठ-पट)। कार्डबोर्ड की नलियों और मसले कागज़ से पेड़ बनाइए (गढ़ा हुआ)। छोटे डिब्बे से सीढ़ी बनाइए (ढाँचागत)। ऊपर से टॉर्च चमकाइए, फिर रंगीन कागज़ के आर-पार, और माहौल का बदलना देखिए।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- पैमाना: असली माप = चित्र का माप × पैमाने की संख्या (1:25 यानी कागज़ पर 1 cm = असली 25 cm)
- सीढ़ियों की संख्या = चबूतरे की ऊँचाई ÷ एक सीढ़ी की ऊँचाई
- फ़्लैट का क्षेत्रफल = चौड़ाई × ऊँचाई; रंग = क्षेत्रफल × परतें ÷ प्रति लीटर कवरेज
- रोशनी के गोले की चौड़ाई = 2 × ऊँचाई × tan(बीम-कोण ÷ 2)
हल किए गए उदाहरण
1. एक फ़्लैट 2.4 m चौड़ा और 4 m ऊँचा है। 1:25 पर मॉडल बना। मॉडल का माप क्या है?
2.4 m = 240 cm; 240 ÷ 25 = 9.6 cm। 4 m = 400 cm; 400 ÷ 25 = 16 cm। मॉडल: 9.6 cm × 16 cm।
2. चबूतरा 0.8 m ऊँचा है। हर सीढ़ी 0.2 m ऊँची रखनी है। कितनी सीढ़ियाँ?
0.8 ÷ 0.2 = 4 सीढ़ियाँ।
3. ऊपर वाले फ़्लैट (2.4 m × 4 m) के एक तरफ़ कितना कपड़ा लगेगा?
क्षेत्रफल = 2.4 × 4 = 9.6 m²। व्यवहार में ढाँचे पर लपेटने के लिए 10% और जोड़ें: लगभग 10.6 m²।
4. एक लीटर रंग 8 m² ढकता है। फ़्लैट (9.6 m²) पर दो परतें चाहिए। कितना रंग?
कुल ढकने का क्षेत्रफल = 9.6 × 2 = 19.2 m²। 19.2 ÷ 8 = 2.4 लीटर। 3 लीटर लें।
5. रेखाचित्र में 5 cm के वर्गों वाली ग्रिड है, जिसे फ़्लैट पर 50 cm के वर्गों में बड़ा करना है। रेखाचित्र में एक रेखा 12 cm लंबी है। फ़्लैट पर कितनी लंबी होगी?
आवर्धन = 50 ÷ 5 = 10 गुना। 12 cm × 10 = 120 cm।
6. एक बत्ती फ़र्श से 6 m ऊपर है। उसका बीम-कोण 30° है। रोशन गोला कितना चौड़ा होगा?
चौड़ाई = 2 × 6 × tan(15°) = 12 × 0.268 = लगभग 3.2 m।
7. 1:50 के नक़्शे में मंच 12 cm × 8 cm दिखता है। असली क्षेत्रफल क्या है?
12 cm × 50 = 600 cm = 6 m; 8 cm × 50 = 400 cm = 4 m। क्षेत्रफल = 6 × 4 = 24 m²।
8. स्कूल के नाटक के जंगल वाले दृश्य के लिए एक चित्रित, एक गढ़ा हुआ और एक ढाँचागत तत्व बताइए।
चित्रित: दूर के पेड़ों वाला फ़्लैट। गढ़ा हुआ: कार्डबोर्ड और पेपर-मैशे से बना पेड़ का तना। ढाँचागत: पहाड़ी के लिए सीढ़ियों वाला नीचा चबूतरा।
आम गलतियाँ
- चबूतरा कमज़ोर सामग्री से बनाना। ढाँचागत टुकड़ों पर अभिनेता खड़े होते हैं, इसलिए मज़बूती सबसे पहले।
- मंच का असली माप और फ़्लाई की ऊँचाई जाँचे बिना डिज़ाइन बनाना। पहले नापें।
- ऐसी छोटी बारीकियाँ रंगना जो दूर से दर्शकों को दिखें ही नहीं। आख़िरी पंक्ति के बारे में सोचें।
- थिएटर और फ़िल्म के लिए एक ही सेट-योजना रखना। फ़िल्म में कैमरे का दिखा हिस्सा चाहिए; थिएटर में दर्शकों को दिखने वाले सब हिस्से।