इंटरनेट व्यवसाय और ई-कॉमर्स के प्रकार
ई-कॉमर्स यानी इंटरनेट से वस्तुएँ या सेवाएँ ख़रीदना-बेचना: वेबसाइट, ऐप या सोशल मीडिया पर। यह इंटरनेट व्यवसाय का हिस्सा है, जिसमें ऑनलाइन सेवाएँ, बैंकिंग और बुकिंग भी आती हैं।
कौन किसे बेचता है
- B2C (व्यवसाय से ग्राहक): ऑनलाइन दुकान आपको बेचती है।
- B2B (व्यवसाय से व्यवसाय): कारख़ाना आपूर्तिकर्ता से ऑनलाइन कच्चा माल ख़रीदता है।
- C2C (ग्राहक से ग्राहक): लोग ऐप से पुराना सामान एक-दूसरे को बेचते हैं।
- D2C (सीधे ग्राहक तक): ब्रांड थोक व्यापारी और दुकान को छोड़कर सीधे आपको बेचता है।
- C2B (फ़्रीलांसर कंपनी को काम बेचे) और B2G (कंपनियाँ ई-टेंडर से सरकार को बेचें) भी।
लाभ और सीमाएँ
- ख़रीदार के लिए: 24×7 खुला, बहुत विकल्प, क़ीमत की आसान तुलना, घर पर डिलीवरी, रिव्यू।
- विक्रेता के लिए: दूर के ग्राहकों तक पहुँच, दुकान का कम किराया, ग्राहकों का डेटा।
- सीमाएँ: सामान छू नहीं सकते, डिलीवरी में समय, वापसी महँगी, ऑनलाइन धोखाधड़ी, और बिना इंटरनेट वाले लोग छूट जाते हैं।
मार्केटप्लेस
मार्केटप्लेस एक प्लेटफ़ॉर्म है जहाँ कई स्वतंत्र विक्रेता सामान दिखाते हैं और कई ख़रीदार ख़रीदते हैं। प्लेटफ़ॉर्म आमतौर पर सामान का मालिक नहीं होता (इन्वेंटरी आधारित ऑनलाइन दुकान मालिक होती है)। वह हर बिक्री पर कमीशन, लिस्टिंग फ़ीस, विज्ञापन और डिलीवरी शुल्क से कमाता है।
- ख़रीदारों को ज़्यादा विकल्प और विक्रेता परखने के लिए रेटिंग मिलती है।
- छोटे विक्रेताओं को अपनी साइट बनाए बिना तैयार ग्राहक मिलते हैं।
- पर विक्रेता कमीशन देते हैं, क़ीमत की कड़ी होड़ झेलते हैं और प्लेटफ़ॉर्म के नियमों पर निर्भर रहते हैं।
नेटवर्क प्रभाव: ज़्यादा ख़रीदार ज़्यादा विक्रेता लाते हैं, और ज़्यादा विक्रेता ज़्यादा ख़रीदार।
एम-कॉमर्स और डिजिटल दुकानें
एम-कॉमर्स (मोबाइल कॉमर्स) स्मार्टफ़ोन पर ई-कॉमर्स है: शॉपिंग ऐप, मोबाइल वॉलेट, UPI और QR भुगतान, और सोशल मीडिया दुकानें। कई देशों में अब ज़्यादातर ऑनलाइन ऑर्डर फ़ोन से आते हैं।
डिजिटल दुकानें
असली दुकानें भी डिजिटल साधन अपनाती हैं:
- शेल्फ़ पर QR कोड, सामान की जानकारी और भुगतान के लिए।
- स्क्रीन, डिजिटल प्राइस टैग और ख़ुद बिल बनाने वाले काउंटर।
- क्लिक एंड कलेक्ट: ऑनलाइन ऑर्डर, दुकान से उठाओ।
- दुकान से शिपिंग: पास की दुकान ऑनलाइन ऑर्डर भेजती है।
- अंतहीन शेल्फ़: दुकान में टैबलेट से वह सामान मँगाना जो शेल्फ़ पर नहीं है।
जो कंपनी सारे चैनल जोड़ दे ताकि ग्राहक आसानी से एक से दूसरे पर जा सके, वह ओमनीचैनल है। सिर्फ़ ऑफ़लाइन बेचने वाली 'ब्रिक एंड मोर्टार', दोनों करने वाली 'क्लिक एंड मोर्टार' कहलाती हैं।
ई-रिटेल लॉजिस्टिक्स
लॉजिस्टिक्स यानी सामान को रखना और पहुँचाना ताकि ग्राहक तक समय पर पहुँचे। ऑनलाइन खुदरा में कदम हैं:
- गोदाम / फ़ुलफ़िलमेंट सेंटर: सामान रखा और गिना जाता है।
- चुनना और पैक करना: ऑर्डर का सामान इकट्ठा करके पैक होता है।
- हब पर छँटाई: पार्सल इलाक़े के हिसाब से बाँटे जाते हैं।
- अंतिम मील डिलीवरी: पास के हब से दरवाज़े तक। सबसे महँगा हिस्सा।
- रिवर्स लॉजिस्टिक्स: वापसी और बदलाव का सामान लौटता है।
