मार्क्स: नींव और ऊपरी ढाँचा
कार्ल मार्क्स (1818-1883) जर्मन विचारक थे। उन्होंने कहा कि किसी समाज को समझना है तो पहले देखिए वह चीज़ें कैसे बनाता है और रोज़ी कैसे कमाता है। यह नींव (base) यानी अर्थव्यवस्था है। इसके ऊपर कानून, स्कूल, धर्म और विचार खड़े होते हैं। इसे ऊपरी ढाँचा (superstructure) कहते हैं।
यानी मार्क्स के लिए अकेले विचार इतिहास को नहीं चलाते। काम और अर्थव्यवस्था इतिहास को आगे बढ़ाते हैं। जब उत्पादन का तरीका बदलता है (जैसे खेत से कारखाने), तो कानून और विचार भी बदलते हैं।
अतिरिक्त मूल्य, शोषण और अलगाव
पूँजीवाद में कारखाने और ज़मीन मालिकों के पास होते हैं। मज़दूरों के पास सिर्फ़ उनका श्रम होता है, जिसे वे मज़दूरी के बदले बेचते हैं। मज़दूर मज़दूरी से ज़्यादा मूल्य का माल बनाता है। यह बचा हुआ मूल्य अतिरिक्त मूल्य (surplus value) है, जिसे मालिक मुनाफ़े के रूप में रख लेता है। मार्क्स ने इसे शोषण कहा।
अलगाव (alienation) का मतलब है अपने ही काम से अजनबी महसूस करना। मज़दूर जो बनाता है वह उसका नहीं होता, वह एक ऊबाऊ काम दोहराता है, और खुद से, दूसरों से और अपनी रचनात्मक शक्ति से कटा हुआ महसूस करता है। काम, जो आज़ाद और रचनात्मक हो सकता था, बोझ बन जाता है।
वर्ग-संघर्ष और बदलाव की आशा
मार्क्स को दो मुख्य समूह दिखे: पूँजी के मालिक और मज़दूर। इनके हित टकराते हैं, यही वर्ग-संघर्ष है। उन्हें उम्मीद थी कि मज़दूर संगठित होकर उत्पादन के साधन अपने हाथ में लेंगे और बिना वर्गों वाला समाज (साम्यवाद) बनाएँगे। कई विचारक उनके सवालों से सहमत हैं पर जवाबों से नहीं। आलोचक कहते हैं कि बाज़ार भी धन बनाते हैं और उनकी बताई क्रांति वैसे नहीं हुई।
फ्रैंकफ़र्ट स्कूल: संस्कृति और आलोचनात्मक सिद्धांत
फ्रैंकफ़र्ट स्कूल जर्मन विचारकों का समूह था, जिसमें अडोर्नो, होर्कहाइमर और मार्क्यूज़ थे। उन्होंने मार्क्स के विचारों को एक नए सवाल पर लगाया: लोग उस व्यवस्था को क्यों मान लेते हैं जो उन्हें बाँधती है? उनका जवाब: मीडिया और खरीदारी हमें वही चाहना सिखाते हैं जो व्यवस्था बेचती है।
अडोर्नो और होर्कहाइमर ने इसे संस्कृति उद्योग (culture industry) कहा: फ़िल्में, गाने और विज्ञापन असेंबली लाइन पर बने सामान की तरह, सब एक जैसे, जो हमें शांत कर देते हैं और गहरे सवाल पूछने से रोकते हैं। मार्क्यूज़ ने एक-आयामी मनुष्य की बात की, यानी ऐसा इंसान जो किसी दूसरे जीवन की कल्पना करना भूल गया। उनकी पद्धति आलोचनात्मक सिद्धांत (critical theory) है: यह पूछना कि मौजूदा हालत से किसे फ़ायदा है, ताकि लोग आज़ाद हो सकें।
हाना आरेन्ट: अधिनायकवाद
हाना आरेन्ट (1906-1975) ने 20वीं सदी की उन तानाशाहियों का अध्ययन किया जो जीवन के हर हिस्से पर कब्ज़ा करना चाहती थीं (अधिनायकवाद)। उन्होंने कहा कि ये तीन चीज़ों से मिलकर चलती हैं: एक विचारधारा जो सब कुछ समझाने का दावा करती है, आतंक जो लोगों को डराता है, और अकेलापन जो लोगों को एक-दूसरे से काट देता है ताकि वे मिलकर कुछ न कर सकें।
