सामाजिक उद्यमिता क्या है?
उद्यमी वह है जो कुछ नया शुरू करता है और उसके लिए जोखिम उठाता है। सामाजिक उद्यमी वह उद्यमी है जिसका मुख्य लक्ष्य समाज की कोई समस्या (सामाजिक समस्या) या प्रकृति की कोई समस्या (पर्यावरणीय समस्या) हल करना है।
उसके व्यवसाय को सामाजिक उद्यम कहते हैं। यह कुछ उपयोगी बेचता है, कमाता है और उसी पैसे से समस्या हल करता रहता है।
संक्षेप में: सामाजिक लक्ष्य + व्यावसायिक तरीके = सामाजिक उद्यमिता।
सामाजिक उद्यम की विशेषताएँ
- सामाजिक लक्ष्य पहले: समस्या पहले आती है; मुनाफ़ा साधन है, मंज़िल नहीं।
- अपनी कमाई: सामान या सेवा बेचता है, सिर्फ़ चंदे पर नहीं टिका।
- मुनाफ़ा फिर लगाना: बचत का बड़ा हिस्सा काम में वापस जाता है, मालिकों को नहीं।
- नवाचार: मदद के नए, सस्ते तरीके, जैसे बिजली के तार की जगह सोलर लैंप।
- असर नापना: सिर्फ़ कमाई नहीं, कितने लोगों की मदद हुई यह भी गिनता है।
- फैलाव योग्य: अच्छा मॉडल कई जगह दोहराया जा सकता है।
सामाजिक उद्यम, दान-संस्था (NGO) और सामान्य व्यवसाय
| सामान्य व्यवसाय | दान-संस्था / NGO | सामाजिक उद्यम | |
|---|---|---|---|
| मुख्य लक्ष्य | मालिकों का मुनाफ़ा | लोगों की मदद | लोगों की मदद |
| पैसा कहाँ से | बिक्री | चंदा, अनुदान | ज़्यादातर बिक्री |
| मुनाफ़ा किसके लिए | मालिक | (मुनाफ़ा नहीं) | ज़्यादातर फिर काम में |
सामाजिक उद्यम बीच में है: दिल दान-संस्था का, इंजन व्यवसाय का।
ट्रिपल बॉटम लाइन: लोग, पर्यावरण, मुनाफ़ा
सामान्य व्यवसाय एक ही संख्या देखता है: मुनाफ़ा ("बॉटम लाइन")। सामाजिक उद्यम तीन देखता है:
- लोग: सुधरी ज़िंदगियाँ, नए रोज़गार, स्कूल जाते बच्चे।
- पर्यावरण: कम प्रदूषण, कचरे का पुनर्चक्रण, पेड़ों की बचत।
- मुनाफ़ा: टिकने और बढ़ने लायक पैसा।
उदाहरण: सोलर लैंप उद्यम रोशन घर (लोग), बचा मिट्टी का तेल (पर्यावरण) और कमाई (मुनाफ़ा) गिनता है।
प्रकार और दुनिया भर के उदाहरण
- उचित व्यापार और आजीविका: गाँव के कारीगरों से उचित दाम पर हस्तशिल्प ख़रीदना।
- सूक्ष्म वित्त (माइक्रोफ़ाइनेंस): ग़रीबों, ख़ासकर महिलाओं, को छोटा काम शुरू करने के लिए छोटे कर्ज़ (बांग्लादेश में प्रसिद्ध हुआ)।
- सस्ता इलाज: आँखों के अस्पताल जहाँ अमीर ज़्यादा देते हैं ताकि ग़रीबों का इलाज मुफ़्त हो (भारत)।
- स्वच्छ ऊर्जा और पानी: सोलर लैंप, पानी के फ़िल्टर, धुआँरहित चूल्हे।
- कचरा और पुनर्चक्रण: प्लास्टिक कचरे से ईंट या टाइल।
- ऑनलाइन मंच: ई-कॉमर्स और सोशल मीडिया से गाँव के उत्पाद दुनिया तक।
चुनौतियाँ, और सोशल मीडिया व ई-कॉमर्स की मदद
चुनौतियाँ: कीमत कम रखते हुए भी ख़र्च निकालना; कर्ज़ मिलना (बैंक इसे जोखिम भरा मान सकते हैं); असर नापना; कम वेतन पर कुशल लोग ढूँढना।
तकनीक की मदद: सोशल मीडिया कम ख़र्च में कहानी फैलाता है और ग्राहक व स्वयंसेवक लाता है; ई-कॉमर्स गाँव के कारीगर को दूसरे शहरों और देशों के ख़रीदार देता है; क्राउडफ़ंडिंग से बहुत लोग थोड़ा-थोड़ा पैसा दे सकते हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- सामाजिक उद्यमिता = सामाजिक लक्ष्य + व्यावसायिक तरीके
- ट्रिपल बॉटम लाइन = लोग + पर्यावरण + मुनाफ़ा
- सामाजिक उद्यम: आय ज़्यादातर बिक्री से; मुनाफ़ा ज़्यादातर फिर काम में
- दान-संस्था: आय ज़्यादातर चंदे से
- असर (इम्पैक्ट) = लोगों की ज़िंदगी में नापने योग्य बदलाव (जैसे रोशन घर, स्कूल जाते बच्चे)
हल किए गए उदाहरण
1. एक महिला ऐसी कंपनी शुरू करती है जो गाँव के बुनकरों से उचित दाम पर हस्तशिल्प ख़रीदकर ऑनलाइन बेचती है। क्या यह सामाजिक उद्यम है? क्यों?
हाँ। इसका मुख्य लक्ष्य सामाजिक समस्या (बुनकरों की कम आय) है। यह बेचकर कमाती है (व्यावसायिक तरीका)। अगर ज़्यादातर मुनाफ़ा और बुनकरों की मदद में लगाती है, तो यह सामाजिक उद्यम है।
2. एक सोलर लैंप उद्यम महीने में ₹250 के 400 लैंप बेचता है। एक लैंप बनाने और पहुँचाने का ख़र्च ₹180 है। मासिक बचत निकालिए। 80% फिर लगाया जाए तो कितना?
आय = 400 × 250 = ₹1,00,000। ख़र्च = 400 × 180 = ₹72,000। बचत = ₹28,000। फिर लगाया = 28,000 का 80% = ₹22,400।
3. एक NGO चंदे से मुफ़्त पानी के फ़िल्टर देता है। एक सामाजिक उद्यम वही फ़िल्टर कम दाम पर बेचता है। दोनों की एक-एक ताक़त बताइए।
NGO: सबसे ग़रीब को भी मुफ़्त फ़िल्टर मिलता है। सामाजिक उद्यम: चंदा रुकने पर भी काम नहीं रुकता, क्योंकि बिक्री से नए फ़िल्टर का पैसा आता रहता है।
आम गलतियाँ
- सोचना कि सामाजिक उद्यम कोई मुनाफ़ा नहीं कमा सकता। कमा सकता है; बस ज़्यादातर लक्ष्य पर लगाता है।
- हर दान-संस्था को सामाजिक उद्यम कहना। जो सिर्फ़ चंदे पर चलती है, वह व्यवसाय नहीं चला रही।
- सिर्फ़ पैसा नापना। सामाजिक उद्यम को लोगों और पर्यावरण पर असर भी दिखाना होता है।
- सोचना कि सामाजिक उद्यमी सिर्फ़ अमीर लोग होते हैं। कई आम लोग होते हैं जिन्होंने अपने इलाक़े की समस्या देखी।