उपासना क्या है?
उपासना (worship) का मतलब है ईश्वर के प्रति प्रेम, धन्यवाद और सम्मान दिखाना। लोग अकेले भी उपासना कर सकते हैं, पर ज़्यादातर धर्मों में ऐसे समय भी होते हैं जब पूरा समुदाय इकट्ठा होता है। ईसाई हर रविवार और खास पर्वों पर उपासना करते हैं। दूसरे धर्मों के लोग भी अपने ढंग से इकट्ठा होते हैं: मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, सिनागॉग या मठ में।
यह पाठ ईसाई उपासना समझाता है, क्योंकि लिटर्जी और आइकन जैसे शब्द वहीं सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होते हैं।
लिटर्जी: मुख्य सभा
लिटर्जी (liturgy) शब्द पुरानी यूनानी भाषा से आया है और इसका अर्थ है "लोगों का काम"। यह चर्च की सभा का तय क्रम है। ऑर्थोडॉक्स चर्चों में इसे दिव्य लिटर्जी कहते हैं। इसके भाग ये हैं:
- शुरुआती प्रार्थनाएँ और आपस में शांति की कामना।
- बाइबल के पाठ और छोटा प्रवचन।
- धर्म-सूत्र (Creed), यानी ईसाई क्या मानते हैं उसका संक्षिप्त कथन।
- रोटी और दाख-रस का साझा पवित्र भोज (कम्युनियन)।
- अंतिम आशीर्वाद और घर वापसी।
क्रम तय होने से छोटे या नए लोग भी साथ चल सकते हैं। कई देशों में वही शब्द बोले जाते हैं।
प्रार्थना और स्तुति
प्रार्थना ईश्वर से बात करना है। इसमें धन्यवाद, क्षमा माँगना, कुछ माँगना या स्तुति हो सकती है। कुछ प्रार्थनाएँ अकेले की जाती हैं और कुछ मिलकर, जैसे "हे हमारे पिता" की प्रार्थना।
स्तुति-गीत (hymn) गाई जाने वाली प्रार्थना है। धुन के कारण ये आसानी से याद रहते हैं और पूरा समुदाय साथ गा सकता है। ऑर्थोडॉक्स चर्चों में गायक-मंडली बिना वाद्य के स्तुति गाती है।
क्रूस का चिह्न
क्रूस का चिह्न शरीर से की जाने वाली छोटी प्रार्थना है। ऑर्थोडॉक्स ईसाई दाएँ हाथ का अँगूठा और पहली दो उँगलियाँ जोड़ते हैं, फिर माथा, छाती, दायाँ कंधा और फिर बायाँ कंधा छूते हैं। तीन जुड़ी उँगलियाँ त्रित्व की याद दिलाती हैं: पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा। दो मुड़ी उँगलियाँ मसीह के दो स्वभाव, ईश्वरीय और मानवीय, को दर्शाती हैं।
लोग प्रार्थना की शुरुआत में, चर्च में घुसते समय, या भोजन और यात्रा से पहले यह चिह्न बनाते हैं। कुछ दूसरे ईसाई समूह कंधे उलटे क्रम से छूते हैं।
पवित्र त्रित्व का आइकन
आइकन (icon) रंगा हुआ पवित्र चित्र है। यह फ़ोटो जैसा नहीं होता; यह इंसान को प्रार्थना में मदद करता है। ईसाई चित्र की पूजा नहीं करते; वे उस व्यक्ति का आदर करते हैं जिसे चित्र दिखाता है।
सबसे प्रसिद्ध त्रित्व का आइकन रूसी संत-चित्रकार आंद्रेई रूब्लेव ने लगभग 600 साल पहले बनाया था। इसमें तीन आकृतियाँ एक मेज़ पर बैठी दिखती हैं, बीच में एक प्याला है। तीनों एक जैसी लगती हैं पर अलग हैं। इससे विश्वासियों को तीन व्यक्तियों में एक ईश्वर के बारे में सोचने में मदद मिलती है: पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा। पवित्र त्रित्व का अलग पाठ है।
करके देखो: चिह्न बनाओ
3D खोलो और क्रूस का चिह्न दबाओ। चारों बिंदु एक-एक करके जलते देखो। अब अंदाज़ा लगाओ: तीसरा बिंदु कौन-सा है? फिर उसी क्रम से अपने माथे, छाती और दोनों कंधों की ओर धीरे-धीरे इशारा करो। फिर किसी दूसरे धर्म के दोस्त या पड़ोसी से पूछो कि उनका समुदाय प्रार्थना के लिए कैसे इकट्ठा होता है, और तुलना करो: क्या एक जैसा है और क्या अलग?
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- उपासना = ईश्वर के प्रति प्रेम, धन्यवाद और सम्मान, अक्सर मिलकर
- लिटर्जी = मुख्य चर्च-सभा का तय क्रम
- स्तुति-गीत = संगीत में ढली प्रार्थना
- क्रूस का चिह्न: माथा, छाती, दायाँ कंधा, बायाँ कंधा
- आइकन = प्रार्थना में मदद करने वाला पवित्र चित्र
हल किए गए उदाहरण
1. चर्च की सभा के तीन भाग बताओ।
इनमें से कोई तीन: शुरुआती प्रार्थनाएँ, बाइबल के पाठ, धर्म-सूत्र, स्तुति-गीत, पवित्र भोज (कम्युनियन) और अंतिम आशीर्वाद।
2. क्रूस के चिह्न में तीन जुड़ी उँगलियाँ क्यों ज़रूरी हैं?
वे ईसाइयों को त्रित्व की याद दिलाती हैं: पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा।
3. त्रित्व का आइकन एक मेज़ पर तीन आकृतियों के साथ क्यों बनाया जाता है?
इससे विश्वासियों को तीन व्यक्ति जो एक ही ईश्वर हैं, एक मेज़ और एक प्याला साझा करते हुए, सोचने में मदद मिलती है।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि ईसाई आइकन की ही पूजा करते हैं। वे उस व्यक्ति का आदर करते हैं जिसे वह दिखाता है; आइकन प्रार्थना में सहायक है।
- यह सोचना कि लिटर्जी का मतलब कोई भी चर्च-सभा है। इसका मतलब मुख्य सभा का तय क्रम है।
- यह सोचना कि उपासना सिर्फ़ इमारत में होती है। लोग घर, बाहर और परिवार के साथ भी प्रार्थना करते हैं।
- चिह्न का क्रम गड़बड़ करना। माथा, छाती, दायाँ कंधा, बायाँ कंधा।