प्रत्यय: कृत्, तद्धित और स्त्रीप्रत्यय
प्रत्यय वह छोटा अंश है जो धातु या शब्द के बाद जुड़कर नया शब्द बनाता है।
कृत् प्रत्यय (धातु पर)
- क्त्वा: "करके": गम् → गत्वा (जाकर), पठ् → पठित्वा (पढ़कर)।
- ल्यप्: उपसर्ग वाली धातु के साथ वही अर्थ: आ + गम् → आगत्य (आकर)।
- तुमुन्: "करने के लिए": कृ → कर्तुम्, गम् → गन्तुम्।
- क्त / क्तवतु: भूतकाल: गतः (गया हुआ), गतवान् (जो गया)।
- तव्यत् / अनीयर्: "करना चाहिए": कर्तव्यम्, करणीयम्।
- ल्युट्: क्रिया संज्ञा बनकर: गमनम् (जाना)।
तद्धित प्रत्यय (संज्ञा पर)
- त्व / ता: भाव या गुण: गुरुत्वम्, लघुता।
- मतुप् / वतुप् / इनि: "वाला": श्रीमान्, धनवान्, धनी।
- इक: "से संबंधित": धर्म → धार्मिक।
- तर / तम: अधिक / सबसे अधिक: लघुतर, लघुतम।
स्त्रीप्रत्यय
- आ: बाल → बाला, अज → अजा।
- ई: देव → देवी, नद → नदी, पुत्र → पुत्री।
अव्यय: जो शब्द कभी नहीं बदलते
अव्यय का रूप हर लिंग, वचन और विभक्ति में एक-सा रहता है। आम अव्यय सीखिए:
- च (और), अपि (भी), एव (ही), न (नहीं), इति (ऐसा, कथन का अंत), तथा (वैसे)।
- स्थान: अत्र (यहाँ), तत्र (वहाँ), यत्र (जहाँ), कुत्र (कहाँ?)।
- समय: सदा (हमेशा), कदा (कब?), अद्य (आज), श्वः (कल)।
उदाहरण: बालकः च बालिका च पठतः: "च" दोनों में एक-सा है। क्त्वा, तुमुन् और ल्यप् वाले शब्द भी अव्यय बन जाते हैं, क्योंकि गत्वा और कर्तुम् कभी नहीं बदलते।
विभक्ति: सात विभक्तियाँ और उनका प्रयोग
संज्ञा अपना काम बताने के लिए अंत बदलती है। राम (पुल्लिंग, अकारांत) के रूप:
- प्रथमा: कर्ता: रामः गच्छति (राम जाता है)।
- द्वितीया: कर्म: रामम् पश्यति (राम को देखता है)।
- तृतीया: द्वारा या साथ: रामेण (राम के द्वारा)।
- चतुर्थी: को या के लिए: रामाय (राम के लिए)।
- पंचमी: से: रामात् (राम से)।
- षष्ठी: का: रामस्य (राम का)।
- सप्तमी: में या पर: रामे (राम में)।
जिन शब्दों के साथ तय विभक्ति आती है
- नमः के साथ चतुर्थी: गुरवे नमः।
- सह के साथ तृतीया: मित्रेण सह (मित्र के साथ)।
- अभितः, परितः के साथ द्वितीया: ग्रामम् अभितः वनम् अस्ति (गाँव के चारों ओर वन है)।
समास और विग्रह: समासों को तोड़ना
समास शब्दों को जोड़कर एक बनाता है। विग्रह वह वाक्य है जो उसे अलग करके समझाता है।
- तत्पुरुष: दूसरा पद मुख्य; पहला विभक्ति से जुड़ा। राजपुरुषः = राज्ञः पुरुषः (राजा का पुरुष)।
- कर्मधारय: विशेषण + संज्ञा। नीलकमलम् = नीलं च तत् कमलम् (नीला कमल)।
- द्विगु: संख्या + संज्ञा। त्रिलोकी = त्रयाणां लोकानां समाहारः (तीन लोकों का समूह)।
- द्वन्द्व: दोनों पद मुख्य। रामलक्ष्मणौ = रामः च लक्ष्मणः च।
- बहुव्रीहि: किसी अन्य का नाम। पीताम्बरः = पीतम् अम्बरं यस्य सः (जिसके वस्त्र पीले हैं)।
- अव्ययीभाव: अव्यय से शुरू होकर अव्यय जैसा चलता है। उपकृष्णम् = कृष्णस्य समीपम् (कृष्ण के पास)।
समास तोड़ने के लिए: पद ढूँढिए, प्रकार तय कीजिए, फिर विग्रह लिखिए।
करके देखिए: 3D में और घर पर
3D के आख़िरी चरण में 10 बटन दबाइए और भाग (नीला, नारंगी) व परिणाम (हरा) देखिए। घर पर: राजकुमार, पीतांबर, महादेव, दशानन और नीलकमल जैसे पाँच हिंदी शब्द चुनिए। हर एक को तोड़िए और बताइए कि वह कौन-सा समास है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- धातु + कृत् प्रत्यय = नया शब्द: गम् + क्त्वा = गत्वा।
- संज्ञा + तद्धित प्रत्यय: मनुष्य + त्व = मनुष्यत्वम्।
- स्त्रीलिंग: देव + ई = देवी; बाल + आ = बाला।
- अव्यय: रूप हमेशा एक-सा (च, अपि, एव, न, अत्र, सदा)।
- विभक्ति 1-7: कर्ता, कर्म, द्वारा/साथ, को/के लिए, से, का, में/पर।
- समास के भेद: तत्पुरुष, कर्मधारय, द्विगु, द्वन्द्व, बहुव्रीहि, अव्ययीभाव।
हल किए गए उदाहरण
1. धातु पठ् से सही प्रत्यय लगाकर "पढ़कर" वाला शब्द बनाइए।
"करके" के अर्थ में क्त्वा लगता है: पठ् + क्त्वा = पठित्वा।
2. समास "राजपुरुषः" का विग्रह कीजिए और उसका भेद बताइए।
विग्रह: राज्ञः पुरुषः (राजा का पुरुष)। पहला पद षष्ठी से जुड़ा है, इसलिए यह तत्पुरुष है।
3. सही रूप से रिक्त स्थान भरिए: "गुरवे ____" (गुरु को प्रणाम)।
नमः के साथ चतुर्थी आती है, और गुरवे चतुर्थी में है। इसलिए वाक्य है "गुरवे नमः"।
आम गलतियाँ
- उपसर्ग वाली धातु में भी क्त्वा लगा देना। उपसर्ग के बाद ल्यप् लगता है: आ + गम् = आगत्य, आगत्वा नहीं।
- यह सोचना कि अव्यय में विभक्ति जुड़ती है। वे कभी नहीं बदलते: "च" हर जगह "च" है।
- कर्मधारय और बहुव्रीहि को मिला देना। कर्मधारय में दोनों पद एक ही वस्तु का वर्णन करते हैं (नीला कमल); बहुव्रीहि किसी अन्य का नाम बताता है (पीताम्बरः विष्णु हैं, वस्त्र नहीं)।
- यह भूल जाना कि नमः के साथ चतुर्थी और सह के साथ तृतीया आती है।