कला के कैनन का विस्तार
कैनन उन कृतियों और कलाकारों का समूह है जिन्हें संग्रहालय, आलोचक, स्कूल और किताबें "महान" मानते हैं। इसे किसी ने चुना है, इसलिए यह सूची दिखाती है कि किसके पास ताक़त, पैसा और आवाज़ थी। सदियों तक इसमें ज़्यादातर यूरोप और उत्तर अमेरिका के पुरुष कलाकार थे। महिलाएँ, मेहनतकश लोग, गाँव और जनजातीय कलाकार, और एशिया, अफ़्रीका, ओशिनिया और अमेरिका के ज़्यादातर कलाकार छूट गए।
कैनन को चौड़ा करने का मतलब है छूटे हुए रचनाकारों को जोड़ना और यह भी पूछना कि वे क्यों छूटे: कला-स्कूलों तक पहुँच नहीं थी, कला को सिर्फ़ "शिल्प" माना गया, या उनका संग्रह ही नहीं हुआ। 1985 में गुरिल्ला गर्ल्स नाम की महिला कलाकारों के समूह ने पोस्टरों से दिखाया कि बड़े संग्रहालयों में कितनी कम महिलाओं का काम था। आज कई संग्रहालय अपने लेबल दोबारा लिखते हैं, नए कलाकारों का काम खरीदते हैं और लोक, शिल्प और सामुदायिक कला को "ललित कला" के बराबर दिखाते हैं।
प्राच्यवाद और आदिमवाद पर सवाल
प्राच्यवाद (ओरिएंटलिज़्म) देखने के एक तरीक़े का नाम है। 1800 के दशक में कई यूरोपीय चित्रकारों ने मध्य-पूर्व, उत्तर अफ़्रीका और एशिया को सपनीला, आलसी, रहस्यमय या पिछड़ा दिखाया, अक्सर बिना वहाँ गए या लोगों की बात सुने। ये चित्र एकतरफ़ा थे और साम्राज्य की सोच से मेल खाते थे। 1978 में विचारक एडवर्ड सईद ने एक मशहूर किताब लिखकर बताया कि ऐसी तस्वीरें रूढ़ छवियाँ कैसे बनाती हैं।
आदिमवाद (प्रिमिटिविज़्म) एक और पुरानी सोच है। 20वीं सदी की शुरुआत के यूरोपीय कलाकारों ने अफ़्रीका और ओशिनिया के मुखौटों और मूर्तियों की सराहना की और उनके आकार उधार लिए, पर उन्हें "आदिम" कहा, मानो वे यूरोपीय कला से पुरानी या सरल हों। यह ग़लत है। ये कृतियाँ कुशल कलाकारों ने गहरे अर्थ और लंबी परंपराओं के साथ बनाईं। ये अक्सर समुदायों से बिना सहमति के ले भी लिए गए।
आज हम दोनों पर सवाल पूछते हैं: कौन देख रहा है? किसे दिखाया जा रहा है? क्या उनकी कोई राय थी?
दुनिया भर की कला
कला हमेशा यात्रा करती रही है। जापानी लकड़ी की छपाई ने यूरोपीय चित्रकारों को प्रभावित किया, भारतीय वस्त्र और चीनी चीनी-मिट्टी के बर्तनों ने दुनिया भर के डिज़ाइन को आकार दिया, और अफ़्रीकी संगीत और दृश्य रूपों ने कई देशों की आधुनिक कला बनाई। आज कलाकार एक साथ कई देशों में रहते हैं, और द्विवार्षिक प्रदर्शनियाँ व ऑनलाइन गैलरियाँ विश्व कला सबके पास ले आती हैं।
कला को देखने का न्यायपूर्ण तरीक़ा दोतरफ़ा है: विचार और शैलियाँ हर दिशा में चलती हैं, और हर इलाक़ा शिक्षक भी है और विद्यार्थी भी। विश्व कला पढ़ते समय हम संदर्भ पूछते हैं: किसने बनाई, किस मक़सद से (धर्म, उत्सव, रोज़ का जीवन, विरोध) और अपने समुदाय के लिए उसका क्या अर्थ था।
आलोचनात्मक नज़र: तीन सवाल
- किसने बनाया? नाम, जगह, समय, प्रशिक्षण।
- किसके लिए? राजा, मंदिर, गाँव, बाज़ार, या कलाकार के अपने लोग?
