वित्तीय बाज़ार क्या है?
वित्तीय बाज़ार वह बाज़ार है जहाँ पैसे और वित्तीय पत्रों (शेयर, बॉन्ड, बिल) की ख़रीद-बिक्री होती है। यह बचत करने वालों (जिन परिवारों के पास अतिरिक्त पैसा है) को पैसे का उपयोग करने वालों (व्यवसाय और सरकार) से जोड़ता है।
वित्तीय बाज़ार के कार्य
- बचत को सबसे अच्छे काम में लगाना (आवंटन कार्य): पैसा वहाँ जाता है जहाँ सबसे ज़्यादा कमाई हो।
- कीमत तय करने में मदद: माँग और पूर्ति से ब्याज दर और शेयर का भाव तय होता है।
- तरलता देना: पत्र बेचकर नकद पाया जा सकता है।
- लेन-देन का ख़र्च घटाना: बचतकर्ता और उपयोगकर्ता आसानी से मिल जाते हैं, जानकारी सस्ती मिलती है।
इसके दो बड़े भाग हैं: मुद्रा बाज़ार (कम समय) और पूँजी बाज़ार (लंबा समय)।
मुद्रा बाज़ार
मुद्रा बाज़ार में कम समय का पैसा चलता है, जो एक साल के अंदर लौटाना होता है। मुख्य खिलाड़ी: RBI, व्यापारिक बैंक, बड़ी कंपनियाँ, म्यूचुअल फंड और सरकार। इसकी कोई एक इमारत नहीं; सौदे फ़ोन और कंप्यूटर से होते हैं।
मुद्रा बाज़ार के प्रपत्र
- ट्रेज़री बिल: भारत सरकार को 91, 182 या 364 दिन का छोटा कर्ज़। यह कम कीमत (बट्टे) पर बिकता है और पूरे अंकित मूल्य पर लौटता है (शून्य कूपन बॉन्ड)। बहुत सुरक्षित।
- वाणिज्यिक पत्र: बड़ी, अच्छी साख वाली कंपनी का बिना जमानत का वचन पत्र, 15 दिन से 1 साल तक; कार्यशील पूँजी या सेतु वित्तीयन (लंबा कर्ज़ आने तक) के लिए।
- मांग मुद्रा (कॉल मनी): बैंकों के बीच का कर्ज़, माँगने पर लौटाना, आमतौर पर 1 से 15 दिन। इससे बैंक ज़रूरी नकद आरक्षित रख पाते हैं। इसकी दर को कॉल दर कहते हैं।
- जमा प्रमाणपत्र: बैंक या वित्तीय संस्था में कम समय की जमा, वाहक रूप में, जब बैंक को ख़ुद पैसा चाहिए।
- वाणिज्यिक बिल: उधार पर माल बेचने पर विक्रेता द्वारा क्रेता पर लिखा विनिमय बिल। विक्रेता इसे बैंक से भुनाकर (बट्टे पर) पहले ही नकद पा सकता है।
पूँजी बाज़ार: प्राथमिक और द्वितीयक
पूँजी बाज़ार में मध्यम और लंबे समय (एक साल से ज़्यादा) का पैसा शेयर, ऋणपत्र, बॉन्ड और लंबे कर्ज़ से चलता है। इसमें बैंक, वित्तीय संस्थाएँ, म्यूचुअल फंड और शेयर बाज़ार आते हैं।
मुद्रा बाज़ार और पूँजी बाज़ार में अंतर
| आधार | मुद्रा बाज़ार | पूँजी बाज़ार |
|---|---|---|
| समय | 1 साल तक | 1 साल से ज़्यादा |
| भागीदार | मुख्यतः RBI, बैंक, बड़ी कंपनियाँ | छोटे निवेशक भी |
| पत्र | ट्रेज़री बिल, वाणिज्यिक पत्र, जमा प्रमाणपत्र | शेयर, ऋणपत्र, बॉन्ड |
| सौदे की रकम | बहुत बड़ी | छोटी भी हो सकती है |
| जोखिम व लाभ | कम जोखिम, कम लाभ | ज़्यादा जोखिम, ज़्यादा लाभ |
| तरलता | बहुत ज़्यादा | कम, पर शेयर बाज़ार मदद करता है |
प्राथमिक बाज़ार (नए निर्गमन का बाज़ार)
यहाँ कंपनी पहली बार नई प्रतिभूतियाँ बेचती है। पैसा सीधे कंपनी को जाता है, इसलिए नई पूँजी बनती है। तरीके: प्रविवरण द्वारा प्रस्ताव (सार्वजनिक निर्गमन / IPO), बिक्री के लिए प्रस्ताव (मध्यस्थ द्वारा), निजी नियोजन (कुछ चुने निवेशकों को), अधिकार निर्गमन (पहले मौजूदा अंशधारकों को) और ई-IPO (शेयर बाज़ार के ज़रिए ऑनलाइन आवेदन)।
