पानी और पारितंत्र (इकोसिस्टम)
पारितंत्र (इकोसिस्टम) यानी किसी जगह के जीव और उनका आसपास, जो सब आपस में जुड़े होते हैं। पानी हर पारितंत्र का हिस्सा है। तालाब, नदी, दलदल, जंगल और रेगिस्तान, सबमें किसी न किसी रूप में पानी होता है, चाहे थोड़ा ही हो।
- जीवों के शरीर में ज़्यादातर पानी है। पौधों और जानवरों को ज़िंदा रहने के लिए यह चाहिए।
- पानी घर भी है। मछली, मेंढक, कीड़े और जल-पौधे उसी में रहते हैं।
- पानी चीज़ें ढोता है। नदियाँ भोजन, मिट्टी और बीज एक जगह से दूसरी जगह ले जाती हैं।
- पानी मौसम बदलता है। वह भाप बनकर बादल बनता है और बरसता है।
अगर किसी जगह पानी घट जाए या गंदा हो जाए, तो कई जीवों को नुकसान होता है, और उन्हें खाने वाले जीवों को भी। इसी कड़ी की वजह से कहते हैं कि पानी पारितंत्र को स्वस्थ रखता है।
पानी और इंसान का इतिहास
शुरू के लोग नदियों और झीलों के पास रहते थे, क्योंकि पानी रोज़ चाहिए। हमें पानी कैसे मिलने लगा, इसके चार आसान चरण हैं:
- नदी और झरना। लोग पानी तक चलकर जाते और घर ढोकर लाते थे।
- कुएँ और तालाब। लोगों ने नीचे खोदकर भूजल तक पहुँचना और बारिश का पानी जमा करना सीखा।
- नहर और पाइप। लोग पानी को दूर खेतों और शहरों तक ले गए।
- नल और शोधन। आज के शहर पानी साफ़ करके पाइप से हर घर तक भेजते हैं।
हर चरण ने पानी को पास ला दिया, इसलिए एक जगह ज़्यादा लोग रह सके। साथ ही हम ज़्यादा पानी खर्च करने लगे और स्रोत को बचाना ज़रूरी हो गया।
जल एक संसाधन
संसाधन वह चीज़ है जिसका हम उपयोग करते हैं। पानी पीने, खाना बनाने, धोने, खेती, कारखानों और बिजली बनाने में काम आता है।
3D में 100 घन देखो। लगभग 97 घन समुद्र में हैं और खारे हैं। लगभग 2 घन ग्लेशियर और बर्फ़ की चादरों में जमे हैं। लगभग 1 घन तरल मीठा पानी है, ज़्यादातर ज़मीन के नीचे। नदियाँ और झीलें मिलाकर भी एक घन के दसवें हिस्से से बहुत कम हैं। यानी इंसान को आसानी से मिलने वाला पानी बहुत थोड़ा है।
धरती का पानी खत्म नहीं होता, क्योंकि जलचक्र उसे घुमाता रहता है। पर सही जगह और सही समय पर साफ़ मीठा पानी कम पड़ सकता है। कहीं बहुत बारिश होती है, कहीं सूखा रहता है, और एक ही पानी को बढ़ती आबादी बाँटती है।
ये संख्याएँ पूर्णांक के पास की हैं। अलग किताबों में थोड़ा फ़र्क हो सकता है, पर बड़ी तस्वीर वही है।
पानी का कुशल उपयोग और गुणवत्ता का संरक्षण
कुशल उपयोग यानी कम पानी में वही काम करना।
- रिसाव ठीक करो: दिन भर टपकने वाला नल कई लीटर बर्बाद करता है।
- कम देर नहाओ और ब्रश करते समय नल बंद रखो।
- पानी दोबारा काम में लो, जैसे सब्ज़ी धोया पानी पौधों में डालो।
- खेत में पानी सिर्फ़ जड़ों के पास और ज़रूरत के समय दो।
