ETF (एक्सचेंज ट्रेडेड फ़ंड) क्या है?
सूचकांक (इंडेक्स) शेयरों के एक समूह की सूची है, जैसे टॉप 50 या टॉप 500 कंपनियाँ। इंडेक्स फ़ंड वही शेयर उसी अनुपात में ख़रीदता है।
ETF इंडेक्स जैसा फ़ंड है जिसकी यूनिट शेयर बाज़ार पर सूचीबद्ध होती हैं। आप ब्रोकर और डीमैट (इलेक्ट्रॉनिक) खाते से बाज़ार भाव पर, बाज़ार खुले रहने तक कभी भी ख़रीद-बेच सकते हैं।
प्रकार: इक्विटी इंडेक्स ETF, गोल्ड ETF (सोने का भाव), बॉन्ड ETF, सेक्टर ETF और अंतरराष्ट्रीय ETF।
ETF की विशेषताएँ और उपयोग
- कम ख़र्च: निष्क्रिय (पैसिव) प्रबंधन, इसलिए व्यय अनुपात बहुत कम।
- दिन भर कारोबार: कीमत दिन में बदलती है; तय भाव (लिमिट) पर ख़रीद सकते हैं।
- पारदर्शी: होल्डिंग यानी इंडेक्स, सबको पता।
- विविध: एक यूनिट में कई कंपनियों का हिस्सा।
- ट्रैकिंग एरर: ETF और इंडेक्स के रिटर्न का छोटा अंतर (फ़ीस, नकद और समय के कारण)। जितना कम, उतना अच्छा।
- डीमैट खाता और ब्रोकरेज चाहिए; कीमत ETF की NAV से थोड़ी ऊपर-नीचे हो सकती है।
उपयोग: पूरे बाज़ार में लंबे समय का सस्ता निवेश, बिना रखे सोने का मालिक बनना, किसी क्षेत्र में जल्दी निवेश।
ETF बनाम म्यूचुअल फ़ंड: सामान्य ओपन-एंडेड फ़ंड फ़ंड हाउस से दिन में एक बार NAV पर ख़रीदा जाता है; ETF दूसरे निवेशकों से एक्सचेंज पर चालू भाव पर।
डेट फ़ंड: मालिक नहीं, कर्ज़दाता
बॉन्ड एक कर्ज़ है जिसका तय अंकित मूल्य, तय कूपन (ब्याज, जैसे 7% सालाना) और परिपक्वता तिथि होती है। डेट फ़ंड बहुत से बॉन्ड और मनी-मार्केट पत्र रखता है।
प्रकार: ओवरनाइट और लिक्विड फ़ंड (बहुत छोटे), शॉर्ट-ड्यूरेशन फ़ंड, कॉर्पोरेट बॉन्ड फ़ंड, गिल्ट फ़ंड (सिर्फ़ सरकारी बॉन्ड, लगभग कोई डिफ़ॉल्ट जोखिम नहीं) और क्रेडिट-रिस्क फ़ंड (कम रेटिंग, ज़्यादा ब्याज, ज़्यादा जोखिम)।
दो जोखिम:
- ब्याज-दर जोखिम: बाज़ार दर बढ़े तो कम ब्याज वाले मौजूदा बॉन्ड कम आकर्षक होते हैं, उनकी कीमत गिरती है। अनुमानित नियम: कीमत में % बदलाव ≈ − ड्यूरेशन × दर में बदलाव। लंबे बॉन्ड की ड्यूरेशन ज़्यादा होती है।
- क्रेडिट (डिफ़ॉल्ट) जोखिम: उधार लेने वाला न चुकाए। रेटिंग एजेंसियाँ AAA (सबसे सुरक्षित) से D (डिफ़ॉल्ट) तक ग्रेड देती हैं।
लिक्विड फ़ंड: फ़ालतू पैसा रखने की जगह
लिक्विड फ़ंड सिर्फ़ उन पत्रों में निवेश करता है जो लगभग 91 दिन में पूरे हों: ट्रेज़री बिल, कमर्शियल पेपर, जमा प्रमाणपत्र। कर्ज़ इतने छोटे हैं कि दर बदलने पर कीमत मुश्किल से हिलती है।
