धातुकर्म परिसर क्या है?
धातुकर्म परिसर उन उद्योगों का समूह है जो अयस्क और पुरानी धातु (कबाड़) से धातु बनाते हैं। मशीन, इमारत, गाड़ी और तार सबकी नींव धातु है, इसलिए यह मूल उद्योग है। लगभग हर कारखाना अपनी धातु इसी से खरीदता है।
इसके दो बड़े भाग हैं:
- लौह धातुकर्म (लौह = लोहे वाला): लोहा, इस्पात और लोहे की मिश्रधातुएँ। वज़न में यह सबसे बड़ा भाग है।
- अलौह धातुकर्म: बाकी सब धातुएँ, जैसे एल्युमिनियम, ताँबा, निकल, जस्ता, सीसा, टिन, और सोना-चाँदी।
इस्पात कैसे बनता है: पूरी कड़ी
इस्पात कुछ सीधे चरणों में बनता है। पहले खनन से लौह अयस्क और कोकिंग कोयला मिलता है। वात्या भट्ठी (ब्लास्ट फर्नेस) में अयस्क, कोक और चूना-पत्थर पिघलकर कच्चा लोहा देते हैं। फिर उसे साफ करके इस्पात बनता है। अंत में रोलिंग मिल उसे चादर, छड़ और पाइप का आकार देती है।
जो बड़ा कारखाना ये सब चरण एक जगह करता है, वह पूर्ण-चक्र (एकीकृत) संयंत्र है। मिनी-मिल अयस्क छोड़ देती है और बिजली की भट्ठी में कबाड़ पिघलाती है।
ध्यान दो: एक टन लोहे के लिए एक टन से ज़्यादा अयस्क और कुछ कोयला लगता है। उत्पाद अपने कच्चे माल से हल्का होता है। इसीलिए कारखाना कच्चे माल के पास जाता है।
कारखाने की जगह तय करने वाले कारक
- कच्चे माल का खिंचाव: अयस्क से इस्पात बनाने वाले कारखाने अयस्क, कोयले के पास या दोनों के बीच बनते हैं (उराल पेटी इसका जाना-माना उदाहरण है)।
- ऊर्जा का खिंचाव: पिघले एल्युमिना में बिजली गुज़ारकर एल्युमिनियम बनता है, इसलिए कारखाने सस्ती जलविद्युत या दूसरी बिजली के पास लगते हैं।
- उपभोक्ता का खिंचाव: कबाड़ वाली मिनी-मिलें बड़े शहरों में लगती हैं जहाँ कबाड़ मिलता है और धातु बिकती है।
- परिवहन और पानी: रेल, बंदरगाह और ठंडा करने का नदी-जल हर कारखाने के काम आता है।
ताँबे और निकल के अयस्क में धातु कम होती है, इसलिए खान के पास पहले अयस्क का सांद्रण करके वज़न घटाते हैं, फिर गलाते हैं।
समस्याएँ, प्रकृति और दुनिया की तस्वीर
धातु कारखाने धूल, गैसें (जैसे सल्फर डाइऑक्साइड) और धातुमल बनाते हैं। पुराने कारखाने आसपास की हवा, मिट्टी और पानी को गंदा कर सकते हैं। साफ तरीके हैं: फिल्टर, कबाड़ का पुनर्चक्रण और प्रति टन कम ऊर्जा। पुनर्चक्रण से अयस्क और ऊर्जा का बड़ा हिस्सा बचता है।
दुनिया में इस्पात बाकी सब धातुओं से ज़्यादा बनता है। लगभग आधा एक ही देश, चीन, बनाता है। भारत, जापान, रूस और अमेरिका भी बड़े उत्पादक हैं। जिन देशों में अयस्क, कोयला और सस्ती बिजली है, या कबाड़ से भरे बड़े शहर हैं, वे धातु बनाने वाले बनते हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- लौह = लोहा और इस्पात। अलौह = बाकी सब धातुएँ।
- पूर्ण-चक्र संयंत्र: अयस्क + कोक + चूना-पत्थर → कच्चा लोहा → इस्पात → रोल किया माल।
- मिनी-मिल: कबाड़ + बिजली → इस्पात।
- वज़न घटाने वाला उद्योग → कारखाना भारी कच्चे माल के पास।
- बिजली-भूखा उद्योग (एल्युमिनियम) → कारखाना सस्ती बिजली के पास।
हल किए गए उदाहरण
1. अयस्क से इस्पात बनाने वाला कारखाना अयस्क-कोयला क्षेत्र के पास क्यों बनता है?
अयस्क और कोयला भारी हैं और बना इस्पात हल्का है। भारी कच्चा माल दूर तक ढोना इस्पात ढोने से महँगा पड़ता है, इसलिए कारखाना कच्चे माल के पास जाता है।
2. एल्युमिनियम कारखाना कहाँ बनाओगे: बॉक्साइट के पास, खरीदारों के पास या जलविद्युत केंद्र के पास? समझाओ।
सस्ती बिजली के पास। एल्युमिनियम बनाने में बाकी हर चीज़ से कहीं ज़्यादा बिजली लगती है, इसलिए बिजली का बिल लागत तय करता है।
3. एक शहर में पुरानी गाड़ियाँ और मशीनें बहुत हैं और इस्पात की छड़ों की माँग भी बड़ी है। कौन-सा कारखाना ठीक रहेगा?
मिनी-मिल। वह बिजली से कबाड़ पिघलाती है, उसे अयस्क-कोयला नहीं चाहिए, और वह कबाड़ व खरीदारों के पास बनती है।
4. एक कारखाना रोज़ 4 टन अयस्क 100 किमी से और 3 टन कोयला 300 किमी से लाता है। कुल ढुलाई खर्च टन × किमी में निकालो। कौन-सा भाग बड़ा है?
अयस्क: 4 × 100 = 400। कोयला: 3 × 300 = 900। कुल = 1300 टन·किमी। कोयले की ढुलाई बड़ा भाग है, इसलिए कोयले के पास जाने से खर्च सबसे ज़्यादा घटेगा (पर तब तक, जब तक अयस्क की ढुलाई न बढ़ जाए)।
आम गलतियाँ
- "लौह" का मतलब "लोहे के रंग का" समझना। इसका मतलब है लोहे वाली धातु।
- हर धातु कारखाने को अयस्क के पास मान लेना। एल्युमिनियम बिजली के पास जाता है, कबाड़ वाला इस्पात शहर के पास।
- सोचना कि धातुकर्म तैयार सामान बनाता है। वह धातु बनाता है जिससे दूसरे कारखाने सामान बनाते हैं।
- कबाड़ को भूल जाना। पुनर्चक्रण धातु का महत्वपूर्ण स्रोत है, कचरा नहीं।