जल-गुणवत्ता का संरक्षण यानी पानी को पहले से ही साफ़ रखना।
- कूड़ा, तेल या रसायन नाली, नदी या तालाब में मत डालो।
- नदी में लौटने से पहले सीवेज का उपचार करो।
- खाद और कीटनाशक सोच-समझकर डालो ताकि बारिश उन्हें पानी में न बहा दे।
- नदी किनारे पेड़-पौधे रखो, क्योंकि जड़ें मिट्टी थामती और गंदगी रोकती हैं।
पानी साफ़ करने में ऊर्जा और पैसा लगता है, इसलिए प्रदूषण रोकना बाद में ठीक करने से सस्ता है।
करके देखो: अपनी बाल्टियाँ गिनो
घर पर नल या शावर के नीचे 10 लीटर की बाल्टी रखो और गिनो कि एक बार नहाने या धोने में कितनी बाल्टियाँ भरती हैं। लिख लो। फिर तीन दिन 3D वाली आदतें (छोटा स्नान, कोई रिसाव नहीं) अपनाओ और दोबारा गिनो। क्या एक बाल्टी बची? पहले अनुमान लगाओ, फिर जाँचो।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- पृथ्वी का पानी ≈ 97% खारा + 2% बर्फ़ + 1% तरल मीठा (पूर्णांक के पास)
- समूह का रोज़ का उपयोग = लोग × प्रति व्यक्ति लीटर
- बाल्टियाँ = लीटर ÷ 10
- भंडार कितने दिन चलेगा = भंडार (L) ÷ रोज़ का उपयोग (L)
- मुख्य शब्द: पारितंत्र, संसाधन, मीठा पानी, कुशल उपयोग, जल-गुणवत्ता
हल किए गए उदाहरण
1. 4 लोगों का परिवार रोज़ हर व्यक्ति 150 लीटर पानी इस्तेमाल करता है। परिवार एक दिन में कितना पानी खर्च करता है?
4 × 150 = 600 लीटर प्रतिदिन।
2. 150 लीटर कितनी 10-लीटर बाल्टियों के बराबर है?
150 ÷ 10 = 15 बाल्टियाँ।
3. एक व्यक्ति रोज़ 150 L इस्तेमाल करता है। वह रिसाव ठीक करता है (20 L बचत) और छोटा स्नान करता है (30 L बचत)। अब रोज़ का उपयोग कितना है?
बचत = 20 + 30 = 50 L। नया उपयोग = 150 − 50 = 100 L प्रतिदिन।
4. 100 घन वाली तस्वीर में कितने घन मीठा पानी हैं?
100 − 97 = 3 घन मीठा पानी।
5. 500 लोगों का गाँव रोज़ हर व्यक्ति 150 L खर्च करता है। उसके तालाब में 3,00,000 L पानी है। अगर दोबारा न भरे, तो पानी कितने दिन चलेगा?
रोज़ का उपयोग = 500 × 150 = 75,000 L। दिन = 3,00,000 ÷ 75,000 = 4 दिन।
6. एक घन लगभग 1.4 करोड़ km³ पानी के बराबर है। बर्फ़ (2 घन) में लगभग कितना पानी है?
2 × 1.4 करोड़ = 2.8 करोड़ km³ (मोटा अनुमान)।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि धरती पर पीने लायक बहुत पानी है। ज़्यादातर तो खारा या जमा हुआ है।
- यह सोचना कि पानी खत्म हो जाता है। वह जलचक्र में घूमता है, पर सही जगह साफ़ पानी कम पड़ सकता है।
- यह मानना कि छोटी टपकन से फ़र्क नहीं पड़ता। दिन भर की बूँदें मिलकर कई लीटर हो जाती हैं।
- यह भूल जाना कि गंदा पानी तालाब के जीवों को भी नुकसान पहुँचाता है, सिर्फ़ इंसानों को नहीं।