सार्वजनिक वस्तुएँ और आधारभूत ढाँचा (इन्फ्रास्ट्रक्चर)
आधारभूत ढाँचा (इन्फ्रास्ट्रक्चर) का मतलब है देश को चलाने के लिए ज़रूरी बड़ी साझा चीज़ें: सड़क, पुल, रेल, बंदरगाह, पानी के पाइप, बिजली की लाइनें और स्ट्रीट लाइट।
इनमें से बहुत-सी सार्वजनिक वस्तुएँ हैं। सार्वजनिक वस्तु की दो पहचान हैं:
- किसी को इस्तेमाल करने से रोका नहीं जा सकता। (रोशनी वाली गली में कोई भी चल सकता है।)
- एक आदमी के इस्तेमाल से दूसरे के लिए कम नहीं पड़ता। (आपके चलने से रोशनी ख़त्म नहीं होती।)
जब सब मुफ़्त में इस्तेमाल कर सकते हैं तो हर कोई चाहता है कि दूसरा पैसे दे। इसे मुफ़्तख़ोरी की समस्या (free-rider problem) कहते हैं। निजी कंपनी की कमाई कम होती है, इसलिए वह बहुत कम बनाती है। तब सरकार कर के पैसे से बनाती है।
प्रदूषण नियंत्रण: पर्यावरण की रक्षा
जब कारख़ाना धुआँ या गंदा पानी छोड़ता है, तो कारख़ाने का पैसा बचता है, पर पूरे शहर की सेहत बिगड़ती है। अर्थशास्त्र में इसे नकारात्मक बाह्यता (negative externality) कहते हैं: ऐसी लागत जो दूसरों को चुकानी पड़ती है।
सरकार ये कर सकती है:
- नियम बनाना: धुएँ और गंदे पानी की सीमा।
- प्रदूषण की कीमत लगाना: कर या शुल्क (जो प्रदूषण करे, वही भरे)।
- मदद देना साफ़ तकनीक के लिए, जैसे सस्ते फ़िल्टर या सोलर पैनल।
- जाँच और सज़ा: नियम तोड़ने वालों पर निरीक्षण और जुर्माना।
नियम से कारख़ाने का ख़र्च बढ़ता है, पर शहर को साफ़ हवा और पानी मिलता है।
बूढ़ी होती आबादी में सामाजिक सुरक्षा
सामाजिक सुरक्षा उन लोगों को बचाती है जो पर्याप्त कमा नहीं सकते: बुढ़ापा, बीमारी, नौकरी जाना, विकलांगता या ग़रीबी। कई देशों में इसके चार हिस्से हैं: सामाजिक बीमा (पेंशन, स्वास्थ्य और बेरोज़गारी बीमा), सार्वजनिक सहायता (बहुत ग़रीबों को पैसा), सामाजिक कल्याण (बच्चों, दिव्यांगों और बुज़ुर्गों की देखभाल) और जन-स्वास्थ्य।
कई पेंशन व्यवस्थाएँ ऐसे चलती हैं: आज काम करने वाले अंशदान या कर देते हैं और उससे आज के पेंशनरों को पैसा मिलता है। जब समाज बूढ़ा हो रहा हो (बुज़ुर्ग ज़्यादा, युवा कामगार कम), तो हर कामगार को ज़्यादा पेंशनरों का बोझ उठाना पड़ता है। तब देश को चुनना पड़ता है: अंशदान बढ़ाना, पेंशन की उम्र बढ़ाना, पेंशन घटाना, या और कामगार जोड़ना। जापान, इटली और चीन यह सामना कर रहे हैं; भारत अभी युवा है पर आगे बूढ़ा होगा।
उपभोक्ता सुरक्षा
विक्रेता को अक्सर खरीदार से ज़्यादा पता होता है। खरीदार हर खाने के पैकेट या बिजली के प्लग को जाँच नहीं सकता। इसलिए सरकार कानून और दफ़्तरों से उपभोक्ताओं की रक्षा करती है:
- खाने, दवा और खिलौनों के लिए सुरक्षा मानक।
- सही लेबल और वज़न: निरीक्षक तराज़ू और पैकेट जाँचते हैं।
- ईमानदार विज्ञापन और अनुबंध: झूठ नहीं, छिपे दाम नहीं।
- शिकायत का रास्ता और रिफ़ंड या मरम्मत (जैसे उपभोक्ता अदालतें; भारत में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019)।
कुछ देशों में कूलिंग-ऑफ़ नियम से आप कुछ सौदे कुछ दिनों में रद्द कर सकते हैं।
करके देखिए: बजट में चुनना पड़ता है
3D में: आख़िरी चरण में चारों स्लाइडर चलाइए। पहले सड़क पर 60 रखिए और देखिए कितना बचा। फिर चारों कामों पर 100 को अपने हिसाब से न्यायपूर्ण बाँटिए।
घर पर: अपनी गली या स्कूल की पाँच चीज़ें लिखिए जिन्हें कर का पैसा चलाता है (बत्ती, नाली, बस, मिड-डे मील, पुलिस)। हर एक के आगे लिखिए कि वह चारों में से किस काम का है। किसी बड़े से पूछिए: सबसे पहले किसे घटाएँगे और किसे नुकसान होगा?
