ज़रूरत के रूप में काम
काम यानी वह मेहनत जो नतीजा पाने के लिए दुनिया की चीज़ें बदलती है। इंसान पौधे जैसा नहीं जिसे धूप और मिट्टी से खाना अपने आप मिल जाए। हमें खाना बनाना, घर बनाना और कपड़े बनाना पड़ता है। इसलिए काम सबसे पहले एक ज़रूरत है: ज़िंदा रहने के लिए चाहिए।
इसी कारण ज़्यादातर समाजों ने काम लोगों में बाँट दिए। प्राचीन यूनान के कुछ दार्शनिक मानते थे कि ज़रूरत के दबाव वाला काम निचले दर्जे की गतिविधि है, जो इसलिए की जाती है ताकि दूसरे सोचने और सार्वजनिक जीवन में हिस्सा लेने के लिए आज़ाद रहें। आज ज़्यादातर लोग कहते हैं कि हर ईमानदार काम का मूल्य है।
काम और आज़ादी
काम आज़ादी का उलटा लगता है, क्योंकि ज़रूरत हमें धकेलती है। पर काम हमें आज़ाद भी करता है। काम करके हम प्रकृति को बदलते हैं, सिर्फ़ उसकी मानते नहीं। हम गेहूँ का इंतज़ार नहीं करते, उगाते हैं, और तूफ़ान से बचने के लिए घर बनाते हैं।
काम हमें भी बदलता है: हम हुनर, अनुशासन और धीरज सीखते हैं। हेगेल ने कहा कि जो इंसान चीज़ों पर काम करता है, वह नतीजे में अपनी ताक़त देखने लगता है। यहाँ आज़ादी का मतलब है ऐसी चीज़ बनाने की ताक़त जो पहले नहीं थी।
काम एक और आज़ादी देता है: पैसा और समय। पर अगर काम हमारे सारे घंटे खा जाए तो वह खाली समय भी छीन लेता है। इसलिए सवाल "काम या आज़ादी?" नहीं, बल्कि "कौन-सा काम और कितना?" है।
परायापन (Alienation)
परायापन (अंग्रेज़ी alienation, लैटिन alienus यानी "दूसरा, अजनबी") तब होता है जब मज़दूर को काम, उत्पाद या खुद अपना आप पराया लगे। कार्ल मार्क्स ने कारखाने के काम में इसके चार रूप बताए:
- उत्पाद से: जो आपने बनाया उसका मालिक कोई और है;
- गतिविधि से: आप एक छोटा काम दोहराते हैं और कैसे करना है यह चुन नहीं सकते;
- दूसरे लोगों से: आप मिलकर काम करने की जगह होड़ करते हैं;
- अपनी इंसानी रचनात्मक क्षमता से।
अच्छा वेतन पाकर भी कोई पराया महसूस कर सकता है। परायापन नियंत्रण और अर्थ का सवाल है, सिर्फ़ पैसे का नहीं। मार्क्स ने कारखानों के बारे में लिखा, पर वैसा एहसास कॉल सेंटर या अंतहीन डेटा-एंट्री में भी आ सकता है।
काम और आत्म-साक्षात्कार
आत्म-साक्षात्कार यानी वह बनना जो आप पूरी तरह हो सकते हैं। काम इसमें मदद करता है क्योंकि उसमें आप अपनी प्रतिभा लगाते हैं, और जो आपने बनाया वह आपका आईना बन जाता है। बच्चे को सीखते देखता शिक्षक, हरा खेत देखता किसान, अपना ऐप चलते देखता प्रोग्रामर: सब नतीजे में अपने को देखते हैं।
3D दृश्य परायेपन का इलाज दिखाता है: पूरी प्रक्रिया का ज़्यादा हिस्सा खुद करो और क्या बनाना है इसमें राय रखो। पर यह हमेशा संभव नहीं। कुछ काम रोज़ के बँधे-बँधाए होते हैं। तब समाज काम को बेहतर बना सकता है: उचित वेतन, सम्मान, कम घंटे, मज़दूरों की आवाज़ और सीखने के मौके देकर।
