वेर्गा और वेरिस्मो
वेरिस्मो (इतालवी vero यानी सच से) 1870-80 के दशक का इतालवी यथार्थवाद है। फ्रांस के लेखकों की तरह इतालवी लेखक भी जीवन को वैज्ञानिक और ईमानदार नज़र से देखना चाहते थे। सिसिली के जोवान्नी वेर्गा (1840-1922) ने Vita dei campi (जिसमें कहानी Rosso Malpelo है), I Malavoglia (1881) और Mastro-don Gesualdo (1889) लिखे। उनके मुख्य विचार:
- निरपेक्षता (impersonality): लेखक ग़ायब हो जाता है और तथ्य बोलते हैं, जैसे रचना अपने आप बनी हो।
- प्रतिगमन (regression): कथाकार गाँव वालों की तरह सोचता और बोलता है, इसलिए हम लेखक नहीं, गाँव की आवाज़ सुनते हैं।
- पराजित (i vinti): ग़रीब और अमीर दोनों "प्रगति की बाढ़" में बह जाते हैं, कमज़ोर पहले गिरते हैं।
I Malavoglia में मछुआरे का परिवार नाव और धन खो देता है। वे इज़्ज़त और घर बचाना चाहते हैं, पर एक के बाद एक विपत्ति आती है।
पिरांदेल्लो
लुइजी पिरांदेल्लो (1867-1936, नोबेल पुरस्कार 1934) "मुखौटों" के लेखक हैं। उनका विचार है कि जीवन (vita) बहता रहता है, पर समाज हमें नाम और भूमिका जैसे पक्के रूप (forma) में बाँध देता है। दूसरे हमें पहचान सकें, इसलिए हम मुखौटे पहनते हैं, पर इससे हमारा मुक्त रूप खो जाता है। मुख्य रचनाएँ:
- Il fu Mattia Pascal (1904): एक आदमी नई पहचान पाता है और देखता है कि कागज़ और नाम के बिना जीना कठिन है।
- Uno, nessuno e centomila (1926): एक आदमी देखता है कि दूसरे उसके सौ अलग रूप देखते हैं, इसलिए वह कोई नहीं है।
- Sei personaggi in cerca d'autore (1921): छह पात्र मंच पर आकर अपनी कहानी माँगते हैं। यह प्रसिद्ध नाटक है।
उनका ख़ास स्वर है umorismo: पहले किसी अजीब बात पर हँसी आती है, फिर उसके पीछे उदासी दिखती है।
स्वेवो
इताला स्वेवो (1861-1928) त्रिएस्ते में रहते थे, जो व्यस्त बंदरगाह-शहर था जहाँ कई संस्कृतियाँ मिलती थीं। उन्होंने मनोविश्लेषण के बारे में पढ़ा था। उनका उपन्यास La coscienza di Zeno (1923) ज़ेनो कोसीनी की "आत्मकथा" है, जो उसने अपने डॉक्टर के लिए लिखी। ज़ेनो सिगरेट नहीं छोड़ पाता, निर्णय नहीं ले पाता और अपनी ही कहानी पर पक्का नहीं है, इसलिए वह अविश्वसनीय कथाकार है। उपन्यास में समय सीधी रेखा नहीं, यादों की उलझन है। ज़ेनो "inetto" है (जो समाज में फिट नहीं बैठता), जैसे स्वेवो के पहले उपन्यास Una vita और Senilità के नायक। फिर भी अंत में वह बीमार दुनिया में अजीब तरह से स्वस्थ रहता है।
इसे "उपन्यास का संकट" क्यों कहते हैं
पुराना यथार्थवादी उपन्यास मानता था कि लेखक पूरा सच देख सकता है। वेर्गा लेखक को छिपा देते हैं। पिरांदेल्लो और स्वेवो आगे जाते हैं: "मैं" टूटा हुआ है, कथाकार पर भरोसा नहीं हो सकता और सच इस पर निर्भर है कि देखने वाला कौन है। यही उपन्यास का संकट है और यही 20वीं सदी के आधुनिक उपन्यास की तैयारी है। लेओपार्दी से तुलना करो, जिन्होंने पहले पूछा था कि हमारी चाहों के पीछे सच क्या है, और आगे नवयथार्थवाद देखो।
खुद करके देखो
अपने दिन की एक घटना तीन बार लिखो। पहले कैमरे की तरह जो सिर्फ़ देखता है (वेर्गा)। फिर तीन लोगों की नज़र से जो उसे अलग-अलग देखते हैं (पिरांदेल्लो)। अंत में अपने मन के उछलते विचारों के रूप में (स्वेवो)।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- वेरिस्मो = निरपेक्ष कथाकार वाला यथार्थवाद (वेर्गा)
- vita (जीवन) बनाम forma (रूप): पिरांदेल्लो
- मुखौटा: समाज की दी हुई भूमिका
- अविश्वसनीय कथाकार: जिस पर पूरा भरोसा नहीं (स्वेवो)
हल किए गए उदाहरण
1. वेर्गा में "निरपेक्षता" का क्या अर्थ है?
लेखक अपनी राय कहानी से बाहर रखता है। तथ्य और गाँव वालों की अपनी आवाज़ कहानी कहती है, इसलिए पाठक को लगता है कि रचना "अपने आप बनी"।
2. "Uno, nessuno e centomila" में मुखौटे का विचार कैसे दिखता है?
नायक देखता है कि हर कोई उसका अलग रूप देखता है। दूसरों के मन में उसके सौ रूप हैं, तो एक सच्चा "मैं" नहीं मिलता, इसलिए वह "कोई नहीं" भी है।
3. ज़ेनो को अविश्वसनीय कथाकार क्यों कहते हैं?
वह डॉक्टर के लिए लिखता है, पर बातें मोड़ता, भूलता और बहाने बनाता है। असली घटना जानने के लिए पंक्तियों के बीच पढ़ना पड़ता है।
आम गलतियाँ
- वेरिस्मो को फ्रांसीसी प्रकृतिवाद के बराबर मान लेना। दोनों जुड़े हैं, पर वेरिस्मो ग़रीब, दक्षिणी, ग्रामीण दृष्टि से है।
- यह कहना कि वेर्गा भावनाओं के बारे में नहीं लिखते। वे लेखक की टिप्पणी से बचते हैं, पात्रों की भावनाओं से नहीं।
- पिरांदेल्लो के मुखौटे को सिर्फ़ रंगमंच की चीज़ समझना। वह सामाजिक भूमिका है।
- ज़ेनो को भरोसेमंद डॉक्टरी केस मानना। डॉक्टर वह है जिसके लिए वह लिख रहा है।