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- सार्वजनिक वस्तु = किसी को रोक नहीं सकते + एक के इस्तेमाल से दूसरे के लिए कम नहीं पड़ता
- नकारात्मक बाह्यता = किसी काम की वह लागत जो दूसरे चुकाते हैं
- प्रति पेंशनर पेंशन (वर्तमान कामगारों से) = कुल अंशदान ÷ पेंशनरों की संख्या
- चार काम: आधारभूत ढाँचा, पर्यावरण, सामाजिक सुरक्षा, उपभोक्ता सुरक्षा
- बजट: ख़र्च जुटाए पैसे से ज़्यादा नहीं हो सकता, इसलिए चुनाव ज़रूरी है
हल किए गए उदाहरण
1. क्या स्ट्रीट लाइट सार्वजनिक वस्तु है? कारण बताइए।
हाँ। राहगीर को उसकी रोशनी से रोकना कठिन है, और एक के इस्तेमाल से अगले के लिए रोशनी कम नहीं होती। इसलिए निजी कंपनी की कमाई कम होती है और सरकार ख़र्च उठाती है।
2. एक शहर में 4 कामगार पेंशन के लिए 15-15 सिक्के कर देते हैं। 2 पेंशनर हैं। सारा पैसा बराबर बाँटें तो हर पेंशनर को कितना मिलेगा?
कुल = 4 × 15 = 60 सिक्के। हर पेंशनर को 60 ÷ 2 = 30 सिक्के।
3. अब उसी 60 सिक्कों के साथ 4 कामगार और 3 पेंशनर हैं। हर पेंशन का क्या होगा और यह क्या दिखाता है?
हर पेंशनर को 60 ÷ 3 = 20 सिक्के, पहले 30 थे। प्रति पेंशनर कामगार कम (बूढ़ी होती आबादी) हों तो अंशदान बढ़ाए बिना पेंशन गिरती है।
4. एक कारख़ाना नदी में कचरा डालता है। सरकार इसे घटाने के दो तरीके बताइए।
सीमा और जुर्माने वाला नियम बनाना (जैसे कचरा डालने पर रोक), और हर इकाई कचरे पर शुल्क या कर लगाना ताकि कारख़ाना नुकसान की कीमत चुकाए। फ़िल्टर के लिए मदद देना तीसरा तरीका है।
5. एक शहर का बजट 200 सिक्के है। 45% सामाजिक सुरक्षा, 25% सड़क और 10% पर्यावरण को जाता है। उपभोक्ता सुरक्षा और बाकी के लिए कितने सिक्के बचे?
ख़र्च हुआ हिस्सा = 45 + 25 + 10 = 80%। बचा = 200 का 20% = 40 सिक्के।
6. दुकान 1 kg लिखे पैकेट बेचती है जो 800 g के हैं। दुकानदार ₹100 प्रति पैकेट लेता है। खरीदार से हर पैकेट पर कितनी ठगी हुई?
खरीदार को वादे का सिर्फ़ 0.8 मिला। 800 g का सही दाम = 0.8 × ₹100 = ₹80। खरीदार ₹20 ज़्यादा देता है, इसीलिए निरीक्षण ज़रूरी है।
आम गलतियाँ
- "मुफ़्त" सेवाओं को बिना कीमत की मानना। इन्हें कर चुकाता है, यानी हम सब मिलकर देते हैं।
- हर सड़क को पूरी तरह सार्वजनिक वस्तु कहना। टोल सड़क में लोगों को रोका जा सकता है, इसलिए वह आंशिक रूप से ही सार्वजनिक है।
- सरकार को असीमित ख़र्च वाला मानना। बजट सीमित है, एक काम को ज़्यादा देने पर दूसरे को कम मिलता है।
- सामाजिक बीमा और सार्वजनिक सहायता को मिलाना: बीमा अंशदान से चलता है; सहायता ज़रूरतमंदों को कर से मिलती है।