साझेदारी का विघटन बनाम फर्म का विघटन
साझेदारी का विघटन: साझेदारों का संबंध बदलता है (प्रवेश, सेवानिवृत्ति, मृत्यु, अनुपात बदलना) पर फर्म चलती रहती है। पुस्तकें चलती हैं।
फर्म का विघटन: सभी साझेदारों का संबंध ख़त्म, व्यापार बंद। सभी पुस्तकें बंद।
फर्म का विघटन हमेशा साझेदारी का विघटन है, पर उलटा नहीं।
फर्म के विघटन के तरीक़े
- सहमति से: सभी साझेदार सहमत या विलेख के अनुसार।
- अनिवार्य: सभी या एक को छोड़ सभी दिवालिया, या व्यापार अवैध।
- कुछ घटनाओं पर: तय अवधि ख़त्म, काम पूरा, मृत्यु, दिवालियापन।
- सूचना से: इच्छाधीन साझेदारी में लिखित सूचना।
- न्यायालय द्वारा: साझेदार का मानसिक असंतुलन, स्थायी अक्षमता, दुराचार, समझौते का बार-बार उल्लंघन, लगातार हानि आदि।
खातों का निपटारा
धारा 48 के अनुसार भुगतान क्रम: पहले बाहरी दायित्व, फिर साझेदारों के ऋण, फिर पूँजी, और बचा लाभ अनुपात में। हानियाँ पहले लाभ से, फिर पूँजी से, फिर साझेदार स्वयं लाभ अनुपात में।
वसूली खाता
- संपत्तियाँ (नकद/बैंक और कृत्रिम छोड़कर) पुस्तक मूल्य पर नामे। संपत्तियों पर प्रावधान जमा।
- बाहरी दायित्व जमा।
- संपत्ति बिक्री: बैंक नामे, वसूली जमा।
- दायित्व भुगतान: वसूली नामे, बैंक जमा।
- साझेदार संपत्ति ले: उसका पूँजी खाता नामे, वसूली जमा। दायित्व ले: वसूली नामे, उसका पूँजी जमा।
- वसूली व्यय: वसूली नामे, बैंक जमा (साझेदार दे तो उसका पूँजी जमा)।
- अलिखित संपत्ति बिकी: बैंक नामे, वसूली जमा। अलिखित दायित्व चुकाया: वसूली नामे, बैंक जमा।
- शेष = लाभ या हानि, लाभ अनुपात में।
साझेदार का ऋण वसूली में नहीं जाता; सीधे चुकाया जाता है।
साझेदारों के पूँजी खाते और रोकड़/बैंक खाता
पूँजी खातों में: संचय (जमा), संचित हानि व कृत्रिम संपत्ति (नामे), वसूली लाभ-हानि, ली गई संपत्ति या दायित्व। अंतिम शेष नकद दिया जाता है या (नामे शेष हो तो) लाया जाता है।
बैंक खाता शुरुआती शेष, बिक्री की राशि और लाया नकद जोड़ता है, भुगतान घटाता है, और शून्य पर बंद होता है। क्रमिक वितरण, कंपनी को बिक्री और दिवालियापन पाठ्यक्रम से बाहर हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- वसूली लाभ/हानि = (संपत्ति से नकद + हस्तांतरित दायित्व) − (हस्तांतरित संपत्ति + चुकाए दायित्व + व्यय)
- संपत्ति पुस्तक मूल्य पर → नामे; दायित्व → जमा
- धारा 48: बाहरी → साझेदारों के ऋण → पूँजी → बचा लाभ अनुपात में
- साझेदार को अंतिम भुगतान = पूँजी + संचय ± वसूली परिणाम ± ली गई मदें
- बैंक खाता शून्य पर बंद
हल किए गए उदाहरण
1. संपत्तियाँ ₹3,00,000, बिकीं ₹2,80,000; लेनदार ₹1,00,000 को ₹95,000; व्यय ₹5,000।
नामे 4,00,000; जमा 3,80,000; हानि ₹20,000।
2. A ₹20,000 का स्टॉक ₹18,000 में लेता है।
A का पूँजी खाता नामे ₹18,000, वसूली जमा।
3. लेनदार ₹50,000, ₹30,000 का फ़र्नीचर और ₹18,000 नकद में पूरा निपटारा।
केवल नकद: वसूली नामे ₹18,000, बैंक जमा।
4. अलिखित कंप्यूटर ₹8,000 में बिका; अलिखित बिल ₹3,000 चुकाया।
वसूली जमा 8,000, नामे 3,000: शुद्ध +₹5,000।
5. B को ₹5,000 पारिश्रमिक, व्यय ₹4,000 वह स्वयं देगा।
वसूली नामे ₹5,000, B का पूँजी जमा। वास्तविक व्यय की प्रविष्टि नहीं।
6. वसूली के बाद A ₹90,000, B ₹60,000, नकद ₹1,50,000।
A नामे 90,000, B नामे 60,000, बैंक जमा 1,50,000। बैंक शून्य।
आम गलतियाँ
- नकद या बैंक शेष वसूली खाते में ले जाना।
- साझेदार का ऋण वसूली में ले जाना।
- लेनदार को दी गई संपत्ति की अलग प्रविष्टि करना।
- वसूली लाभ पूँजी अनुपात में बाँटना; लाभ अनुपात लें।