South 고등학교 1학년 Korean History 2
अध्याय: 3
1. Colonial rule and national movements
Colonial policies in imperial context · Colonial economic exploitation · National movements at home and abroad · Social and cultural change under rule · Building an independent state
- साम्राज्यवाद: साम्राज्य क्यों फैले और लोगों ने कैसे विरोध किया – साम्राज्यवाद तब होता है जब एक ताक़तवर राज्य युद्ध, संधि या पैसे से दूसरी भूमि और लोगों पर नियंत्रण कर लेता है। उपनिवेशवाद इसका एक रूप है: उपनिवेश पर सीधा शासन। लगभग 1870 से 1914 तक ('नव साम्राज्यवाद') औद्योगिक देशों में अफ़्रीका, एशिया और प्रशांत में उपनिवेशों की होड़ लगी। उन्हें कच्चा माल, बाज़ार, पूँजी लगाने की जगह, बंदरगाह और रुतबा चाहिए था, और इसे नस्लवादी विचारों से सही ठहराया गया। नियंत्रण व्यापार चौकी से असमान संधि और फिर पूरे उपनिवेश तक बढ़ा। उपनिवेशों का धन बाहर गया: कच्चा माल सस्ते में गया, मशीनी माल लौटा, स्थानीय उद्योग गिरे। लोगों ने विद्रोह, सुधार और जन आंदोलनों से विरोध किया, और 1970 के दशक तक ज़्यादातर उपनिवेश स्वतंत्र हो गए। पीछे छूटी सीमाएँ और असमानता आज भी दुनिया को प्रभावित करती हैं।
- स्वतंत्रता आंदोलन: औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्र राज्य तक – स्वतंत्रता आंदोलन किसी देश के लोगों का वह लंबा प्रयास है जिससे वे बाहरी शासन खत्म कर अपना राज्य बनाते हैं। यह आमतौर पर चरणों में बढ़ता है: अन्यायपूर्ण शासन पर गुस्सा, शांतिपूर्ण जनआंदोलन, नेतृत्व (कभी विदेश में), दूसरे देशों का दबाव और कभी-कभी सशस्त्र संघर्ष। कोरिया (1919-1945), भारत (1947 तक) और घाना (1957) एक ही लक्ष्य के अलग रास्ते दिखाते हैं।
- सामाजिक इतिहास: आम लोग कैसे जीते थे – सामाजिक इतिहास सिर्फ़ राजाओं, युद्धों और संधियों का नहीं, आम लोगों के जीवन का अध्ययन है। यह पूछता है कि लोग कैसे काम करते, रहते, खाते, कपड़े पहनते, शादी करते, पूजा करते, बीमार पड़ते और मनोरंजन करते थे, और समाज किन समूहों में बँटा था। आधुनिक समय से पहले ज़्यादातर समाज पिरामिड जैसे थे: ऊपर थोड़े शासक और सामंत, फिर पुरोहित और धनी परिवार, बीच में नगरवासी, व्यापारी और कारीगर, और नीचे किसानों की बहुत बड़ी परत, साथ में कुछ बंधुआ लोग जैसे भूदास या ग़ुलाम। गाँव अपना समुदाय खुद चलाते थे; शहर बाज़ार, गिल्ड और अलग-अलग समूहों के मेल की जगह थे। औद्योगीकरण ने लोगों को खेतों से कारख़ानों में पहुँचाया, मज़दूर वर्ग और बढ़ता मध्य वर्ग बनाया, और यूनियन, नए क़ानून और बाद में कल्याणकारी राज्य लाया। नई रोशनी, यातायात, अख़बार, स्कूल और दवाओं से रोज़ का जीवन बदला। सामाजिक इतिहासकार "छिपे" लोगों (महिलाएँ, ग़रीब, अल्पसंख्यक, प्रवासी) को भी खोजते हैं, और यह भी देखते हैं कि भावनाएँ और रीति-रिवाज कैसे बदले।
2. Development of the Republic of Korea
