डेरिवेटिव अनुबंध क्या है?
डेरिवेटिव (व्युत्पन्न) एक अनुबंध है। इसका मूल्य किसी दूसरी चीज़ से आता है, जिसे अंतर्निहित परिसंपत्ति (underlying) कहते हैं: शेयर, इंडेक्स, मुद्रा, सोना या गेहूँ।
चार मुख्य प्रकार: फ़ॉरवर्ड, फ़्यूचर्स, ऑप्शंस और स्वैप। इनके तीन काम:
- हेजिंग: जोखिम घटाना, जैसे किसान का बिक्री भाव पक्का करना।
- सट्टा (speculation): भाव की दिशा पर दाँव।
- आर्बिट्राज: दो अलग भावों से छोटा, सुरक्षित लाभ।
फ़ॉरवर्ड और फ़्यूचर्स: प्रणाली कैसे चलती है
फ़ॉरवर्ड दो लोगों का निजी सौदा है। भाव आज तय, लेन-देन बाद में। ख़तरा: दूसरा पक्ष मुकर सकता है (प्रतिपक्ष जोखिम)।
फ़्यूचर्स इसे ठीक करता है:
- मानक: तय लॉट साइज़, तय समाप्ति तिथि, एक्सचेंज पर।
- क्लियरिंग हाउस बीच में खड़ा होकर सौदे की गारंटी देता है।
- दोनों पक्ष प्रारंभिक मार्जिन जमा करते हैं (अनुबंध मूल्य का लगभग 10–20%)।
- हर दिन मार्क टू मार्केट: दिन का लाभ एक खाते में जुड़ता है, हानि दूसरे से कटती है। बैलेंस मेंटेनेंस मार्जिन से नीचे जाए तो मार्जिन कॉल आता है।
- ज़्यादातर फ़्यूचर्स समाप्ति से पहले बंद कर दिए जाते हैं; कुछ नक़द में, कुछ डिलीवरी से निपटते हैं।
लॉन्ग और शॉर्ट
ख़रीदार लॉन्ग (भाव बढ़े तो लाभ), विक्रेता शॉर्ट (भाव गिरे तो लाभ)। लॉन्ग का लाभ = समाप्ति भाव − फ़्यूचर्स भाव।
ऑप्शंस: कॉल, पुट और लाभ-हानि
ऑप्शन ख़रीदार को अधिकार देता है, कर्तव्य नहीं। ख़रीदार विक्रेता (राइटर) को प्रीमियम देता है।
- कॉल ऑप्शन: स्ट्राइक भाव पर ख़रीदने का अधिकार।
- पुट ऑप्शन: स्ट्राइक भाव पर बेचने का अधिकार।
यूरोपीय ऑप्शन सिर्फ़ समाप्ति के दिन, अमेरिकी ऑप्शन समाप्ति तक किसी भी दिन इस्तेमाल हो सकता है।
समाप्ति पर लाभ-हानि (प्रति इकाई)
- कॉल ख़रीदार: max(S − K, 0) − प्रीमियम। ब्रेक-ईवन = K + प्रीमियम।
- पुट ख़रीदार: max(K − S, 0) − प्रीमियम। ब्रेक-ईवन = K − प्रीमियम।
- ख़रीदार की सबसे बड़ी हानि = प्रीमियम। राइटर की हानि बहुत बड़ी हो सकती है, इसलिए उसे मार्जिन रखना होता है।
मनीनेस
कॉल इन द मनी जब S > K, एट द मनी जब S = K, आउट ऑफ़ द मनी जब S < K। पुट में उल्टा।
फ़्यूचर्स और ऑप्शंस का मूल्य निर्धारण
फ़्यूचर्स भाव ≈ हाज़िर भाव + कैरी लागत। चीज़ को बाद तक रखने में ब्याज (और भंडारण) का ख़र्च है। सरल रूप: F = S × (1 + r × t) − आय, जहाँ r सालाना ब्याज दर और t सालों में समय है।
प्रीमियम = आंतरिक मूल्य + समय मूल्य।
- आंतरिक मूल्य = अभी इस्तेमाल करने पर मिलने वाला: कॉल के लिए max(S − K, 0), पुट के लिए max(K − S, 0)।
