मृदा और जल का क्षरण क्या है?
क्षरण का मतलब है बिगड़ना। मिट्टी तब क्षरित कहलाती है जब उसकी ऊपरी परत खो जाए, वह बहुत खारी हो जाए, पोषक तत्व या बनावट खो दे या ज़हरीली हो जाए। पानी तब क्षरित है जब उसमें गाद, नमक या रसायन घुले हों।
मिट्टी और पानी जुड़े हुए हैं: बारिश मिट्टी से होकर नदियों और भूजल में जाती है। इसलिए एक का नुकसान लगभग हमेशा दूसरे तक पहुँचता है।
- बनने में धीमी, खोने में तेज़: 1 सेमी ऊपरी मिट्टी बनने में सैकड़ों साल लग सकते हैं, पर तेज़ कटाव उसे कुछ साल में उड़ा सकता है।
- मिट्टी फ़सल उगाती है, पानी जमा करती है, प्रदूषण छानती है और कार्बन संभालती है। क्षरण से चारों काम बिगड़ते हैं।
वनों की कटाई और मृदा अपरदन
जंगल मिट्टी को तीन तरह से बचाता है: पत्तियाँ बूँदों का वेग तोड़ती हैं, पत्ती का ढेर पानी सोखता है और जड़ें मिट्टी को बाँधती हैं। पेड़ कटे तो तीनों चले गए।
तब बारिश मिट्टी को ढीला करती है, ढलान पर बहती है और उसे बहा ले जाती है। यह मृदा अपरदन (कटाव) है। प्रभाव:
- मिट्टी पतली और कमज़ोर, इसलिए फ़सल कम।
- नदियाँ गंदली: गाद बाँधों, नहरों और नदी की तली में जमती है और बाढ़ लाती है।
- ढलानों पर गहरी खाइयाँ (गली) बन जाती हैं। सूखी नंगी मिट्टी को हवा भी उड़ा ले जाती है।
ज़्यादा चराई और ढलान पर ऊपर-नीचे जुताई वही काम करती हैं जो पेड़ काटना: मिट्टी नंगी छोड़ देती हैं।
खेती और सिंचाई: लवणीकरण
सिंचाई का हर पानी, साफ़ नहर का भी, थोड़ा घुला नमक लाता है। पौधे पानी लेते हैं और धूप कुछ पानी उड़ा देती है। नमक पीछे मिट्टी में रह जाता है।
अगर ज़मीन में अच्छी निकासी न हो, तो फालतू पानी जमा होता है और भूजल-स्तर ऊपर चढ़ता है (जलभराव)। फिर पानी केशिका क्रिया से मिट्टी में ऊपर चढ़ता है, ऊपर वाष्पित होता है और सफ़ेद नमक की पपड़ी छोड़ जाता है। यही लवणीकरण है।
- नमक के कारण जड़ों के लिए पानी लेना कठिन होता है, इसलिए गीली मिट्टी में भी पौधे मुरझाते हैं।
- सोडियम ज़्यादा हो तो चिकनी मिट्टी चिपचिपी और सख़्त हो जाती है।
- किसान ऐसे खेत छोड़ देते हैं, और सूखे इलाक़ों में सिंचित क्षेत्र का बड़ा हिस्सा प्रभावित होता है।
खेती के और असर: ज़्यादा खाद, कीटनाशक और एक ही फ़सल हर साल बोने से पोषक तत्व घटना।
उद्योग, प्रदूषण और बचाव
कारखाने, खदानें, शहर और खेत मिट्टी और पानी को प्रदूषित कर सकते हैं: भारी धातुएँ (सीसा, पारा, कैडमियम), तेल, अम्ल, प्लास्टिक, गंदा पानी और खाद से निकला नाइट्रेट। बारिश सतह का प्रदूषण नदियों में बहा देती है और भूजल में रिसा देती है। कुछ प्रदूषक, जैसे भारी धातुएँ, टूटते नहीं और दशकों रहते हैं। नदी में नाइट्रेट-फ़ॉस्फ़ेट ज़्यादा हो तो शैवाल बढ़ते हैं और ऑक्सीजन खा जाते हैं (यूट्रोफ़िकेशन)।
मिट्टी और पानी को बचाना:
- जड़ें: पेड़ और आवरण फ़सलें लगाइए, सीढ़ीदार खेत और समोच्च जुताई कीजिए, ज़्यादा चराई रोकिए।
- निकासी: जल-निकासी बनाइए, टपक सिंचाई अपनाइए, फ़सल को उतना ही पानी दीजिए जितना चाहिए, नमक सहने वाली फ़सलें उगाइए।
- सफ़ाई: कारखाने का कचरा और सीवेज छोड़ने से पहले साफ़ कीजिए, खाद-कीटनाशक ज़रूरत भर ही डालिए, कंपोस्ट अपनाइए, नालों के किनारे पौधों की पट्टियाँ रखिए।
करके देखिए: ट्रे पर बारिश की जाँच