- बहुत कम जोखिम, स्थिर छोटा रिटर्न (अक्सर बचत खाते से थोड़ा ज़्यादा)।
- पैसा आमतौर पर अगले कार्य-दिवस निकाल सकते हैं।
- उपयोग: आपातकालीन कोष, निवेश के इंतज़ार में पैसा, व्यवसाय का कुछ हफ़्तों का फ़ालतू नकद।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- ETF का मूल्य = यूनिट × बाज़ार भाव
- ट्रैकिंग एरर ≈ इंडेक्स रिटर्न − ETF रिटर्न
- बॉन्ड कूपन (₹) = अंकित मूल्य × कूपन दर
- चालू प्रतिफल (करंट यील्ड) = सालाना कूपन ÷ बाज़ार भाव × 100
- बॉन्ड कीमत में % बदलाव ≈ − ड्यूरेशन × ब्याज दर में बदलाव
- लिक्विड फ़ंड: परिपक्वता ≤ लगभग 91 दिन
हल किए गए उदाहरण
1. आप ₹250 के भाव पर इंडेक्स ETF की 20 यूनिट ख़रीदते हैं। बाद में भाव ₹270 है। लागत, अभी का मूल्य और लाभ % निकालिए।
लागत = 20 × 250 = ₹5,000। मूल्य = 20 × 270 = ₹5,400। लाभ = 400 ÷ 5,000 × 100 = 8%।
2. एक साल में इंडेक्स 12% बढ़ा और उसे ट्रैक करने वाला ETF 11.8%। ट्रैकिंग अंतर कितना?
12 − 11.8 = 0.2 प्रतिशत अंक, मुख्यतः फ़ीस और थोड़े नकद के कारण।
3. बॉन्ड का अंकित मूल्य ₹1,000 और कूपन 7% है। सालाना ब्याज कितना? बाज़ार भाव ₹950 हो तो चालू प्रतिफल?
कूपन = 1,000 × 0.07 = ₹70। चालू प्रतिफल = 70 ÷ 950 × 100 ≈ 7.37%।
4. एक डेट फ़ंड की ड्यूरेशन 4 साल है। ब्याज दर 1% बढ़ी। मूल्य लगभग कितना बदलेगा?
% बदलाव ≈ −4 × 1 = −4%। ₹10,000 की होल्डिंग लगभग ₹9,600 हो जाती है।
5. वही 1% बढ़त, लिक्विड फ़ंड जिसकी ड्यूरेशन 0.1 साल है। बदलाव?
≈ −0.1 × 1 = −0.1%। ₹10,000 सिर्फ़ लगभग ₹9,990 होता है, इसीलिए लिक्विड फ़ंड स्थिर हैं।
6. दर 0.5% घटी। फ़ंड A की ड्यूरेशन 6, फ़ंड B की 1। किसे ज़्यादा फ़ायदा और कितना?
A: +6 × 0.5 = +3%। B: +1 × 0.5 = +0.5%। लंबी ड्यूरेशन वाला A ज़्यादा बढ़ता है (और दर बढ़ने पर ज़्यादा गिरता)।
आम गलतियाँ
- सोचना कि डेट फ़ंड का मूल्य कभी नहीं गिरता। दर बढ़ने या डिफ़ॉल्ट से NAV घट सकती है।
- मानना कि ब्याज दर बढ़ने पर बॉन्ड की कीमत बढ़ती है। उल्टा होता है।
- सोचना कि ETF सामान्य फ़ंड की तरह फ़ंड हाउस से ख़रीदा जाता है। यह शेयर बाज़ार पर ख़रीदा जाता है।
- अगले हफ़्ते चाहिए पैसे को लंबी ड्यूरेशन वाले डेट फ़ंड में रखना। लिक्विड फ़ंड इस्तेमाल कीजिए।