पुराने समय की पोशाक और सेट
पीरियड फ़िल्म वह फ़िल्म है जो बीते समय में होती है। टीम को बीते समय को सच्चा दिखाना पड़ता है।
पोशाक (कॉस्ट्यूम) यानी वे कपड़े, जूते और टोपियाँ जो अभिनेता पहनते हैं। पोशाक तीन बातें बताती है: इंसान कौन है (राजा, किसान, बच्चा), वह कितना अमीर है और किस समय का है।
सेट वह जगह है जहाँ फ़िल्म बनती है: कमरा, गली, बाज़ार। सेट स्टूडियो में बनाया जा सकता है या किसी असली पुरानी इमारत में लिया जा सकता है।
प्रॉप छोटी चीज़ें हैं जो अभिनेता पकड़ते या इस्तेमाल करते हैं: दीया, घड़ा, चिट्ठी, तलवार।
टीम बीते समय को सही कैसे बनाती है
- खोज। पुरानी पेंटिंग, संग्रहालय की चीज़ें, तस्वीरें और किताबें देखो कि लोग क्या पहनते और इस्तेमाल करते थे।
- रेखाचित्र। बनाने से पहले पोशाक और सेट का चित्र बनाओ।
- बनाओ या ढूँढ़ो। कपड़े सिलो, सेट बनाओ या चुनो, प्रॉप इकट्ठे करो।
- जाँचो। कैमरे से देखो। आज की हर चीज़ हटाओ: मोबाइल, प्लास्टिक की बोतल, बिजली का खंभा, कलाई-घड़ी।
जो ग़लत चीज़ उस समय की नहीं है, उसे कालदोष (एनाक्रोनिज़्म) कहते हैं, यानी अपने समय से बाहर की चीज़।
रंग भी मायने रखते हैं। सादा, फीका कपड़ा ग़रीब परिवार दिखाता है। चटक रंग का रेशम दौलत दिखाता है।
मूड के लिए रोशनी
रोशनी (लाइटिंग) यानी दृश्य को कैसे रोशन किया गया है। रोशनी सिर्फ़ देखने में मदद नहीं करती। यह हमें बताती है कि कैसा महसूस करना है।
- रंग: गर्म (पीला, नारंगी) अपनापन और सुरक्षा देता है। ठंडा (नीला) अकेलापन या डर देता है।
- ऊँचाई: ऊपर की रोशनी स्वाभाविक और शांत लगती है। नीचे से आई रोशनी चेहरे पर लंबी अजीब परछाइयाँ बनाती है और डरावनी लगती है।
- तेज़ी: तेज़, मुलायम रोशनी खुशी देती है। एक तरफ़ से आई मद्धम रोशनी राज़ या उदासी देती है।
पुरानी कहानी में टीम अक्सर सिर्फ़ दीये, मोमबत्ती या खिड़की से आती धूप का इस्तेमाल करती है, क्योंकि उस समय लोगों के पास यही था। इसे प्रैक्टिकल लाइट कहते हैं: वह रोशनी जो दृश्य के अंदर की चीज़ों से आती है।
खुद करो
अँधेरे कमरे में टॉर्च (या फ़ोन की लाइट) लो। उसे ठुड्डी के नीचे रखकर शीशे में देखो। फिर सिर के ऊपर ऊँचा पकड़ो। कौन-सा चेहरा डरावना लगा? कौन-सा अच्छा? एक वाक्य में लिखो कि क्या बदला।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- पोशाक = कपड़े जो बताएँ कौन और कब
- सेट = जगह; प्रॉप = छोटी चीज़ें जो अभिनेता इस्तेमाल करें
- कालदोष = ग़लत समय की चीज़
- गर्म + ऊँची रोशनी = शांति; ठंडी + नीची रोशनी = डर
- प्रैक्टिकल लाइट = दृश्य में दीये या खिड़की की रोशनी
हल किए गए उदाहरण
1. एक फ़िल्म 300 साल पहले की है। सेट से हटाने वाली चार चीज़ें लिखो।
मोबाइल, प्लास्टिक की बोतल, तारों वाला बिजली का खंभा और कलाई-घड़ी। ये उस समय नहीं थीं, इसलिए हर एक कालदोष है।
2. एक ग़रीब किसान और एक अमीर व्यापारी एक ही दृश्य में हैं। पोशाक से अंतर कैसे दिखेगा?
किसान सादा, फीका, खुरदरा सूती कपड़ा पहने। व्यापारी चटक, चिकना रेशम और गहने पहने। रंग, कपड़ा और बारीकियाँ बिना शब्दों के पैसा और काम बता देती हैं।
3. एक दृश्य में बच्चा अँधेरे घर में अकेला है और आवाज़ सुनता है। रोशनी चुनो।
नीचे से ठंडी, मद्धम रोशनी रखो, गहरी परछाइयों के साथ। ठंडा रंग अकेलापन देता है और नीची रोशनी अजीब परछाइयाँ बनाती है। इससे डर बनता है।
4. दादी आग के पास गरमाहट भरी कहानी सुना रही हैं। कौन-सी रोशनी ठीक रहेगी और क्यों?
आग की गर्म नारंगी रोशनी, मुलायम और थोड़ी ऊँची। गर्म रंग सुरक्षित और अपना लगता है, इसलिए दर्शक भी वैसा ही महसूस करता है।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि पोशाक सिर्फ़ सजीले कपड़े हैं। सादे कपड़े भी पोशाक हैं।
- पुराने दृश्य में आज की कोई चीज़ (घड़ी, बोतल) छोड़ देना।
- यह सोचना कि रोशनी सिर्फ़ देखने के लिए है। यह मूड भी बनाती है।
- हर दृश्य में गर्म रंग लगाना। डर या अकेलेपन के लिए ठंडी रोशनी चाहिए।