द्वितीयक बाज़ार (शेयर बाज़ार / स्कंध विपणी)
यहाँ पहले से जारी प्रतिभूतियाँ निवेशकों के बीच ख़रीदी-बेची जाती हैं। कंपनी को नया पैसा नहीं मिलता। निवेशक को बाहर निकलने का रास्ता मिलता है और शेयर तरल बनते हैं।
| प्राथमिक बाज़ार | द्वितीयक बाज़ार |
|---|---|
| नई प्रतिभूतियाँ | पुरानी प्रतिभूतियाँ |
| कंपनी निवेशक को बेचती है | निवेशक निवेशक को बेचता है |
| सीधे पूँजी निर्माण | अप्रत्यक्ष मदद, तरलता देता है |
| कोई तय जगह नहीं | तय, मान्यता प्राप्त शेयर बाज़ार |
| कीमत कंपनी तय करती है | कीमत माँग और पूर्ति से |
शेयर बाज़ार: कार्य और ख़रीद-बिक्री
शेयर बाज़ार (स्कंध विपणी) एक मान्यता प्राप्त संस्था है जो पुरानी प्रतिभूतियों की ख़रीद-बिक्री के लिए सुरक्षित, नियम वाली जगह देती है। उदाहरण: नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) और BSE।
शेयर बाज़ार के कार्य
- तरलता और विपणन-योग्यता: किसी भी कार्य-दिवस शेयर बेचकर नकद।
- उचित कीमत तय होना: बहुत से ख़रीदारों-विक्रेताओं की माँग-पूर्ति से भाव बनता है।
- सौदों की सुरक्षा: कड़े नियम और समाशोधन व्यवस्था दोनों पक्षों को बचाते हैं।
- आर्थिक विकास में मदद: बचत सबसे लाभदायक कंपनियों में जाती है।
- निवेश की आदत फैलाना: ज़्यादा लोग निवेश सीखते हैं।
- सीमा में सट्टे का अवसर: थोड़ा स्वस्थ सट्टा बाज़ार को चालू रखता है।
ख़रीद-बिक्री की प्रक्रिया (स्क्रीन आधारित)
- सेबी में पंजीकृत दलाल चुनें।
- निक्षेपागार सहभागी के ज़रिए डीमैट और ट्रेडिंग खाता खोलें; PAN और KYC ज़रूरी।
- आदेश दें (ख़रीदना या बेचना, कितने, किस भाव पर)।
- शेयर बाज़ार की ऑनलाइन व्यवस्था में मिलान; दलाल 24 घंटे में अनुबंध पत्र भेजता है।
- निपटान: पैसा और शेयर बदलते हैं। भारत में अब T+1 (सौदे के एक कार्य-दिवस बाद)।
निक्षेपागार और डीमैट
अभौतिकीकरण (डीमैट) का मतलब है काग़ज़ी शेयर प्रमाणपत्रों को इलेक्ट्रॉनिक प्रविष्टि में बदलना। डीमैट खाता शेयरों को वैसे रखता है जैसे बैंक खाता पैसे को।
निक्षेपागार (डिपॉज़िटरी) वह संस्था है जो ये इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड रखती है। भारत में दो हैं: NSDL और CDSL। निवेशक इनसे निक्षेपागार सहभागी (DP), जैसे बैंक या दलाल, के ज़रिए जुड़ता है।
डीमैट के लाभ
- काग़ज़ के खोने, चोरी, फटने या नकली होने का डर नहीं।
- जल्दी हस्तांतरण; डीमैट शेयरों के हस्तांतरण पर स्टाम्प शुल्क नहीं।
- बोनस, अधिकार शेयर और लाभांश सीधे खाते में।
- एक खाते में कई तरह की प्रतिभूतियाँ।
सेबी: उद्देश्य और कार्य
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) 1988 में बना और सेबी अधिनियम, 1992 से इसे कानूनी शक्ति मिली। यह प्रतिभूति बाज़ार का चौकीदार है।
उद्देश्य
- शेयर बाज़ारों और प्रतिभूति उद्योग का नियमन, ताकि काम व्यवस्थित हो।
- निवेशकों के अधिकारों और हितों की रक्षा।
- ग़लत कामों को रोकना, स्व-नियमन और कानून में संतुलन।
- दलाल, मर्चेंट बैंकर जैसे बिचौलियों के लिए आचार संहिता बनाना।
