दाम की शुरुआत: लागत और मार्क-अप
कोई फर्म हमेशा लागत से कम पर नहीं बेच सकती। इसलिए ज़्यादातर दाम लागत से शुरू होते हैं।
लागत-जमा मूल्य निर्धारण: दाम = लागत + मार्क-अप। मार्क-अप दर यानी लागत का कितना हिस्सा ऊपर से जोड़ा: मार्क-अप दर = (दाम − लागत) ÷ लागत × 100। 40 में पड़ा बैग 60 में बिके तो मार्क-अप दर 20 ÷ 40 = 50%।
इसे मार्जिन दर से मत मिलाओ, जो दाम से भाग देती है: 20 ÷ 60 = 33.3%।
लक्ष्य लागत उल्टे क्रम में चलती है। फर्म पहले वह दाम देखती है जो ग्राहक मानेंगे, उसमें से चाहा हुआ लाभ घटाती है, और जो बचे वह अधिकतम लागत है: लक्ष्य लागत = स्वीकार्य दाम − चाहा हुआ लाभ। फिर उत्पाद उसी लागत में बनाने की योजना बनती है।
ग्राहक क्या मानेंगे: लक्ष्य, छवि और प्रतिस्पर्धा
लागत केवल फ़र्श है। छत है स्वीकार्य दाम: वह दायरा जिसे ग्राहक "ठीक" मानता है और लौटता नहीं। इसे तीन बातें बनाती हैं।
- लक्षित ग्राहक: विद्यार्थी कम दाम खोजते हैं, कुछ लोग आराम के लिए ज़्यादा देते हैं।
- छवि: ऊँचा दाम गुणवत्ता का संकेत हो सकता है (महँगी घड़ी)। बहुत कम दाम से लोग शक कर सकते हैं।
- प्रतिस्पर्धा: प्रतिद्वंद्वी वही चीज़ सस्ती बेचे तो आप ज़्यादा ऊपर नहीं जा सकते।
मूल्य-संवेदनशीलता बताती है कि दाम बदलने पर खरीद कितनी बदलती है। इसे माँग की कीमत लोच से नापते हैं = मात्रा में % परिवर्तन ÷ दाम में % परिवर्तन। यह प्रायः ऋणात्मक होती है। इसका परिमाण 1 से बड़ा हो (लोचदार) तो खरीदार तेज़ी से बदलते हैं और दाम बढ़ाने पर आमदनी घटती है। 1 से छोटा हो (बेलोचदार), जैसे नमक या दवा, तो खरीदार कम बदलते हैं और दाम बढ़ाने पर आमदनी बढ़ती है।
एक, भिन्न और पैकेज दाम
एक दाम सबके लिए समान होता है। यह सीधा और निष्पक्ष दिखता है, पर दो तरह के ग्राहक खो देता है: जो ज़्यादा दे सकते थे (वे कम देते हैं), और जो कम देना चाहते हैं (वे चले जाते हैं)। 3D पट्टियाँ दोनों दिखाती हैं।
भिन्न दाम में एक ही चीज़ के लिए अलग समूहों से अलग दाम लिया जाता है: उम्र (बच्चे का टिकट), समय (सुबह का शो), जगह या मात्रा के अनुसार। यह तभी चलता है जब समूह अलग रखे जा सकें (विद्यार्थी कार्ड, दिन का समय)।
पैकेज दाम में कई चीज़ें एक दाम पर साथ बिकती हैं (खाने का कॉम्बो, फ़ोन के साथ प्लान)। ग्राहक को बचत लगती है और फर्म ज़्यादा चीज़ें बेच लेती है।
यील्ड मैनेजमेंट और डायनामिक प्राइसिंग
होटल का जो कमरा या हवाई जहाज़ की जो सीट आज रात खाली रह गई, वह कुछ नहीं कमाती और उसे जमा भी नहीं कर सकते। यील्ड मैनेजमेंट में दाम इस तरह बदलते हैं कि सीमित कमरों या सीटों से सबसे ज़्यादा आमदनी हो: शुरू में या सुस्त समय में सस्ते (भरने के लिए), भीड़ के समय या कम बचने पर महँगे।
डायनामिक प्राइसिंग यही काम सॉफ़्टवेयर से, बार-बार दाम बदलकर करती है (कैब का सर्ज, उड़ान के किराये, ऑनलाइन दुकानें)।
फ़्लैट रेट उल्टा है: असीमित उपयोग के लिए एक तय दाम (महीने का डेटा पैक, जिम की सदस्यता)। यह समझना आसान है, और फर्म उन लोगों से कमाती है जो भरे दाम से कम उपयोग करते हैं।
उपयोगी माप: प्रति उपलब्ध कमरा आमदनी = भराव दर × औसत कमरा दाम।