दो ट्रे में बगीचे की मिट्टी भरकर तिरछा रखिए। एक को नंगा छोड़िए। दूसरी पर घास या छोटे पौधे लगाइए। झारी से दोनों पर बराबर पानी ऊपर से डालिए। बहा पानी पारदर्शी कपों में इकट्ठा कीजिए। दोनों कपों की गाद की तुलना कीजिए। अब 3D में नुकसान बढ़ाकर बचाव बटन दबाइए: वही सबक दिखेगा।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- मिट्टी का नुकसान: 1 हेक्टेयर पर 1 सेमी मिट्टी ≈ 100 m³ ≈ 130 टन (घनत्व लगभग 1300 किग्रा/m³)
- किसी गहराई के नुकसान में लगे वर्ष = (उस गहराई के टन प्रति हेक्टेयर) ÷ (हर साल का नुकसान टन/हे./वर्ष)
- जुड़ा नमक = पानी का आयतन (लीटर) × पानी में नमक (ग्राम/लीटर) ÷ 1000 → किग्रा
- 1 हेक्टेयर = 10 000 m²; 1 हे. पर 1 मिमी पानी = 10 m³ = 10 000 लीटर
- मुख्य शब्द: अपरदन, लवणीकरण, जलभराव, प्रदूषण, यूट्रोफ़िकेशन, अपवाह
हल किए गए उदाहरण
1. एक पहाड़ी खेत हर साल प्रति हेक्टेयर 13 टन मिट्टी खोता है। 1 सेमी ऊपरी मिट्टी खोने में कितना समय लगेगा? (1 हे. पर 1 सेमी लगभग 130 टन है।)
समय = 130 ÷ 13 = 10 साल। इस रफ़्तार से 20 सेमी ऊपरी मिट्टी लगभग 200 साल में ख़त्म हो जाएगी।
2. अगर प्रकृति 1 सेमी ऊपरी मिट्टी लगभग 200 साल में बनाती है और कटाव 1 सेमी 10 साल में हटा देता है, तो नुकसान बनने से कितना गुना तेज़ है?
200 ÷ 10 = 20 गुना तेज़। इसीलिए इंसानी समय के पैमाने पर मिट्टी को ग़ैर-नवीकरणीय संसाधन कहा जाता है।
3. एक खेत को साल में 500 मिमी सिंचाई का पानी मिलता है, जिसमें 0.4 ग्राम नमक प्रति लीटर है। हर साल एक हेक्टेयर में कितना नमक जुड़ता है?
1 हे. पर 500 मिमी = 500 × 10 m³ = 5000 m³ = 50,00,000 लीटर। नमक = 50,00,000 × 0.4 ग्राम = 20,00,000 ग्राम = 2000 किग्रा = 2 टन। अगर निकासी इसे बहा न दे, तो हर साल 2 टन नमक जमा होता है।
4. जिस खेत में बार-बार पानी दिया जाता है पर नालियाँ नहीं हैं, वहाँ सफ़ेद पपड़ी क्यों दिखती है?
फालतू पानी निकल नहीं पाता, इसलिए भूजल-स्तर चढ़ता है। पानी मिट्टी से ऊपर आता है, सतह पर वाष्पित हो जाता है और घुला नमक सफ़ेद पपड़ी के रूप में छोड़ जाता है। यही लवणीकरण है।
5. एक कारखाना नाले में अम्लीय कचरा बहा देता है। आगे मिट्टी और पानी पर दो असर बताइए।
पानी अम्लीय और मछलियों-पौधों के लिए ज़हरीला हो जाता है, और कचरे की धातुएँ ज़्यादा घुलती हैं। जब नाला उफनता है या उससे सिंचाई होती है, तो मिट्टी प्रदूषण सोख लेती है। फिर मिट्टी में हानिकारक धातुएँ आ जाती हैं और उसमें उगी फ़सल असुरक्षित हो सकती है।
6. एक किसान हर बारिश के बाद ढलान वाले खेत से भूरा पानी बहता देखता है। तीन उपाय बताइए।
(1) ढलान के आर-पार (समोच्च रेखा पर) जुताई करें, ऊपर-नीचे नहीं। (2) सीढ़ीदार खेत या ढलान के आर-पार घास की पट्टियाँ बनाएँ। (3) मिट्टी को आवरण फ़सल या मल्च से ढककर रखें और सबसे तेज़ ढलान पर पेड़ लगाएँ।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि मिट्टी जल्दी नई बन जाती है। ऊपरी मिट्टी बनने में सैकड़ों साल लगते हैं पर कुछ सालों में बह सकती है।
- यह सोचना कि लवणीकरण केवल समुद्र के पानी से होता है। साफ़ सिंचाई का पानी भी नमक छोड़ जाता है।
- यह सोचना कि ज़्यादा सिंचाई हमेशा फ़ायदेमंद है। निकासी के बिना वह भूजल-स्तर चढ़ाती है और नमक ऊपर लाती है।
- यह सोचना कि मिट्टी और पानी की समस्याएँ अलग हैं। कटाव नदियाँ गंदली करता है, और मिट्टी के रसायन भूजल तक पहुँचते हैं।