कथक की कहानियाँ कहाँ से आती हैं
कथक शब्द कथा से बना है, यानी कहानी। पुराने समय में कथाकार मंदिरों और गाँवों में आवाज़, हाथों के इशारों और पैरों की चाल से कहानियाँ सुनाते थे।
चार बड़े स्रोत कथक को उसके ज़्यादातर विषय देते हैं:
- रामायण: राम, सीता और लक्ष्मण की कथा और अच्छाई की बुराई पर जीत।
- महाभारत: पांडवों और कौरवों की बड़ी कथा, जिसमें गीता भी है।
- भागवत: कृष्ण की कथाएँ, माखन चुराने वाले बचपन से रास-नृत्य तक।
- गीत गोविंद: जयदेव की 12वीं सदी की कविता, जो राधा-कृष्ण के प्रेम पर है।
नर्तक एक दृश्य चुनता है और उसे अभिनय (चेहरे और हाथों) और लय से दिखाता है।
प्रस्तुति का क्रम
प्रस्तुति रचनाओं की एक कड़ी है। एक आम क्रम यह है:
- वंदना
- बंदिश
- अभिनय की रचना
- तिरवट
- चतुरंग
- तराना
गुरु और नर्तक क्रम बदल सकते हैं या कोई रचना छोड़ भी सकते हैं। बात वही रहती है: आदर से शुरू करो, कौशल दिखाओ, कहानी सुनाओ और खुशी व तेज़ी के साथ खत्म करो।
वंदना और बंदिश
वंदना
शुरू की छोटी प्रार्थना। नर्तक ईश्वर, गुरु, संगीतकारों और दर्शकों को प्रणाम करता है। इसे गाया या बोला जाता है और नर्तक सरल हस्त-मुद्राओं से दिखाता है।
बंदिश
बंदिश यानी "बँधी हुई" रचना: नृत्य के बोलों का तय पैटर्न, जो किसी ताल में बँधा होता है। कथक में आम प्रकार हैं तुकड़ा और तोड़ा (छोटे चमकदार पैटर्न) और परन (ढोल के बोलों वाला मज़बूत पैटर्न)। बंदिश कितनी भी लंबी हो, उसे सम, यानी चक्र की पहली मात्रा, पर लौटना ही होता है। तीनताल में 16 मात्राएँ हैं, इसलिए नर्तक 1 से 16 गिनता है और ठीक 1 पर उतरता है।
अभिनय की रचनाएँ
अभिनय की रचना में गति से ज़्यादा कहानी मायने रखती है। नर्तक हर पंक्ति का अर्थ चेहरे, आँखों और हाथों से दिखाता है।
- ठुमरी: हल्का प्रेम-गीत, अक्सर राधा-कृष्ण पर।
- भजन: भक्ति का गीत।
- गत भाव: बिना शब्दों की कहानी, सिर्फ़ संगीत और गति। नर्तक कृष्ण को बाँसुरी बजाते या द्रौपदी को मदद के लिए पुकारते दिखा सकता है।
तिरवट, तराना और चतुरंग
- तिरवट: ढोल-तबले जैसे बोलों (जैसे धा, तिरकिट) से बना छोटा चमकदार टुकड़ा। इसे आम तौर पर तिहाई से खत्म करते हैं, यानी तीन बार दोहराया पैटर्न जो सम पर उतरता है।
- तराना: तेज़, खुशनुमा रचना। गायक सुरीले बोल (जैसे ता, नो, दिर, दिर) गाता है, जिनमें कहानी के शब्द नहीं होते, और नर्तक तेज़ पैरों और चक्करों से उत्तर देता है।
- चतुरंग: चतुर = चार, अंग = हिस्सा। एक रचना में चार हिस्से जुड़ते हैं: कविता (साहित्य), सरगम (सुरों के नाम सा रे ग म), तराना के बोल और तिरवट के बोल।
ये तीनों रचनाएँ कहानी से ज़्यादा लय और रफ़्तार की हैं। इसी कारण ये वहाँ रखी जाती हैं जहाँ नर्तक अपना कौशल दिखाता है।
करके देखिए: 3D में और घर पर
3D के आख़िरी चरण में छहों बटन दबाइए और आकृति को रास्ते पर चलते देखिए। घर पर तीनताल की 16 मात्राएँ ताली से बजाइए (1 से 16) और हर बार 1 पर पहुँचकर "सम!" कहिए। फिर परिवार के लिए छोटी प्रस्तुति बनाइए: एक प्रणाम, सिर्फ़ हाथों से कही एक कहानी और तेज़ ताली का समापन।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- कथक = कथा (कहानी) + कार (कहने वाला)।
- कहानियों के चार स्रोत: रामायण, महाभारत, भागवत, गीत गोविंद।
- आम क्रम: वंदना, बंदिश, अभिनय की रचना, तिरवट, चतुरंग, तराना।
- बंदिश = ताल में बँधे बोल; वह हमेशा सम (मात्रा 1) पर लौटती है।
- चतुरंग = चतुर (4) + अंग (हिस्सा) = कविता + सरगम + तराना + तिरवट।
हल किए गए उदाहरण
1. एक नर्तक कृष्ण को गाँववालों को बचाने के लिए पहाड़ उठाते दिखाता है। यह कथा किस स्रोत की है और यह कैसी रचना है?
कृष्ण और पहाड़ की कथा भागवत में है। अगर इसे गीत पर चेहरे और हाथों से दिखाया जाए तो यह अभिनय की रचना है; अगर बिल्कुल शब्द न हों तो यह गत भाव है।
2. तीनताल की एक बंदिश बिना रुके 3 बार नाची जाती है। नर्तक कितनी मात्राएँ गिनता है और अंत में कहाँ उतरता है?
तीनताल में 16 मात्राएँ हैं, इसलिए 3 चक्र = 16 × 3 = 48 मात्राएँ। 48वीं मात्रा के बाद नर्तक सम, यानी अगले चक्र की मात्रा 1, पर उतरता है।
3. एक रचना में गाए हुए सुर (सा रे ग म), कविता, तराना के बोल और ढोल के बोल हैं। इसका नाम क्या है और इसमें कितने हिस्से हैं?
यह चतुरंग है, क्योंकि चतुर का अर्थ चार है। चार हिस्से हैं: कविता, सरगम, तराना के बोल और तिरवट के बोल।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि कथक की कहानियाँ सिर्फ़ रामायण से आती हैं। चार स्रोत हैं: रामायण, महाभारत, भागवत और गीत गोविंद।
- बंदिश और अभिनय को मिला देना। बंदिश ताल का लय-पैटर्न है; अभिनय की रचना चेहरे और हाथों से कहानी कहती है।
- यह भूल जाना कि बंदिश सम (मात्रा 1) पर ही खत्म होती है, कहीं भी नहीं।
- चतुरंग में तीन हिस्से मान लेना। उसमें चार हैं: कविता, सरगम, तराना के बोल और तिरवट के बोल।