Cold War and liberation · Korean War and division · Democratisation from April Revolution to June Uprising · Industrialisation and its effects · Cultural and daily-life change
- शीत युद्ध (1945–1991) – शीत युद्ध (1945–1991) दो महाशक्तियों के बीच लंबी होड़ थी: पश्चिमी साथियों के साथ अमेरिका (पूँजीवाद, बहुदलीय चुनाव) और पूर्वी साथियों के साथ सोवियत संघ (साम्यवाद, एक दल का शासन)। दोनों आपस में सीधे कभी नहीं लड़े। उन्होंने विरोधी गुट बनाए (नाटो, वारसा संधि), परमाणु हथियार और अंतरिक्ष की होड़ की, छद्म युद्धों में उलटे पक्षों का साथ दिया (कोरिया, वियतनाम, अफ़ग़ानिस्तान) और 1962 में क्यूबा में परमाणु युद्ध के करीब पहुँचे। भारत जैसे कई नए देश गुटनिरपेक्ष रहे। 1970 के दशक में तनाव-शैथिल्य आया। सोवियत सुधार, बर्लिन दीवार का गिरना (1989) और सोवियत संघ का विघटन (1991) इसका अंत बने।
- लोकतंत्रीकरण – लोकतंत्रीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें कोई देश सत्तावादी शासन से लोकतंत्र की ओर बढ़ता है। इसके चरण होते हैं: सत्तावादी शासन; आंदोलनों, आर्थिक संकट और बाहरी दुनिया से बढ़ता दबाव; पुराने शासकों से बातचीत या टूट; पहले मुक्त चुनाव; और सुदृढ़ीकरण, जब न्यायालय, स्वतंत्र प्रेस, नागरिक समाज और शांतिपूर्ण सत्ता-परिवर्तन लोकतंत्र को स्थिर बनाते हैं। दक्षिण कोरिया (1960 अप्रैल क्रांति, 1980 ग्वांगजू, 1987 जून आंदोलन, 1997 शांतिपूर्ण हस्तांतरण) और पोलैंड (1980 सॉलिडैरिटी, 1981 मार्शल लॉ, 1989 गोलमेज़ और जून चुनाव, 1991 तक मुक्त चुनाव) दो साफ़ उदाहरण हैं। रास्ता सीधा नहीं: यह रुक या पीछे भी जा सकता है।
- आर्थिक संवृद्धि: देश हर साल ज़्यादा कैसे बनाता है – आर्थिक संवृद्धि यानी देश के वास्तविक GDP में बढ़त: एक साल में बनी सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य, कीमत-वृद्धि का असर हटाकर। संवृद्धि दर वास्तविक GDP का प्रतिशत बदलाव है। प्रति व्यक्ति GDP बताता है कि औसतन हर व्यक्ति के हिस्से कितना उत्पादन आया। व्यापार चक्र में संवृद्धि प्रवृत्ति के ऊपर-नीचे होती है, जिससे उत्पादन अंतर बनता है। संवृद्धि ज़्यादा और बेहतर साधनों (मज़दूर, कौशल, मशीनें, तकनीक) से आती है; इससे आय और नौकरियाँ बढ़ती हैं, पर प्रदूषण, असमानता और महँगाई भी आ सकती है।
- सामाजिक इतिहास: आम लोग कैसे जीते थे – सामाजिक इतिहास सिर्फ़ राजाओं, युद्धों और संधियों का नहीं, आम लोगों के जीवन का अध्ययन है। यह पूछता है कि लोग कैसे काम करते, रहते, खाते, कपड़े पहनते, शादी करते, पूजा करते, बीमार पड़ते और मनोरंजन करते थे, और समाज किन समूहों में बँटा था। आधुनिक समय से पहले ज़्यादातर समाज पिरामिड जैसे थे: ऊपर थोड़े शासक और सामंत, फिर पुरोहित और धनी परिवार, बीच में नगरवासी, व्यापारी और कारीगर, और नीचे किसानों की बहुत बड़ी परत, साथ में कुछ बंधुआ लोग जैसे भूदास या ग़ुलाम। गाँव अपना समुदाय खुद चलाते थे; शहर बाज़ार, गिल्ड और अलग-अलग समूहों के मेल की जगह थे। औद्योगीकरण ने लोगों को खेतों से कारख़ानों में पहुँचाया, मज़दूर वर्ग और बढ़ता मध्य वर्ग बनाया, और यूनियन, नए क़ानून और बाद में कल्याणकारी राज्य लाया। नई रोशनी, यातायात, अख़बार, स्कूल और दवाओं से रोज़ का जीवन बदला। सामाजिक इतिहासकार "छिपे" लोगों (महिलाएँ, ग़रीब, अल्पसंख्यक, प्रवासी) को भी खोजते हैं, और यह भी देखते हैं कि भावनाएँ और रीति-रिवाज कैसे बदले।