मुफ़्त मॉडल
उपयोगकर्ता के लिए "मुफ़्त" का मतलब बिना आमदनी नहीं है। फ़्रीमियम: बुनियादी ऐप मुफ़्त और कुछ लोग अतिरिक्त सुविधाओं के पैसे देते हैं। विज्ञापन: उपयोगकर्ता मुफ़्त, विज्ञापनदाता पैसे देता है। मुफ़्त नमूना: ट्रायल से बाद में बिक्री होती है। फर्म को पक्का करना होता है कि पैसे देने वाले हिस्से की आमदनी मुफ़्त हिस्से की लागत से ज़्यादा हो।
करके देखो: नींबू-पानी का दाम
3D में दाम 130 रखकर खरीदार गिनो। फिर 30 पर गिनो। किस दाम पर सबसे अच्छा लाभ है? अब "दो दाम" दबाओ। फिर घर पर पाँच दोस्तों से पूछो कि एक ठंडे पेय के लिए वे अधिकतम कितना देंगे। संख्याओं को काग़ज़ पर पट्टियों की तरह बनाओ और एक दाम बनाम दो दाम आज़माओ। पहले अनुमान लगाओ कि कौन जीतेगा, फिर जाँचो।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- दाम = लागत + मार्क-अप
- मार्क-अप दर = (दाम − लागत) ÷ लागत × 100
- मार्जिन दर = (दाम − लागत) ÷ दाम × 100
- लक्ष्य लागत = स्वीकार्य दाम − चाहा हुआ लाभ
- लोच = मात्रा में % परिवर्तन ÷ दाम में % परिवर्तन
- प्रति उपलब्ध कमरा आमदनी = भराव दर × औसत कमरा दाम
हल किए गए उदाहरण
1. एक बैग की लागत ₹40 है। दुकान 50% मार्क-अप दर चाहती है। दाम क्या होगा?
मार्क-अप = 40 का 50% = ₹20। दाम = 40 + 20 = ₹60।
2. एक कमीज़ की लागत ₹60 है और वह ₹90 में बिकती है। मार्क-अप दर और मार्जिन दर निकालो।
प्रति कमीज़ लाभ = 30। मार्क-अप दर = 30 ÷ 60 = 50%। मार्जिन दर = 30 ÷ 90 = 33.3%।
3. ग्राहक हेडसेट के लिए ₹120 मानते हैं। फर्म दाम का 25% लाभ चाहती है। लक्ष्य लागत निकालो।
चाहा हुआ लाभ = 120 का 25% = 30। लक्ष्य लागत = 120 − 30 = ₹90। हेडसेट ₹90 या उससे कम में बनना चाहिए।
4. दाम ₹10 से ₹12 हुआ और बिक्री 500 से घटकर 400 हुई। लोच निकालो और बताओ आमदनी का क्या हुआ।
दाम में परिवर्तन = +20%। मात्रा में परिवर्तन = −20%। लोच = −20 ÷ 20 = −1 (इकाई लोचदार)। पहले आमदनी 5,000, बाद में 4,800, यानी थोड़ी घटी।
5. होटल में 50 कमरे हैं और 35 कमरे ₹80 पर बिके। भराव दर और प्रति उपलब्ध कमरा आमदनी निकालो।
भराव = 35 ÷ 50 = 70%। प्रति उपलब्ध कमरा आमदनी = 0.70 × 80 = ₹56।
6. दस ग्राहक अधिकतम 35, 45, 55, 60, 70, 80, 90, 100, 110, 120 देंगे। लागत 40 है। एक दाम 80 की तुलना दो दाम 55 और 100 से करो।
एक दाम 80: 5 खरीदते हैं, लाभ = 5 × 40 = 200। दो दाम: 100, 110, 120 वाले ग्राहक 100 देते हैं (3 × 100 = 300); 55, 60, 70, 80, 90 वाले 55 देते हैं (5 × 55 = 275)। आमदनी = 575, लागत = 8 × 40 = 320, लाभ = 255। दो दाम ज़्यादा कमाते हैं।
आम गलतियाँ
- मार्क-अप दर पूछने पर दाम से भाग दे देना। मार्क-अप दर लागत से, मार्जिन दर दाम से भाग देती है।
- सोचना कि लागत-जमा ही काफ़ी है। ग्राहक की मानी हुई सीमा से ऊपर का दाम कुछ नहीं बिकवाता।
- लोच को हमेशा धनात्मक कहना। दाम और मात्रा उल्टी दिशा में चलते हैं, इसलिए यह ऋणात्मक है (हम प्रायः इसका परिमाण बताते हैं)।
- "मुफ़्त" को बिना कमाई समझना। मुफ़्त मॉडल का खर्च विज्ञापन, पैसे वाले संस्करण या बाद की बिक्री से निकलता है।