- समय मूल्य = वह अतिरिक्त रक़म जो लोग इसलिए देते हैं कि भाव अभी आपके पक्ष में जा सकता है। समाप्ति पर यह शून्य हो जाता है (टाइम डिके)।
भाव में ज़्यादा उतार-चढ़ाव (अस्थिरता/volatility), ज़्यादा बचा समय और (कॉल में) ऊँची ब्याज दर से प्रीमियम बढ़ता है। विशेषज्ञ ब्लैक-शोल्स या बाइनोमियल मॉडल से सही भाव निकालते हैं।
जोखिम
डेरिवेटिव में लीवरेज होता है: छोटा मार्जिन बड़ा अनुबंध चलाता है, इसलिए हानि तेज़ी से बढ़ती है। ज़्यादातर नए ट्रेडर पैसा गँवाते हैं, इसलिए नियामक चेतावनी देते हैं।
करके देखिए: किसान की हेजिंग
एक किसान 3 महीने बाद 10 बोरी गेहूँ बेचेगा। आज फ़्यूचर्स भाव 100 प्रति बोरी है। दो हालात लिखिए: बाद में भाव 80 और 120। निकालिए (1) गेहूँ बेचकर मिली रक़म, (2) शॉर्ट फ़्यूचर्स पर लाभ या हानि, (3) कुल। दोनों बार कुल 1,000 आएगा। यही पूरी हेजिंग है। फिर 3D में “शॉर्ट फ़्यूचर्स” चुनकर भाव खिसकाइए।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
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हल किए गए उदाहरण
1. आपने 200 पर 50 इकाई का एक फ़्यूचर्स ख़रीदा। समाप्ति पर भाव 212 है। लाभ?
प्रति इकाई लाभ = 212 − 200 = 12। कुल = 12 × 50 = 600।
2. कॉल: स्ट्राइक 100, प्रीमियम 5। समाप्ति भाव 112 और 90 पर प्रति इकाई लाभ?
112 पर: max(12, 0) − 5 = 7 लाभ। 90 पर: max(−10, 0) − 5 = −5, सिर्फ़ प्रीमियम की हानि।
3. पुट: स्ट्राइक 500, प्रीमियम 20। ब्रेक-ईवन और 450 पर लाभ?
ब्रेक-ईवन = 500 − 20 = 480। 450 पर: max(50, 0) − 20 = 30 लाभ प्रति इकाई।
4. हाज़िर भाव 1,000, ब्याज 8% सालाना, समाप्ति 3 महीने बाद, कोई लाभांश नहीं। फ़्यूचर्स भाव?
t = 0.25। F = 1,000 × (1 + 0.08 × 0.25) = 1,000 × 1.02 = 1,020।
5. शेयर 260 पर है। स्ट्राइक 250 की कॉल 18 की है। प्रीमियम को बाँटिए।
आंतरिक मूल्य = 10। समय मूल्य = 18 − 10 = 8।
6. प्रारंभिक मार्जिन 10,000, मेंटेनेंस 7,500; 400 पर 100 इकाई लॉन्ग। दिन 1 भाव 390, दिन 2 भाव 370। मार्जिन कॉल कब और कितना?
दिन 1: हानि 1,000, बैलेंस 9,000 (ठीक)। दिन 2: हानि 2,000, बैलेंस 7,000 (<7,500)। मार्जिन कॉल: 10,000 तक भरना = 3,000।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि ऑप्शन ख़रीदार को ख़रीदना/बेचना ही पड़ेगा। ख़रीदार के पास अधिकार है; कर्तव्य सिर्फ़ राइटर का है।
- लाभ निकालते समय प्रीमियम भूल जाना। लाभ = भुगतान − प्रीमियम।
- कॉल और पुट में उलझना। कॉल भाव बढ़ने पर, पुट भाव गिरने पर लाभ देता है।
- मार्जिन को अनुबंध की क़ीमत समझना। मार्जिन सिर्फ़ सुरक्षा जमा है; लाभ-हानि पूरे अनुबंध मूल्य पर होती है।