और भी: कैश ऑन डिलीवरी, डार्क स्टोर (जल्दी डिलीवरी के लिए छोटे गोदाम), और ड्रॉप-शिपिंग (आपूर्तिकर्ता सीधे भेजता है; विक्रेता के पास स्टॉक नहीं होता)।
ई-मार्केटिंग और टेलीमार्केटिंग (गैर-स्टोर खुदरा)
गैर-स्टोर खुदरा बिना असली दुकान के बेचना है: ई-कॉमर्स, टेलीमार्केटिंग, टीवी शॉपिंग, कैटलॉग (डाक से ऑर्डर), वेंडिंग मशीन और प्रत्यक्ष बिक्री।
ई-मार्केटिंग
इंटरनेट से ख़रीदारों को ऑनलाइन दुकान तक लाना: सर्च विज्ञापन और SEO, सोशल मीडिया, ईमेल, इन्फ़्लुएंसर, और पिछली ख़रीदारी के आधार पर सुझाव।
टेलीमार्केटिंग
फ़ोन से बेचना या प्रचार करना। आउटबाउंड: कंपनी ग्राहक को फ़ोन करती है। इनबाउंड: ग्राहक विज्ञापन में दिए नंबर पर फ़ोन करता है। इसमें निजी स्पर्श है पर लोग परेशान भी होते हैं; कई देशों में 'कॉल न करें' रजिस्टर हैं जिनका पालन कंपनियों को करना पड़ता है।
करके देखें
अपना पिछला ऑनलाइन ऑर्डर देखें (या घर के किसी सदस्य से पूछें)। लिखें वह किस प्रकार का था (B2C, C2C, D2C) और 'क्लिक' से 'दरवाज़े' तक के कदम लिखें। फिर 3D में ₹1,000 का सामान रखकर कमीशन बढ़ाएँ। किस कमीशन पर विक्रेता को ₹800 से कम मिलता है?
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- कमीशन = क़ीमत × कमीशन % ÷ 100
- विक्रेता को मिलने वाली राशि = क़ीमत − कमीशन − शिपिंग (− अन्य फ़ीस)
- वापसी दर (%) = लौटे सामान ÷ बिके सामान × 100
- प्रकार: B2C, B2B, C2C, D2C (और C2B, B2G)
- ऑर्डर का रास्ता: क्लिक → चुनना → पैक → भेजना → अंतिम मील → (वापसी)
- ओमनीचैनल = सारे चैनल जुड़े, ग्राहक की एक आसान यात्रा
हल किए गए उदाहरण
1. ₹1,200 का सामान 10% कमीशन और ₹50 शिपिंग वाले मार्केटप्लेस पर बिकता है। विक्रेता को कितना मिलेगा?
कमीशन = 1,200 का 10% = ₹120। विक्रेता को 1,200 − 120 − 50 = ₹1,030।
2. एक छात्रा ऐप से अपनी पुरानी साइकिल किसी दूसरे व्यक्ति को बेचती है। यह किस प्रकार का ई-कॉमर्स है?
C2C (ग्राहक से ग्राहक)।
3. एक ऑनलाइन जूता दुकान ने 2,000 जोड़ी बेचीं और 240 लौटीं। वापसी दर?
वापसी दर = 240 ÷ 2,000 × 100 = 12%।
4. एक कपड़ा ब्रांड ऑनलाइन ऑर्डर लेकर उसी शाम मॉल की दुकान से उठाने देता है। इस सेवा और रणनीति का नाम?
क्लिक एंड कलेक्ट, ओमनीचैनल रणनीति का हिस्सा (ऑनलाइन और दुकान जुड़े)।
5. विक्रेता A: ₹800 का सामान, 20% कमीशन, ₹40 शिपिंग। विक्रेता B: ₹700, 8% कमीशन, ₹60 शिपिंग। प्रति बिक्री किसे ज़्यादा मिलता है?
A: 800 − 160 − 40 = ₹600। B: 700 − 56 − 60 = ₹584। A को ₹16 ज़्यादा।
6. अंतिम मील डिलीवरी ई-रिटेल लॉजिस्टिक्स का सबसे महँगा हिस्सा क्यों है?
हर वैन थोड़े पार्सल अलग-अलग पतों पर ले जाती है, ट्रैफ़िक, असफल डिलीवरी और नकद वसूली के साथ, इसलिए प्रति पार्सल लागत ज़्यादा होती है।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि मार्केटप्लेस बेची हर चीज़ का मालिक है। ज़्यादातर सामान स्वतंत्र विक्रेताओं का होता है।
- विक्रेता की राशि निकालते समय शिपिंग और फ़ीस भूल जाना।
- C2C और D2C को मिलाना। C2C व्यक्ति से व्यक्ति; D2C ब्रांड से आप।
- यह सोचना कि ई-कॉमर्स में लॉजिस्टिक्स नहीं। हर क्लिक के पीछे गोदाम, डिलीवरी और वापसी है।