अधिकारी एडोल्फ़ आइखमन का मुकदमा देखने के बाद उन्होंने बुराई की साधारणता (banality of evil) की बात लिखी: भयानक काम साधारण लोग कर सकते हैं जो बस आदेश मानते हैं और खुद सोचना छोड़ देते हैं। उनका उपाय है: सोचते रहना, खुद निर्णय करना और सार्वजनिक जीवन में मिलकर काम करना।
तीनों को जोड़कर देखें
मार्क्स पूछते हैं: मालिक कौन, मज़दूर कौन, फ़ायदा किसे? फ्रैंकफ़र्ट स्कूल पूछता है: संस्कृति हमें व्यवस्था मानना कैसे सिखाती है? आरेन्ट पूछती हैं: सत्ता पूरे समाज पर कब्ज़ा कैसे करती है, और हम विरोध कैसे करें? जवाब अलग हैं, पर मक़सद एक: सत्ता को समझना ताकि लोग ज़्यादा आज़ाद हों।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- अतिरिक्त मूल्य = बनाए माल का मूल्य - दी गई मज़दूरी
- नींव (अर्थव्यवस्था) -> ऊपरी ढाँचा (कानून, विचार)
- अलगाव = उत्पाद, काम, दूसरों और खुद से कटना
- संस्कृति उद्योग (अडोर्नो, होर्कहाइमर): सामान की तरह बनी जन-संस्कृति
- अधिनायकवाद (आरेन्ट) = विचारधारा + आतंक + अकेलापन
हल किए गए उदाहरण
1. एक मज़दूर 10 का माल बनाता है और उसे 4 मज़दूरी मिलती है। अतिरिक्त मूल्य कितना है? इसे रखने को मार्क्स क्या कहते हैं?
अतिरिक्त मूल्य = 10 - 4 = 6। मालिक का इसे रखना मार्क्स के अनुसार शोषण है।
2. उदाहरण से नींव और ऊपरी ढाँचा समझाइए।
नींव वह है जिससे समाज कमाता है: पहले खेती, फिर कारखाने। ऊपरी ढाँचा कानून, स्कूल और विचार हैं। कारखाने बढ़े तो काम के घंटों के कानून और मज़दूरों के स्कूल आए। पहले अर्थव्यवस्था बदली, फिर विचार।
3. फ्रैंकफ़र्ट स्कूल के विचारक फ़ॉर्मूला फ़िल्म को 'उद्योग' क्यों कहते हैं?
फ़ॉर्मूला फ़िल्म असेंबली लाइन के सामान की तरह बनती है: वही कहानी, वही सितारे, वही अंत। वह बिकने के लिए बनती है और एक जैसी होने से हमें एक जैसी चीज़ें चाहना सिखाती है, सोचना नहीं।
4. एक सरकार खुली सभाएँ रोकती है, पड़ोसियों की जासूसी कराती है और हर चैनल पर एक ही कहानी सुनाती है। आरेन्ट के कौन-से लक्षण दिखते हैं?
सभाएँ रोकना और जासूसी लोगों को अकेला करती है। हर चैनल पर एक कहानी विचारधारा है। बोलने पर सज़ा मिले तो आतंक भी है।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि मार्क्स आपका टूथब्रश छीनना चाहते थे। वे उत्पादन के साधनों (कारखाने, ज़मीन) की बात करते थे, निजी सामान की नहीं।
- फ्रैंकफ़र्ट स्कूल को 1850 के मार्क्स जैसा मान लेना। विचार मिलते हैं, पर सवाल नए हैं।
- यह कहना कि आरेन्ट ने सिर्फ़ बुरे नेताओं को दोष दिया। उन्होंने यह भी दिखाया कि सोचना छोड़ने वाले साधारण लोग बुराई संभव बनाते हैं।
- आलोचना को अंतिम उत्तर मान लेना। ये विचारक कठिन सवाल पूछते हैं; उनके आलोचकों को भी पढ़िए।