कार्य
- नियामक कार्य: दलाल, उप-दलाल, मर्चेंट बैंकर, म्यूचुअल फंड का पंजीकरण; अधिग्रहण के नियम; शुल्क और जुर्माना; शेयर बाज़ारों की जाँच।
- विकासात्मक कार्य: बिचौलियों का प्रशिक्षण, अच्छे तरीकों को बढ़ावा, शेयर जारी करना आसान बनाना (जैसे ई-IPO)।
- सुरक्षात्मक कार्य: भेदिया व्यापार (इनसाइडर ट्रेडिंग) और कीमतों में हेराफेरी पर रोक, धोखे पर रोक, कंपनियों से सच्ची जानकारी दिलवाना, निवेशकों को शिक्षित करना।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- मुद्रा बाज़ार = 1 साल तक का पैसा; पूँजी बाज़ार = 1 साल से ज़्यादा
- प्राथमिक बाज़ार = नए निर्गमन (पैसा कंपनी को); द्वितीयक बाज़ार = पुरानी प्रतिभूतियाँ (निवेशक से निवेशक)
- ट्रेज़री बिल का बट्टा = अंकित मूल्य − निर्गम मूल्य
- भारत में निपटान चक्र = T+1
- सेबी के कार्य = सुरक्षात्मक + विकासात्मक + नियामक
- निक्षेपागार: NSDL और CDSL; इनसे DP के ज़रिए जुड़ते हैं
हल किए गए उदाहरण
1. एक बैंक के पास नकद आरक्षित रखने के लिए 3 दिन पैसा कम है। वह कौन-सा बाज़ार और प्रपत्र इस्तेमाल करेगा?
मुद्रा बाज़ार, मांग मुद्रा (कॉल मनी) के ज़रिए। बैंक 1 से 15 दिन के लिए एक-दूसरे से उधार लेते हैं, जो माँगने पर लौटाना होता है।
2. सरकार ₹100 अंकित मूल्य का 91 दिन का ट्रेज़री बिल ₹98 में जारी करती है। निवेशक को कितना मिलता है?
निवेशक अभी ₹98 देता है और 91 दिन बाद ₹100 पाता है। कमाई = ₹100 − ₹98 = ₹2। यही बट्टा है; अलग से ब्याज नहीं।
3. एक नई कंपनी पहली बार जनता को शेयर देती है। प्रिया को 20 शेयर मिलते हैं। अगले साल वह उन्हें NSE पर रवि को बेचती है। दोनों बार कौन-सा बाज़ार है?
पहली बार: प्राथमिक बाज़ार (IPO), पैसा कंपनी को। दूसरी बार: द्वितीयक बाज़ार (शेयर बाज़ार), पैसा रवि से प्रिया को; कंपनी को कुछ नया नहीं मिलता।
4. एक सूचीबद्ध कंपनी और पूँजी चाहती है और पहले अपने अंशधारकों को 1:4 में नए शेयर देती है। यह कौन-सा तरीका है? राहुल के पास 400 शेयर हैं। वह कितने के लिए आवेदन कर सकता है?
यह प्राथमिक बाज़ार का अधिकार निर्गमन है। राहुल 400 × 1/4 = 100 नए शेयर ले सकता है।
5. अनु सोमवार (कार्य-दिवस) को 50 शेयर बेचती है। T+1 में पैसा कब आएगा?
सौदे के एक कार्य-दिवस बाद, यानी मंगलवार को।
6. कंपनी का एक निदेशक चुपचाप शेयर ख़रीदता है क्योंकि उसे पता है कि बड़ा लाभ घोषित होने वाला है। सेबी का कौन-सा कार्य इसे रोकता है?
यह भेदिया व्यापार है। सेबी का सुरक्षात्मक कार्य इस पर रोक लगाता है और सेबी निदेशक को दंड दे सकता है।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि शेयर बाज़ार में शेयर बिकने पर कंपनी को पैसा मिलता है। कंपनी को पैसा सिर्फ़ प्राथमिक बाज़ार में मिलता है।
- ट्रेज़री बिल को कंपनी का कर्ज़ कहना। यह सरकार को छोटा कर्ज़ है।
- निक्षेपागार और निक्षेपागार सहभागी में गड़बड़। NSDL/CDSL निक्षेपागार हैं; बैंक या दलाल DP है।
- कहना कि मुद्रा बाज़ार में शेयर बिकते हैं। शेयर पूँजी बाज़ार के हैं।