- कौन छूट गया? कौन-से रचनाकार, आवाज़ें या कहानियाँ दीवार पर नहीं हैं?
यही सवाल किसी फ़ोटो, पोस्टर, फ़िल्म या ऐप आइकन पर भी पूछिए।
खुद करके देखिए
3D में: चरण 1 में पुरानी दीवार (एक रंग) और फिर चौड़ी दीवार दिखती है। रंग गिनिए। आख़िरी चरण में तीन फ्रेम छुइए और हर एक के लिए तीनों सवालों के जवाब अपनी कॉपी में लिखिए।
घर पर: कोई कला की किताब या वेबसाइट चुनिए। गिनिए कितने कलाकार महिलाएँ हैं और कितने यूरोप से बाहर के हैं। जो नज़र आए उस पर एक वाक्य लिखिए।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- कैनन = वे कृतियाँ जिन्हें संग्रहालय, स्कूल और किताबें सबसे अहम मानते हैं
- प्राच्यवाद = पूरब का एकतरफ़ा बाहरी नज़रिया जो रूढ़ छवियाँ बनाता है
- आदिमवाद = ग़ैर-पश्चिमी कला को सरल या पुरानी कहना; आज इस पर सवाल है
- तीन सवाल: किसने बनाया? किसके लिए? कौन छूट गया?
- न्यायपूर्ण नज़र = संदर्भ के साथ दोतरफ़ा आदान-प्रदान
हल किए गए उदाहरण
1. स्कूल की कला-किताब में 30 कलाकार हैं: 28 यूरोप के पुरुष और 2 महिलाएँ। इससे इसके कैनन के बारे में क्या पता चलता है?
कैनन संकरा है। इसमें बहुत सी महिलाएँ और ग़ैर-यूरोपीय कलाकार छूट गए हैं। चौड़ा कैनन उन्हें जोड़ेगा और बताएगा कि वे क्यों छूटे थे।
2. 19वीं सदी के एक आगंतुक ने दूसरे देश का बाज़ार ऐसे दिखाया: ऊँघते, मुस्कराते लोग और सुनहरी रोशनी। आज का आलोचक इसे प्राच्यवादी क्यों कहेगा?
यह जगह बाहर वाले की नज़र से दिखाई गई है, रूढ़ छवियों (ऊँघते, रहस्यमय) के साथ और असली जीवन के बिना। लोगों से यह नहीं पूछा गया कि वे कैसे दिखना चाहेंगे।
3. संग्रहालय ने एक नक्काशीदार मुखौटे पर "आदिम कला" लिखा है। लेबल को बेहतर कैसे करें?
रचनाकार के समुदाय का नाम लिखिए, बताइए कि मुखौटा किस काम आता था (जैसे किसी अनुष्ठान में) और उसे वही कहिए जो वह है: मक़सद वाली कुशल कला। "आदिम" शब्द हटाइए।
4. कला के दोनों तरफ़ चलने का एक उदाहरण दीजिए।
जापानी लकड़ी की छपाइयों ने यूरोपीय चित्रकारों को प्रेरित किया; बाद में जापान के कलाकारों ने भी यूरोपीय चित्रकला सीखी। दोनों ने सीखा और बदले।
आम गलतियाँ
- कैनन को "सबसे अच्छी" कला की स्थिर सूची मान लेना। इसे लोगों ने चुना है और यह बदलती रहती है।
- यह सोचना कि प्राच्यवाद का मतलब सिर्फ़ "पूरब को चित्रित करना" है। असली दिक़्क़त एकतरफ़ा, रूढ़ नज़रिया है।
- परंपरागत या जनजातीय कला के लिए "आदिम" शब्द इस्तेमाल करना। ये कृतियाँ कुशल और अर्थपूर्ण हैं।
- ग़ैर-पश्चिमी कला को उसके अपने संदर्भ की जगह सिर्फ़ पश्चिमी सुंदरता के पैमाने से परखना।