कई विचारक यह भी चेताते हैं कि काम ही पूरा जीवन नहीं। हाना आरेन्ट ने श्रम (जो बार-बार हमें ज़िंदा रखता है), कार्य (टिकने वाली चीज़ें बनाना) और कर्म (सार्वजनिक जगह दूसरों के साथ काम करना) अलग किए। अच्छे जीवन में तीनों चाहिए, और आराम भी।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- काम = मेहनत जो दुनिया (और हमें) बदलकर नतीजा पाती है
- ज़रूरत: हम ज़रूरतें पूरी करने के लिए काम करते हैं (खाना, घर, कपड़े)
- आज़ादी: काम से हम प्रकृति को गढ़ते हैं और नई चीज़ें बनाते हैं
- परायापन (मार्क्स): उत्पाद से, गतिविधि से, दूसरे लोगों से, अपनी इंसानी क्षमता से
- आत्म-साक्षात्कार: अपनी प्रतिभा लगाना और बनाई चीज़ में खुद को देखना
- आरेन्ट: श्रम (ज़िंदा रहना), कार्य (टिकने वाली चीज़ें बनाना), कर्म (दूसरों के साथ काम करना)
हल किए गए उदाहरण
1. किसान परिवार का पेट भरने के लिए धान उगाता है। यह मुख्यतः काम का कौन-सा विचार है?
ज़रूरत के रूप में काम। वह इसलिए काम करता है कि परिवार को खाना चाहिए। अगर उसे फ़सल पर गर्व भी होता है तो थोड़ा आत्म-साक्षात्कार भी जुड़ जाता है।
2. एक कामगार रोज़ 3,000 बार वही पेंच कसती है और पूरा फ़ोन कभी नहीं देखती। उसे अच्छा वेतन मिलता है। क्या वह परायापन महसूस कर सकती है?
हाँ, कर सकती है। वह उत्पाद से कटी है (उसे वह पूरा कभी नहीं दिखता) और गतिविधि से भी (कैसे करना है उसमें राय नहीं)। अच्छा वेतन परायापन नहीं मिटाता, क्योंकि परायापन नियंत्रण और अर्थ का सवाल है।
3. एक महिला बैंक की नौकरी छोड़कर छोटा कुम्हारखाना खोलती है। कमाई कम है पर वह ज़्यादा खुश है। कौन-सा विचार इसे समझाता है?
आत्म-साक्षात्कार और आज़ादी। वह खुद चुनती है क्या बनाना है, पूरी प्रक्रिया करती है और नतीजे में खुद को देखती है, इसलिए काम अर्थपूर्ण हो जाता है। ज़रूरत अब भी है (कुछ आमदनी चाहिए), पर अर्थ बढ़ गया है।
4. क्या एक ही नौकरी एक के लिए ज़रूरत और दूसरे के लिए आत्म-साक्षात्कार हो सकती है?
हाँ। एक रसोइया सिर्फ़ तनख़्वाह के लिए पकाता है, दूसरा नए व्यंजन बनाकर खुश रहता है। नौकरी वही है; इंसान का चुनाव, नियंत्रण और अर्थ अलग हैं।
आम गलतियाँ
- काम को सिर्फ़ सज़ा या सिर्फ़ मज़ा मान लेना। दार्शनिक दोनों पहलू देखते हैं: ज़रूरत और संभव आज़ादी।
- परायापन का मतलब "ऊब" समझ लेना। इसका मतलब है काम, उत्पाद या खुद को पराया महसूस करना, जब नियंत्रण और अर्थ न हो।
- सोचना कि ज़्यादा वेतन परायापन ठीक कर देता है। वेतन ज़रूरत में मदद करता है, नियंत्रण और अर्थ में अपने आप नहीं।
- "काम" और "नौकरी" को एक समझना। नौकरी वेतन वाला रोज़गार है; काम वह हर मेहनत है जो दुनिया बदले, इसमें घर का काम, कला और स्वयंसेवा भी आते हैं।