3. Korea today
Democracy after 1987 · Financial crisis and social change · Peace on the peninsula and in East Asia
- लोकतंत्रीकरण – लोकतंत्रीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें कोई देश सत्तावादी शासन से लोकतंत्र की ओर बढ़ता है। इसके चरण होते हैं: सत्तावादी शासन; आंदोलनों, आर्थिक संकट और बाहरी दुनिया से बढ़ता दबाव; पुराने शासकों से बातचीत या टूट; पहले मुक्त चुनाव; और सुदृढ़ीकरण, जब न्यायालय, स्वतंत्र प्रेस, नागरिक समाज और शांतिपूर्ण सत्ता-परिवर्तन लोकतंत्र को स्थिर बनाते हैं। दक्षिण कोरिया (1960 अप्रैल क्रांति, 1980 ग्वांगजू, 1987 जून आंदोलन, 1997 शांतिपूर्ण हस्तांतरण) और पोलैंड (1980 सॉलिडैरिटी, 1981 मार्शल लॉ, 1989 गोलमेज़ और जून चुनाव, 1991 तक मुक्त चुनाव) दो साफ़ उदाहरण हैं। रास्ता सीधा नहीं: यह रुक या पीछे भी जा सकता है।
- आर्थिक इतिहास: समय के साथ लोग रोज़ी-रोटी कैसे कमाते रहे – आर्थिक इतिहास पढ़ता है कि लोग समय के साथ कैसे उत्पादन, व्यापार और धन का बँटवारा करते रहे। ज़्यादातर इतिहास में अर्थव्यवस्था खेती पर टिकी थी और शासक फ़सल, श्रम या सिक्कों में कर लेते थे। व्यापार, मुद्रा और बैंकों ने आय धीरे-धीरे बढ़ाई। औद्योगिक क्रांति ने प्रति व्यक्ति उत्पादन तेज़ी से बढ़ाया। 20वीं सदी में देशों ने बाज़ार, योजनाबद्ध और मिश्रित मॉडल आज़माए। विकास के साथ संकट भी आए: प्रथम विश्व युद्ध के बाद अति-मुद्रास्फीति, 1929 की महामंदी, 1997 का एशियाई वित्तीय संकट और 2008 का वैश्विक संकट। आज चुनौती है न्यायपूर्ण और टिकाऊ विकास।
- शांति शिक्षा: लोग स्थायी शांति कैसे बनाते हैं – शांति का मतलब सिर्फ़ 'युद्ध नहीं' नहीं है। नकारात्मक शांति = लड़ाई नहीं। सकारात्मक शांति = सबके लिए न्याय, भरोसा और अच्छा जीवन। हिंसा तीन तरह की होती है: प्रत्यक्ष (मारना, युद्ध), संरचनात्मक (अन्यायी नियम जो लोगों को गरीब रखें) और सांस्कृतिक (ऐसे विचार जो नुकसान को सामान्य दिखाएँ)। विचारकों ने रास्ते दिए: मोज़ी ने सबसे बराबर प्रेम और हमलावर युद्ध का विरोध सिखाया; कांट ने कहा न्यायपूर्ण सरकारें, आज़ाद देशों का संघ और मेहमानों से अच्छा बर्ताव शांति को स्थायी बनाते हैं; गांधी ने अहिंसक विरोध दिखाया। टकराव क़दम-दर-क़दम सुलझता है: शांत हों, सुनें, ज़रूरत खोजें, उपाय सोचें, समझौता करें। बँटवारे या युद्ध के बाद मेल-मिलाप पुल की तरह बनता है: बातचीत, सच, माफ़ी, व्यापार, परिवार मिलन और साझा काम। जर्मनी (1990) और दक्षिण अफ़्रीका का सत्य आयोग इसके उदाहरण हैं; कोरियाई प्रायद्वीप जैसे बँटे लोग आज भी शांतिपूर्ण एकीकरण पर चर्चा करते हैं।